सूर के पद-2
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८१ मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे। जैसे उड़ि जहाज की पंछि, फिरि जहाज पर आवै॥ कमल-नैन को छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै। परम गंग को छाँड़ि पियसो, दुरमति कूप खनावै॥ जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, क्यों करील-फल खावै। 'सूरदास' प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै॥ ८२ चरन कमल बंदौ हरिराई । जाकी कृपा पंगु गिरि लंघे,अंधे को सब कछु दरसाई ॥१॥ बहरो सुने मूक पुनि बोले,रंक चले सिर छत्र धराई । ‘सूरदास’ स्वामी करुणामय, बारबार बंदौ तिहिं पाई ॥२॥ ८३ तिहारो दरस मोहे भावे श्री यमुना जी । श्री गोकुल के निकट बहत हो, लहरन की छवि आवे ॥१॥ सुख देनी दुख हरणी श्री यमुना जी, जो जन प्रात उठ न्हावे । मदन मोहन जू की खरी प्यारी, पटरानी जू कहावें ॥२॥ वृन्दावन में रास रच्यो हे, मोहन मुरली बजावे । सूरदास प्रभु तिहारे मिलन को, वेद विमल जस गावें ॥३॥ ८४ दृढ इन चरण कैरो भरोसो, दृढ इन चरणन कैरो । श्री वल्लभ नख चंद्र छ्टा बिन, सब जग माही अंधेरो ॥ साधन और नही या कलि में, जासों होत निवेरो ॥ सूर कहा कहे, विविध आंधरो, बिना मोल को चेरो ॥
८५ मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ।
मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौ, तू जसुमति कब जायौ?
कहा करौं इहि के मारें खेलन हौं नहि जात।
पुनि-पुनि कहत कौन है माता, को है तेरौ तात?
गोरे नन्द जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात।
चुटकी दै-दै ग्वाल नचावत हँसत-सबै मुसकात।
तू मोहीं को मारन सीखी दाउहिं कबहुँ न खीझै।
मोहन मुख रिस की ये बातैं, जसुमति सुनि-सुनि रीझै।
सुनहु कान्ह बलभद्र चबाई, जनमत ही कौ धूत।
सूर स्याम मौहिं गोधन की सौं, हौं माता तो पूत॥
[edit] संबंधित कड़ियाँ
- सूरदास
- सूर_के_पद
- सूर_के_पद-1
- सूर_के_पद-2
- सूरदास (हिन्दी विकिपीडिया पर)