हरिगीता अध्याय ११

From Wikisource

Jump to: navigation, search
श्रीहरिगीता
अर्जुन ने कहा - - 
उपदेश यह अति गुप्त जो तुमने कहा करके दया ।
अध्यात्म विषयक ज्ञान से सब मोह मेरा मिट गया ॥ ११ । १ ॥

विस्तार से सब सुन लिया उत्पत्ति लय का तत्त्व है ।
मैंने सुना सब आपका अक्षय अनन्त महत्व है ॥ ११ । २ ॥

हैं आप वैसे आपने जैसा कहा है हे प्रभो ।
मैं देखना हूं चाहता ऐश्वर्यमय उस रूप को ॥ ११ । ३ ॥

समझें प्रभो यदि आप, मैं वह देख सकता हूँ सभी ।
तो वह मुझे योगेश! अव्यय रूप दिखलादो अभी ॥ ११ । ४ ॥

श्रीभगवान् ने कहा - - 
हे पार्थ! देखो दिव्य अनुपम विविध वर्णाकार के ।
शत- शत सहस्रों रूप मेरे भिन्न भिन्न प्रकार के ॥ ११ । ५ ॥

सब देख भारत! रुद्र वसु अश्विनि मरुत आदित्य भी ।
आश्चर्य देख अनेक अब पहले न देखे जो कभी ॥ ११ । ६ ॥

इस देह में एकत्र सारा जग चराचर देखले ।
जो और चाहे देखना इसमें बराबर देख ले ॥ ११ । ७ ॥

मुझको न अपनी आँख से तुम देख पाओगे कभी ।
मैं दिव्य देता दृष्टि, देखो योग का वैभव सभी ॥ ११ । ८ ॥

संजय ने कहा- - 
जब पार्थ से श्रीकृष्ण ने इस भाँति हे राजन्! कहा ।
तब ही दिया ऐश्वर्य- युक्त स्वरूप का दर्शन महा ॥ ११ । ९ ॥

मुख नयन थे उसमें अनेकों ही अनोखा रूप था ।
पहिने अनेकों दिव्य गहने शस्त्र- साज अनूप था ॥ ११ । १० ॥

सीमा- रहित अद्भुत महा वह विश्वतोमुख रूप था ।
धारण किये अति दिव्य माला वस्त्र गन्ध अनूप था । ११ । ११ ॥

नभ में सहस रवि मिल उदय हों प्रभापुञ्ज महान् हो ।
तब उस महात्मा कान्ति के कुछ कुछ प्रकाश समान हो ॥ ११ । १२ ॥

उस देवदेव शरीर में देखा धनंजय ने तभी ।
बांटा विविध विध से जगत् एकत्र उसमें है सभी ॥ ११ । १३ ॥

रोमांच तन में हो उठा आश्चर्य से मानो जगे ।
तब यों धनंजय सिर झुका, कर जोड़ कर कहने लगे ॥ ११ । १४ ॥

अर्जुन ने कहा - - 
भगवन्! तुम्हारी देह में मैं देखता सुर- गण सभी ।
मैं देखता हूँ देव! इसमें प्राणियों का संघ भी ॥ 
शुभ कमल आसन पर इसी में ब्रह्मदेव विराजते ।
इसमें महेश्वर और ऋषिगण, दिव्य पन्नग साजते ॥ ११ । १५ ॥

बहु बाहु इसमें हैं अनेकों ही उदरमय रूप है ।
मुख और आँखें हैं अनेकों, हरि- स्वरूप अनूप है ॥ 
दिखता न विश्वेश्वर तुम्हारा आदि मध्य न अन्त है ॥
मैं देखता सब ओर छाया विश्वरूप अनन्त है ॥ ११ । १६ ॥

पहिने मुकुट, मञ्जुल गदा, शुभ चक्र धरते आप हैं ।
हो तेज- निधि, सारी दिशा दैदीप्त करते आप हैं ॥ 
तुम दुर्निरीक्षय महान् अपरम्पार हे भगवान् हो ॥
सब ओर दिखते दीप्त अग्नि दिनेश सम द्युतिवान हो ॥ ११ । १७ ॥

तुम जानने के योग्य अक्षरब्रह्म अपरम्पार हो ।
जगदीश! सारे विश्व मण्डल के तुम्हीं आधार हो ॥ 
अव्यय सनातन धर्म के रक्षक सदैव महान् हो ॥
मेरी समझ से तुम सनातन पुरुष हे भगवान् हो ॥ ११ । १८ ॥

नहिं आदि मध्य न अन्त और अनन्त बल- भण्डार है ।
शशि- सूर्य रूपी नेत्र और अपार भुज- विस्तार है ॥ 
प्रज्वलित अग्नि प्रचण्ड मुख में देखता मैं धर रहे ॥
संसार सारा तप्त अपने तेज से हरि कर रहे ॥ ११ । १९ ॥

नभ भूमि अन्तर सब दिशा इस रूप से तुम व्यापते ।
यह उग्र अद्भुत रूप लखि त्रैलोक्य थर- थर काँपते ॥ ११ । २० ॥

ये आप ही में देव- वृन्द प्रवेश करते जा रहे ।
डरते हुए कर जोड़ जय- जय देव शब्द सुना रहे ॥ 
सब सिद्ध- संघ महर्षिगण भी स्वस्ति कहते आ रहे ॥
पढ़ कर विविध विध स्तोत्र स्वामिन् आपके गुण गा रहे ॥ ११ । २१ ॥

सब रुद्रगण आदित्य वसु हैं साध्यगण सारे खड़े ।
सब पितर विश्वेदेव अश्विनि और सिद्ध बड़े बड़े ॥ 
गन्धर्वगण राक्षस मरुत समुदाय एवं यक्ष भी ॥
मन में चकित होकर हरे! वे देखते तुमको सभी ॥ ११ । २२ ॥

बहु नेत्र मुखवाला महाबाहो! स्वरूप अपार है ।
हाथों तथा पैरों व जंघा का बड़ा विस्तार है ॥ 
बहु उदर इसमें और बहु विकराल डाढ़ें हैं महा ॥
भयभीत इसको देख सब हैं भय मुझे भी हो रहा ॥ ११ । २३ ॥

यह गगनचुंबी जगमगाता हरि! अनेकों रंग का ।
आँखें बड़ी बलती, खुला मुख भी अनोखे ढ़ंग का ॥ 
यह देख ऐसा रूप मैं मन में हरे! घबरा रहा ॥
नहिं धैर्य धर पाता, न भगवन्! शान्ति भी मैं पा रहा ॥ ११ । २४ ॥

डाढ़ें भयंकर देख पड़ता मुख महाविकराल है ।
मानो धधकती यह प्रलय- पावक प्रचण्ड विशाल है ॥
सुख है न ऐसे देख मुख, भूला दिशायें भी सभी ॥
देवेश! जग- आधार! हे भगवन्! करो करुणा अभी ॥ ११ । २५ ॥

धृतराष्ट्र- सुत सब साथ उनके ये नृपति- समुदाय भी ।
श्री भीष्म द्रोणाचार्य कर्ण प्रधान अपने भट सभी ॥ ११ । २६ ॥

विकराल डाड़ों युत भयानक आपके मुख में हरे ।
अतिवेग से सब दौड़ते जाते धड़ाधड़ हैं भरे ॥ 
ये दिख रहे कुछ दाँत में लटके हुए रण- शूर हैं ॥
इस डाढ़ में पिस कर अभी जिनके हुए शिर चूर हैं ॥ ११ । २७ ॥

जिस भाँति बहु सरिता- प्रवाह समुद्र प्रति जाते बहे ।
ऐसे तुम्हारे ज्वाल- मुख में वेग से नर जा रहे ॥ ११ । २८ ॥

जिस भाँति जलती ज्वाल में जाते पतंगे वेग से ।
यों मृत्यु हित ये नर, मुखों में आपके जाते बसे ॥ ११ । २९ ॥

सब ओर से इस ज्वालमय मुख में नरों को धर रहे ।
देवेश! रसना चाटते भक्षण सभी का कर रहे ॥ 
विष्णो! प्रभाएँ आपकी अति उग्र जग में छा रहीं ॥
निज तेज से संसार सारा ही सुरेश तपा रही ॥ ११ । ३० ॥

तुम उग्र अद्भुत रूपधारी कौन हो बतलाइये ।
हे देवदेव ! नमामि देव! प्रसन्न अब हो जाइये ॥ 
तुम कौन आदि स्वरूप हो, यह जानना मैं चाहता ॥
कुछ भी न मुझको आपकी इस दिव्य करनी का पता ॥ ११ । ३१ ॥

श्रीभगवान् ने कहा - - 
मैं काल हूँ सब लोक- नाशक उग्र अपने को किये ।
आया यहाँ संसार का संहार करने के लिये ॥ 
तू हो न हो तो भी धनंजय! देख बिन तेरे लड़े ॥
ये नष्ट होंगे वीरवर योधा बड़े सब जो खड़े ॥ ११ । ३२ ॥

अतएव उठ रिपुदल- विजय कर, प्राप्त कर सम्मान को ।
फिर भोग इस धन- धान्य से परिपूर्ण राज्य महान् को ॥
हे पार्थ! मैंने वीर ये सब मार पहिले ही दिये ॥
आगे बढ़ो तुम युद्ध में बस नाम करने के लिये ॥ ११ । ३३ ॥

ये भीष्म द्रोण तथा जयद्रथ कर्ण योद्धा और भी ।
जो वीरवर हैं मार पहिले ही दिये मैंने सभी ॥ 
अब मार इन मारे हुओं को, वीरवर! व्याकुल न हो ॥
कर युद्ध रण में शत्रुओं को पार्थ! जीतेगा अहो ॥ ११ । ३४ ॥

संजय ने कहा - - 
तब मुकुटधारी पार्थ सुन केशव- कथन इस रीति से ।
अपने उभय कर जोड़ कर कँपते हुए भयभीत से ॥ 
नमते हुए, गद्गद् गले से, और भी डरते हुए ॥
श्रीकृष्ण से बोले वचन, यों वन्दना करते हुए ॥ । ११ । ३५ ॥

अर्जुन ने कहा - - 
होता जगत् अनुरक्त हर्षित आपका कीर्तन किये ।
सब भागते राक्षस दिशाओं में तुम्हारा भय लिये ॥ 
नमता तुम्हें सब सिद्ध- संघ सुरेश ! बारम्बार है ॥
हे हृषीकेश! समस्त ये उनका उचित व्यवहार है ॥ ११ । ३६ ॥

तुम ब्रह्म के भी आदिकारण और उनसे श्रेष्ठ हो ।
फिर हे महात्मन! आपकी यों वन्दना कैसे न हो ॥ 
संसार के आधार हो, हे देवदेव! अनन्त हो ॥
तुम सत्, असत् इनसे परे अक्षर तुम्हीं भगवन्त हो ॥ ११ । ३७ ॥

भगवन्! पुरातन पुरुष हो तुम विश्व के आधार हो ।
हो आदिदेव तथैव उत्तम धाम अपरम्पार हो ॥ 
ज्ञाता तुम्हीं हो जानने के योग्य भी भगवन्त् हो ॥
संसार में व्यापे हुए हो देवदेव! अनन्त हो ॥ ११ । ३८ ॥

तुम वायु यम पावक वरुण एवं तुम्हीं राकेश हो ।
ब्रह्मा तथा उनके पिता भी आप ही अखिलेश हो ॥ 
हे देवदेव! प्रणाम देव! प्रणाम सहसों बार हो ॥
फिर फिर प्रणाम! प्रणाम! नाथ, प्रणाम! बारम्बार हो ॥ ११ । ३९ ॥

सानन्द सन्मुख और पीछे से प्रणाम सुरेश! हो ।
हरि बार- बार प्रणाम चारों ओर से सर्वेश! हो ॥ 
है वीर्य शौर्य अनन्त, बलधारी अतुल बलवन्त हो ॥
व्यापे हुए सबमें इसी से ' सर्व' हे भगवन्त! हो ॥ ११ । ४० ॥

तुमको समझ अपना सखा जाने बिना महिमा महा ।
यादव! सखा! हे कृष्ण! प्यार प्रमाद या हठ से कहा ॥ ११ । ४१ ॥

अच्युत! हँसाने के लिये आहार और विहार में ।
सोते अकेले बैठते सबमें किसी व्यवहार में ॥ ११ । ४२ ॥

सबकी क्षमा मैं मांगता जो कुछ हुआ अपराध हो ॥ ।
संसार में तुम अतुल अपरम्पार और अगाध हो ॥ ॥ ११ । ४२ ॥

सारे चराचर के पिता हैं आप जग- आधार हैं ।
हैं आप गुरुओं के गुरु अति पूज्य अपरम्पार हैं ॥ 
त्रैलोक्य में तुमसा प्रभो! कोई कहीं भी है नहीं ॥
अनुपम अतुल्य प्रभाव बढ़कर कौन फिर होगा कहीं ॥ ११ । ४३ ॥

इस हेतु वन्दन- योग्य ईश! शरीर चरणों में किये ।
मैं आपको करता प्रणाम प्रसन्न करने के लिये ॥ 
ज्यों तात सुत के, प्रिय प्रिया के, मित्र सहचर अर्थ हैं ॥
अपराध मेरा आप त्यों ही सहन हेतु समर्थ हैं ॥ । ११ । ४४ ॥

यह रूप भगवन्! देखकर, पहले न जो देखा कभी ।
हर्षित हुआ मैं किन्तु भय से है विकल भी मन अभी ॥ 
देवेश! विश्वाधार! देव! प्रसन्न अब हो जाइये ॥
हे नाथ! पहला रूप ही अपना मुझे दिखलाइये ॥ ११ । ४५ ॥

मैं चाहता हूँ देखना, तुमको मुकुट धारण किये ।
हे सहसबाहो! शुभ करों में चक्र और गदा लिये ॥ 
हे विश्वमूर्ते! फिर मुझे वह सौम्य दर्शन दीजिये ॥
वह ही चतुर्भुज रूप हे देवेश! अपना कीजिये ॥ ११ । ४६ ॥

श्रीभगवान् ने कहा - - 
हे पार्थ! परम प्रसन्न हो तुझ पर अनुग्रह- भाव से ।
मैने दिखाया विश्वरूप महान योग- प्रभाव से ॥ 
यह परम तेजोमय विराट् अनंत आदि अनूप है ॥
तेरे सिवा देखा किसी ने भी नहीं यह रूप है ॥ ११ । ४७ ॥

हे कुरुप्रवीर! न वेद से, स्वाध्याय यज्ञ न दान से ।
दिखता नहीं मैं उग्र तप या क्रिया कर्म- विधान से ॥ 
मेरा विराट् स्वरूप इस नर- लोक में अर्जुन! कहीं ॥
अतिरिक्त तेरे और कोई देख सकता है नहीं ॥ ११ । ४८ ॥

यह घोर- रूप निहार कर मत मूढ़ और अधीर हो ।
फिर रूप पहला देख, भय तज तुष्ट मन में वीर हो ॥ ११ । ४९ ॥

संजय ने कहा - - 
यों कह दिखाया रूप अपना सौम्य तन फिर धर लिया ।
भगवान् ने भयभीत व्याकुल पार्थ को धीरज दिया ॥ ११ । ५० ॥

अर्जुन ने कहा- - 
यह सौम्य नर- तन देख भगवन्! मन ठिकाने आ गया ।
जिस भाँति पहले था वही अपनी अवस्था पा गया ॥ ११ । ५१ ॥

श्रीभगवान् ने कहा - - 
हे पार्थ! दुर्लभ रूप यह जिसके अभी दर्शन किये ।
सुर भी तरसते हैं इसी की लालसा मन में लिये ॥ ११ । ५२ ॥

दिखता न मैं तप, दान अथवा यज्ञ, वेदों से कहीं ।
देखा जिसे तूने उसे नर देख पाते हैं नहीं ॥ ११ । ५३ ॥

हे पार्थ! एक अनन्य मेरी भक्ति से सम्भव सभी ।
यह ज्ञान, दर्शन, और मुझमें तत्त्व जान प्रवेश भी ॥ ११ । ५४ ॥

मेरे लिये जो कर्म- तत्पर, नित्य मत्पर, भक्त है ।
पाता मुझे वह जो सभी से वैर हीन विरक्त है ॥ ११ । ५५ ॥

ग्यारहवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ११ ॥

[edit] संबंधित कड़ियाँ

  1. हरिगीता
    1. हरिगीता अध्याय १
    2. हरिगीता अध्याय २
    3. हरिगीता अध्याय ३
    4. हरिगीता अध्याय ४
    5. हरिगीता अध्याय ५
    6. हरिगीता अध्याय ६
    7. हरिगीता अध्याय ७
    8. हरिगीता अध्याय ८
    9. हरिगीता अध्याय ९
    10. हरिगीता अध्याय १०
    11. हरिगीता अध्याय ११
    12. हरिगीता अध्याय १२
  2. गीता

[edit] बाहरी कडियाँ