सूर के पद-1
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४१ सारंग जसोदा कहां लौं कीजै कानि। दिन प्रति कैसे सही जाति है दूध-दही की हानि॥ अपने या बालक की करनी जो तुम देखौ आनि। गोरस खा ढूंढ़ि सब बासन भली परी यह बानि॥ मैं अपने मण-दिर के कोनैं माखन राख्यौ जानि। सो जा तुम्हारे लरिका लोनों है पहिचानि॥ बूझी ग्वालिनि घर में आयौ नैकु व संका मानि। सूर स्याम तब उत्तर बनायौ चींटी काढ़त पानि॥१५॥ टिप्पणी दिन प्रति॥।हानि एक दिन की बात हों तो जानें दूं। यह तो रोज-रोज ही दूध-दही की चोरी हो रही है। कहां तक लिहाज किया जाय कहां तक नुकसान उठाया जाय स्याम तब॥।पानि ने तुरंत बात बना दी बोले मैया इस ग्वालिनि के घर दहीं थोड़ा ही खा रहा था मैं तो दही देखकर उसमें की चीटियां हाथ से निकाल रहा था। इसने समझ लिया मैं दही चाट रहा था ४२ रामकली मैया मैं नहिं माखन खायौ। ख्याल परे ये सखा सबै मिलि मेरे मुख लपटायौ॥ देखि तुही सीके पर भाजन ऊंचे धरि लटकायौ। तुहीं निरखि नान्हें कर अपने मैं कैसे करि पायौ॥ मुख दधि पौंछि बुद्धि इक कीन्हीं दौना पीठि दुरायौ। डारि सांटि मुसुका जसोदा स्यामहिं कंठ लगायौ॥ बाल बिनोद मोद मन मोह्यौ भक्ति प्रताप-दिखायौ। सूरदास यह जसुमति कौ सुख सिव बिरचि नहिं पायौ॥१६॥ शब्दार्थ ख्याल परे मजाक करने की इच्छा से चोर बनाने की इच्छा से। भाजन बर्तन। सींका सिकहर। कैसै करि पायौ कैसे उतार सकता था। बुद्धि तरकीब। सांटि छड़ी। ४३ बिहाग कुंवर जल लोचन भरि भरि लैत। बालक बदन बिलोकि जसोदा कत रिस करति अचेत॥ छोरि कमर तें दुसह दांवरी डारि कठिन कर बैत। कहि तोकों कैसे आवतु है सिसु पर तामस एत॥ मुख आंसू माखन के कनिका निरखि नैन सुख देत। मनु ससि स्रवत सुधाकन मोती उडुगन अवलि समेत॥ सरबसु तौ न्यौछावरि कीजे सूर स्याम के हेत। ना जानौं केहिं पुन्य प्रगट भये इहिं ब्रज-नंद निकेत॥१७॥ शब्दार्थ अचेत व्यर्थ। दांवरी डोरी रस्सी। तामस गुस्सा। एत इतना। कनिका बूंदें। स्रवत टपकता है। टिप्पणी एक गोपी शायद वही जो उलाहना देने आयी थी कृष्ण को इस तरह बंधन में पड़ा देखयशोदा से कहती हैअरी यशोदातनिक कन्हैया की ओर देख तो।बच्चे की आंखें डबडबा आ हैं। क्यों इतना क्रोध कर रही है यह कठिन डोरी कुंबर की कमर से खोल दे और यह छड़ी फेंक दे यह पांच बरस का निरा बच्चा ही तो है। कहीं नन्हें-से बालक पर इतना क्रोध किया जाता है इस समय भी कुंवर कान्ह कैसा सुन्दर लगता है मुख पर आँसुं की बूंदें टपक रही हैं और माखन के कण भी इधर-उधर लगे हु हैं। ऐसा लगता है जैसे तारां सहित चंद्रमा अमृत के कणों और मोतियों की वर्षा कर रहा हो। यह शोभा भी नेत्रों को आनन्द देती है। यशोदा यह वह मोहिनी मूरत है जिस पर सर्वश्व न्यौछावर कर देना चाहि। न जाने पूर्व के किस पुण्य प्रताप से नन्द बाबा के घर में आकर इस सुन्दर बालक ने जन्म लिया है। ४४ सोरठ जसोदा तेरो भलो हियो है मा। कमलनयन माखन के कारन बांधे ऊखल ला॥ जो संपदा दैव मुनि दुर्लभ सपनेहुं द न दिखा। याही तें तू गरब भुलानी घर बैठें निधि पा॥ सुत काहू कौ रोवत देखति दौरि लेति हिय ला। अब अपने घर के लरिका पै इती कहा जड़ता॥ बारंबार सजल लोचन ह्वै चितवत कुंवर कन्हा। कहा करौं बलि जां छोरती तेरी सौंह दिवा॥ जो मूरति जल-थल में व्यापक निगम न खोजत पा। सो महरि अपने आंगन में दै-दै चुटकि नचा॥ सुर पालक सब असुर संहारक त्रिभुवन जाहि डरा। सूरदास प्रभु की यह लीला निगम नेति नित ग॥१८॥ शब्दार्थ संपदा धन संपत्ति। जड़ता निष्ठुरता कठोरता। सौंहकसम। थल स्थल व्यापक पूर्ण। त्रिभुवन तीन लोक। नेति ऐसा नहीं। टिप्पणी तेरो भलो॥॥मा धन्य है तेरा हृदय बड़ा अच्छा है अर्थात् बड़ा बुरा है बड़ा कठोर है। सुत काहू॥॥जड़ता तेरा हृदय तो इतना सरस था कि किसी के भी बच्चे को रोता देखती तो दौड़कर उसे छाती से लगा लेती थी। न जाने अब तुझे क्या हो गया जो अपनी ही कोख के लाल पर तू इतना कठोरपन दिखा रही है। कहा करौं॥॥दिवा अपने प्रति सहानुभूति दिखाने वाली उस गोपी की ओर कृष्ण आंखें डबडबाकर जब बार-बार देखते हैं तब वह कहती है क्या करूं मैं लाचार हूं। मैं तुम्हारी मैया से नहीं डरती। अबतक तो मैंने यह रस्सी खोल दी होती। पर तुम्हारी ही सौगंध तुम्हारी मां ने मुझे रखा दी है। सो बंधन खोलने से लाचार हूं। ४५ सोरठ यह सुनिकैं हलधर तहं धाये। देखि स्याम ऊखल सों बांधे तबहीं दो लोचन भरि आये॥ मैं बरज्यौ कै बार कन्हैया भली करी दो हाथ बंधाये। अजहूं छांड़ोगे लंगरा दो कर जोरि जननि पै आये। स्यामहिं छोरि मोहिं बरु बांधौ निकसतसगुन भले नहिं पाये। मेरो प्रान जीवन धन भैया ताके भुज मोहिं बंधे दिखाये॥ माता सों कहि करौं ढिठा शेषरूप कहि नाम सुनाये। सूरदास तब कहति जसोदादो भैया एकहिं मत भाये॥१९॥ शब्दार्थ हलधर बलराम। बरज्यौ रोका। लंगरा शरारत। जननि माता यशोदा के पास। बरू चाहे भले ही। सगुन शकुन। टिप्पणी स्यामहि छोरि॥॥।दिखाये यशोदा मैया से बल राम कहते हैं मैया मेरे प्यारे जीवन धन भा को तू छोड़ दे। उसके बदले मुझे भले रस्सी से बांध ले। घर से निकलते आज इसी से अपशकुन हु थे। अपने प्यारे बा को मैंने आज आंखों बंधा हुआ देखा। पर यह कैसे हो सकता था कि अपराध तो करें कृष्ण और बांधे जायें बलराम शेष-रूप कहि नाम सुनाये अब बलरामजी ने जरा तनकर कहा तुम जानती नहीं मैं कौन हूं। मैं साक्षात शेषनाग हूं। खोल दो इसी समय मेरे भा को। इस धमकी का भी को असर न हुआ। मुस्कराकर यशोदा ने कहातुम दोनों ही भा बातें बनाना सीख गये हो। माखन का यह चोट्टा कहने लगता है कि मैं विष्णु भगवान् हूं और तू आज कहता है कि मैं साक्षात् शेषनाग हूं। ४६ गोरी निरखि स्याम हलधर मुसुकानैं। को बांधे को छोरे इनकों इन महिमा ए पै जानैं॥ उतपति प्रलय करत हैं ए सेष सहसमुख सुजस बखानैं। जमलार्जुनहिं उघारन कारन करत अपन मनमानैं॥ असुर संहारन भगतहिं तारन पावन पतित कहावत बानैं। सूरदास प्रभु भाव -भगति के अति हित जसुमति हाथ बिकाने॥२०॥ शब्दार्थ उतपति उत्पत्ति सृष्टि रचना। कारन करत कारण अर्थात हेतु निकाल लेते है। बानैं विरुद्ध। कृष्ण को बंधन में पड़ा देखकर बलराम मन-ही-मन मुसकराये और कहने लगे इन्हें कौन बांध सकता है और कौन खोल सकता है इनकी महिमा यही जानें। यही सृष्टि रचते हैं और यही संहार करते हैं। इनका यशोगान शेष सहस्र मुखों से ही करते हैं। इन्हीं ने तो आज स्वयं ही अपने को बंधाने का एक हेतु निकाल लिया है। बात यह है कि यमलार्जुन का उद्दार करना था। राक्षसों को मारने वाले भक्तों को मुक्ति देने वाले और पापियों का उद्धार करने वाले यही तो हैं। यह सदा भक्ति के अधीन हैं इसी कारण यशोदा मैया के वश में हो गये हैं। इस समस्त पद में श्रीकृष्ण की ईश्वरता ही दिखा ग है। यमलार्जुन उद्धार के प्रसंग में ईश्वरता की निदर्शन करना आवश्यक था। यमलार्जुन नलकूबर और मणिग्रीव नामक दो कुबेर पुत्र नारद के शाप से ब्रज में जुड़वां अर्जुन वृक्ष के रूप में पैदा हु थे। उन्हें सान्त्वना दे दी ग थी कि श्रीकृष्ण के स्पर्श से उनका उद्धार होगा वही हुआ। वे दोनों वृक्ष धड़ाम से गिर पड़े और नलकूबर के रूप में उन्होंने भगवान् की स्तुति की। दोनों भा शाप-मुक्त होकर पिता कुबेर के लोक में चले गये। ४७ आसावरी मैया हौं गाय चरावन जैहों। तू कहि महर नंद बाबा सों बड़ो भयौ न डरैहौं॥ रैता पैता मना मनसुखा हलधर संगहिं रैहौं। बंसीबट तर ग्वालिन के संग खेलत अति सुख पैहौं॥ ओदन भोजन दै दधि कांवरि भूख लगे तैं खैहौं। सूरदास है साखि जमुन जल सौंह देहु जु नहैहौं॥२१॥ शब्दार्थ रैता पैता मनामनसुखा-श्रीकृष्ण के बाल-सखां के नाम। हलधर बलराम। रैहों रहूंगा। बंसीबट एक वृक्ष जिसके नीचे श्रीकृष्ण बंसी बजाया करते थे। आज भी वृंदावन में यमुना-तट पर बंसीवट प्रसिद्ध है। ओदन भात। कांवरि बहंगी एक लकड़ी के दोनों सिरों पर पात्र बंधे होते हैं जिनमें जल दूध दही आदि चीजें ढो जाती है। कावर कन्धे पर रखी जाती है। साखि साक्षी। टिप्पणी तू कहि डरै॥।हरौं मैया अब तो तू नंद बाबा से सिफारिश कर दे। मैं देख कितना बड़ा हो गया हूं। मुझे बन में जाते कुछ भी डर न लगेगा। है साखि॥। नहै हौं मैया तू सदा यह आशंका किया करती है कि कृष्ण कहीं यमुना में डूब न जाय तो मैं यमुना जल की सौगंध खाकर कहता हूं कि मैं कभी उसमें न नहांगा। तू मेरा विश्वास रख। ४८ सारंग आ छाक बुलाये स्याम। यह सुनि सखा सभै जुरि आये सुबल सुदामा अरु श्रीदाम॥ कमलपत्र दौना पलास के सब आगे धरि परसत जात। ग्वालमंडली मध्यस्यामधन सब मिलि भोजन रुचिकर खात॥ ऐसौ भूखमांझ इह भौजन पठै दियौ करि जसुमति मात। सूर स्याम अपनो नहिं जैंवत ग्वालन कर तें लै लै खात॥२२॥ शब्दार्थ छाक वह भोजन जो खेत पर या चरागाह पर भेज दिया जाता है। ब्रज में यह भोजन महेरी माखन-रोटी आदि का होता है। सुबल सुदामा श्रीदामा ग्वाल बालों के नाम। पलास ढाक। परसत जात परोसे जाते हैं। रुचिकरि बड़े स्वाद से। करि बनाकर। टिप्पणी ऐसी भूख॥ंआत कैसी कड़ाके की भूख लगी थी। जसोदा मैया बड़ी भली है जो इस भूख में ताजी छाक तैयार करके यहां भेज दी है। स्याम॥॥खात ग्वालबालों के हाथ से छीन छीनकर श्रीकृष्ण खाते हैं अपनी छाक इतनी मीठी नहीं लगती जितनी कि उन सबके पत्तलों की। ४९ बिलावल आजु बन बन तैं ब्रज आवत। रंग सुरंग सुमन की माला नंद नंदन उर पर छबि पावत॥ ग्वाल बाल गोधन संग लीनें नाना गति कौतुक उपजावत। को गावत को नृत्य करत को उघटत को ताल बजावत॥ रांभति गाय बच्छ हित सुधि करि प्रेम उमंगि थन दूध चुवावत। जसुमति बोलि उठी हरषित ह्वै कान्हा धेनु चराये आवत॥ इतनी कहत आय गये मोहन जननी दौरि हियें लै लावत। सूर स्याम के कृत जसुमति सों ग्वाल बाल कहि प्रकट सुनावत॥२३॥ शब्दार्थ कौतुक आश्चर्य आनंद। उघटत फूदता है। रांभति रंभाती है जोर से शब्द करती है। हियें ले हृदय लगाकर। टिप्पणी नाना गति॥॥उपजावत ग्वाल-बाल अनेक प्रकार के नाच-कूद से आनन्द पैदा कर रहे हैं को किसी गति से चला आ रहा है तो को किसी गति से। रांभति॥॥चुवावत गाय अपने बछड़े की याद करके दौड़ती हु चली आ रही है। बार-बार रंभाती है थनों से दूध मानों चू रहा है। स्याम के कृत दिन भर की कृष्ण की बातें जैसे इन्होंने मैया बड़ा ऊधम मचाया कहीं इस पेड़ पर चढ़े कहीं उस पेड़ पर जमुना में भी खूब नहाये श्रीदामा से लड़ा की और सुबल से मित्रता आदि शिकायतें। पर गाय चराने की तो सबने तारीफ ही की होगी कारण कि गोचारण में गोपाल बड़े कुशल थे। यही सब कृत्य थे कृष्ण के। इन्हीं सब बातों को बढ़ा-चढ़ा कर यशोदा के सामने कहा गया। ५० गौरी जसुमति दौरि लिये हरि कनियां। आजु गयौ मेरौ गाय चरावन हौं बलि जां निछनियां॥ मो कारन कचू आन्यौ नाहीं बन फल तोरि नन्हैया। तुमहिं मिलैं मैं अति सुख पायौमेरे कुंवर कन्हैया॥ कछुक खाहु जो भाव इ मोहन। दैरी माखन रोटी। सूरदास प्रभु जीवहु जुग-जुग हरि-हलधर की जोटी॥२४॥ शब्दार्थ कनियां गोदी। मेरौ मेरा लाल ब्रजभाषा में सिर्फ मेरा और मेरी से ही पुत्र और पुत्री का बोध हो जाता है। निछनियां पूरे तौर से। मो कारन मेरे लि नन्हैया नन्हा-सा छोटा-सा। जोटी जोड़ी। टिप्पणी मेरे नन्हें-से लाल अपनी मैया के लि कुछ वन के फल तोड़कर नहीं लाये मैंने योंही कहा कन्हैया तुझे पाकर मुझे क्या नहीं मिल गया। भूख तो लगी ही होगी चल जो तुझे भाव इ सो खा ले। दैरी माखन रोटी सर्वस्व तो माखन रोटी ही है। वन-वन गाय चराने वाली यह हरि-हलधर की प्यारी जोड़ी जुग-जुग चिरंजीवी रहे। ५१ नट मैया हौं न चरैहों गा। सिगरे ग्वाल घिरावत मोसों मेरे पां पिरांइ॥ जौ न पत्याहि पूछि बलदाहिं अपनी सौंह दिवा। यह सुनि मा जसोदा ग्वालनि गारी देति रिसा॥ मैं पठवति अपने लरिका कों आवै मन बहरा। सूर श्याम मेरो अति बारो मारत ताहि रिंगा॥२५॥ शब्दार्थ घिरावत इधर-उधर से हांककर एक जगह करना। न पत्याहि विश्वास न करे। सौंह कसम। आवै मन बहरा मन बहला आवै। बारो बालक। मारत रिंगा चला-चला कर थका डालते हैं। रूप-माधुरी ५२ धनाश्री जौ बिधिना अपबस करि पां। तौ सखि कह्यौ हौ कछु तेरो अपनी साध पुरां॥ लोचन रोम-रोम प्रति मांगों पुनि-पुनि त्रास दिखां। इकटक रहैं पलक नहिं लागैं पद्धति न चलां॥ कहा करौं छवि-रासि स्यामघन लोचन द्वे नहिं ठां। एते पर ये निमिष सूर सुनि यह दुख काहि सुनां॥१॥ शब्दार्थ बिधिना विधाता ब्रह्मा। अपबस अपने वश में। साध पुरां इच्छा पूरी करूं। त्रास डांट-दपट भय। पद्धति रीति। ठां स्थान। निमिष पलक। टिप्पणी तौ सखि॥॥तेरो सखी तूने कृष्ण की छवि देखने को कहा है पर इन दो छोटी-छोटी आंखों से उस अनंत रूप राशि कौ कैसे निरखूं यदि विधाता को किसी तरह वश में कर सकूं तो तेरा भी कहना सफल हो जाय और कृष्ण को देखने की मेरी लालसा भी पूरी हो जाय। कहा करौं॥॥ठां क्या करूं श्यामसुंदर तो सौन्दर्य के सागर हैं उन्हें इन दो नेत्रों में बसा सकती हूं। स्थान ही नहीं लाचारी है। एते पर॥।सुनां एक तो दोही आंखें फिर पलकों का बार-बार लाना यह और भी बला है। सदा खुली ही रहतीं पलक न गिरते तो फिर भी कुछ संतोष हो जाता। एकटक देखती तो रहती। पर वह भी अब होने का नहीं। ५३ देश नैन भये बोहित के काग। उड़ि उड़ि जात पार नहिं पावैं फिरि आवत इहिं लाग॥ ऐसी दसा भ री इनकी अब लागे पछितान। मो बरजत बरजत उठि धाये नहीं पायौ अनुमान॥ वह समुद्र ओछे बासन ये धरैं कहां सुखरासि। सुनहु सूर ये चतुर कहावत वह छवि महा प्रकासि॥२॥ शब्दार्थ बोहित जहाज। लाग स्थान। बरजत रोकते हु। ओछे बासन छोटे बर्तन। टिप्पणी उड़ि उड़ि॥॥लाग ये नेत्र संसार की दूसरी-दूसरी वस्तुं भी देखते हैं पर उन पर दृष्टि स्थिर नहीं रहती। अटके हु तो ये कृष्ण छवि में ही हैं बार- बार वहीं चले जाते हैं। सारा कृष्ण सौन्दर्य का सागर है जिसका पार पाना कठिन है। जहां तक दृष्टि जाती है सौन्दर्य-ही-सौन्दर्य है। उस सौन्दर्य को छोड़कर इन नेत्रों के लि कहीं और आश्रय ही नहीं। ये चतुर॥॥प्रकासि नेत्र बड़े चतुर समझे गये हैं पर उस असीम सुंदरता के सामने इनकी चतुरा नहीं चलती वहां तो ये भी ठग लिये ग हैं। ५४ कल्याण धनि यह वृन्दावन की रैनु। नंदकिसोर चरा गैयां बिहरि बजा बैनु॥ मनमोहन कौ ध्यान धरै जो अति सुख पावत चैनु। चलत कहां मन बसहिं सनातन जहां लैनु नहीं दैनु॥ यहां रहौ जहं जूठन पावैं ब्रजवासी के ऐनु। सूरदास ह्यां की सरबरि नहिं कल्पवृच्छ सुरधैनु॥३॥ शब्दार्थ रेनु रजधूल। बेनु बंशी। चैनु चैन आनन्द। जहां लैनु नहिं देनु जहां किसी तरह का को झंझट नहीं। सनातन सदा। ऐनु अयन घर। सरबरि तुलना। ५५ बिहाग नटवर वेष काछे स्याम। पदकमल नख-इन्दु सोभा ध्यान पूरनकाम॥ जानु जंघ सुघट निका नाहिं रंभा तूल। पीतपट काछनी मानहुं जलज-केसरि झूल॥ कनक-छुद्वावली पंगति नाभि कटि के मीर। मनहूं हंस रसाल पंगति रही है हृद-तीर॥ झलक रोमावली सोभा ग्रीव मोतिन हार। मनहुं गंगा बीच जमुना चली मिलिकैं धार॥ बाहुदंड बिसाल तट दो अंग चंदन-रेनु। तीर तरु बनमाल की छबि ब्रजजुवति-सुखदैनु॥ चिबुक पर अधरनि दसन दुति बिंब बीजु लजा। नासिका सुक नयन खंजन कहत कवि सरमा॥ स्रवन कुंडल कोटि रबि-छबि प्रकुटि काम-कोदंड। सूर प्रभु हैं नीप के तर सिर धरैं स्रीखंड॥४॥ शब्दार्थ नटवर नृत्यकरनेवालों में श्रेष्ठ। काछे बनाये हु। इंदु चन्द्रमा। पूरनकाम मनोवांछां पूरी करने वाला। जानु घुटना। सुघट बनावट। निका शोभा। तूल तुल्य बराबर। रंभा केला। काछनी घेरदार जामा। कनक छुद्रावली सोने की करधनी। जलज केसरि कमल केसर। पंगति पंक्ति कतार। हृद तीर तालाब का किनारा। बिंब एक लाल फल जिसे कुंदरू कहते हैं। बीजु बिजली। भ्रकुटि भौंह। काम-कोदंड कामदेव का धनुष। नीप कदंब। स्रीखंड मोर के पंखे। टिप्पणी देखो आज श्यामसुन्दर ने नटवर का भेष धारण किया है। इस रूप का ध्यान सारी कामनां पूरी करता है। चरण कमलों का तनिक ध्यान तो धरो। पैरों के नख तो मानो दुज के चन्द्र हैं। जानु भी बड़े सुन्दर हैं। जंघां की सुन्दर बनावट को केले का वृक्ष कहीं पा सकता है उसकी उपमा तुच्छ है। पीले वस्त्र की काछनी क्या है मानो कमल की केसर घुटनों के चारों ओर लहरा रही है। उधर नाभि और कमर के पास सोने की करधनी की लड़ें ऐसी जान पड़ती हैं जैसे सुन्दर हंसावली तालाब के तट पर विहार कर रही हो। यहां तालाब नाभि का उपमान माना गया है फिर वही भूमावली और गले में पड़ा हुआ मोतियों का हार ऐसा शोभित हो रहा है मानो गंगा के मध्य में यमुना की धारा मिलकर बह रही हो। यहां मोतियों का हार ही गंगा की धवल धारा है और उसके बीच में रोमावली श्याम यमुना है। उस गंगा-यमुना की धारा के दोनों तट क्या हैं बड़े-बड़े बाहु। शरीर में चन्दन का लेप लगा हुआ है वह मानो उन सरितां की रेणुका है। वहीं तुलसी दल तथा अन्य पुष्पों की वनमाला नदी तट की वृक्षावली के समान शोभा दे रही है। चिबुक के ऊपर अरुण ओठों के आगे बिंबापल और दंतपंक्ति के आगे विद्युत भी लज्जित हो रही है। नासिका को तोते की उपमा देते और नेत्रों को खञ्जन कहते कवि को संकोच होता है। ये उपमां अन्यत्र भले ही ठीक बैठती हों पर यहां तो तुच्छ हैं। कानों के मकराकृत कुण्डलों की आभा करोड़ों सूर्यों के समान है और भौंहें तो मानो कामदेव की कमानें हैं। सूरदास कहते हैं कैसा सुन्दर नटवर वेश है कदंब के नीचे आप खड़े हैं और सिर पर मोर पंखों का मुकुट धारण किये हु हैं। ५६ पूर्वी मुरली गति बिपरीत करा। तिहुं भुवन भरि नाद समान्यौ राधारमन बजा॥ बछरा थन नाहीं मुख परसत चरत नहीं तृन धेनु। जमुना उलटी धार चली बहि पवन थकित सुनि बेनु॥ बिह्वल भये नाहिं सुधि काहू सूर गंध्रब नर-नारि। सूरदास सब चकित जहां तहं ब्रजजुवतिन सुखकारि॥५॥ शब्दार्थ गति संसार की चाल। बिपरीत उलटी। परसत छूते हैं लगाते हैं। गंध्रब गंधर्व। चकित स्तम्भित जहां-तहं चित्र-लिखे से। टिप्पणी मुरली नाद ने समस्त संसार पर अपना अधिकार जमा लिया है। दुनिया मानो उसके इशारे पर नाच रही है। तीनों लोकों में वंशी की ही ध्वनि भर ग है सब चित्रलिखे-से दिखा देते हैं। बछड़ा अपनी मां के थन को छूता भी नहीं। गौं मुंह में तृण भी नहीं दबातीं। और जमुना वह तो आज उलटी बह रही है। पवन की भी चंचलता रुक ग है। वह भी ध्यानस्थ हो मुरली-नाद में मस्त हो रही है। सभी बेसुध हैं। देव और गन्धर्व तक प्रेम-विह्वल है फिर नर-नारियों का तो कहना ही क्या ५७ रामकली संदेसो दैवकी सों कहियौ। हौं तौ धाय तिहारे सुत की मया करति नित रहियौ॥ जदपि टेव जानति तुम उनकी त मोहिं कहि आवे। प्रातहिं उठत तुम्हारे कान्हहिं माखन-रोटी भाव इ॥ तेल उबटनों अरु तातो जल देखत हीं भजि जाते। जो-जो मांगत सो-सो देती क्रम-क्रम करिकैं न्हाते॥ सुर पथिक सुनि मोहिं रैनि-दिन बढ्यौ रहत उर सोच। मेरो अलक लडैतो मोहन ह्वै है करत संकोच॥२॥ शब्दार्थ मया दया। त तोभी। टेव आदत। उबटनो बटना तिल चिरौंजी आदि पीसकर शरीर में लगाने की चीज जिससे मैल छूट जाता है और शरीर का रूखापन दूर हो जाता है। तातो गरम। भजि जाते भाग जाते थे। क्रम-क्रम करिकैं धीरे-धीरे। अलक लड़ैतो प्यारा। टिप्पणी मैं तो तुम्हारे पूत की मात्र एक धाय हूं इसलि सदा से दया बना रखना जदपि टेव॥।आवै तुम्हारा तो वह लड़का ही ठहरा तुम उसकी आदतें जानती ही हो पर ढिढा क्षमा करना पाला-पोसा तो मैंने ही उसे है उसकी कुछ खास-खास आदतें मैं ही जानती हूं सो कुछ निवेदन मुझे करना ही पड़ता है। ह्वै-है करत संकोच तुम्हारे घर को वह पराया घर समझता होगा और मेहमान की तरह वहां मेरा कन्हैया संकोच करता होगा। ५८ सोरठ मेरो कान्ह कमलदललोचन। अब की बेर बहुरि फिरि आवहु कहा लगे जिय सोचन॥ यह लालसा होति हिय मेरे बैठी देखति रैहौं॥ गा चरावन कान्ह कुंवर सों भूलि न कबहूं कैहौं॥ करत अन्याय न कबहुं बरजिहौं अरु माखन की चोरी। अपने जियत नैन भरि देखौं हरि हलधर की जोरी॥ एक बेर ह्वै जाहु यहां लौं मेरे ललन कन्हैया। चारि दिवसहीं पहुन कीजौ तलफति तेरी मैया॥३॥ शब्दार्थ कमलदललोचन कमल पत्र के समान नेत्र हैं जिनके। बेर बार। रैहौं रहूंगी। कहौं कहूंगी। अन्याय उत्पातऊधम। बरजिहौं रोकूंगी। जोरी जोड़ी। पहुनै मेहमानी। टिप्पणी करत॥॥चोरी शायद तुम इसलि रूठकर मथुरा में जाकर बस ग हो कि मैंने तुम्हें कभी-कभी डांटा था। सो अब कभी नहीं डांटूंगी। कितना ही तुम ऊधम करो कभी रोकूंगी नहीं। माखन-चोरी के लि भी अब तुम्हारी छूट रहेगी। अब तो सब ठीक है न। तो फिर चले आ न मेरे लाल। रैहौं॥॥कैहौं ये दोनों बुन्देलखंडी बोली के प्रयोग हैं। ५९ गौरी कहियौ नंद कठोर भये। हम दो बीरैं डारि परघरै मानो थाती सौंपि गये॥ तनक-तनक तैं पालि बड़े किये बहुतै सुख दिखराये। गो चारन कों चालत हमारे पीछे कोसक धाये॥ ये बसुदेव देवकी हमसों कहत आपने जाये। बहुरि बिधाता जसुमतिजू के हमहिं न गोद खिलाये॥ कौन काज यहि राजनगरि कौ सब सुख सों सुख पाये। सूरदास ब्रज समाधान करु आजु-काल्हि हम आये॥४॥ शब्दार्थ बीरैं भायों को। परघरै दूसरे के घर में। थाती धरोहर। तनक-तनक तें छुटपन से। कोसक एक कोस तक। समाधान सझना शांति। टिप्पणी श्रीकृष्ण अपने परम ज्ञानी सखा उद्धव को मोहान्ध ब्रजवासियों में ज्ञान प्रचार करने के लि भेज रहे हैं। इस पद में नंद बाबा के प्रति संदेश भेजा है। कहते है बाबा तुम इतने कठोर हो गये हो कि हम दोनों भायों को पराये घर में धरोहर की भांति सौंप कर चले ग। जब हम जरा-जरा से थे तभी से तुमने हमें पाल-पोसकर बड़ा किया अनेक सुख दि। वे बातें भूलने की नहीं। जब हम गाय चराने जाते थे तब तुम एक कोस तक हमारे पीछे-पीछे दौड़ते चले आते थे। हम तो बाबा सब तरह से तुम्हारे ही है। पर वसुदेव और देवकी का अनधिकार तो देखो। ये लोग नंद-यशोदा के कृष्ण-बलराम को आज अपने जाये पूत कहते हैं। वह दिन कब होगा जब हमें यशोदा मैया फिर अपनी गोद में खिलायेंगी। इस राजनगरी मथुरा के सुख को लेकर क्या करें हमें तो अपने ब्रज में ही सब प्रकार का सूख था। उद्धव तुम उन सबको अच्छी तरह से समझा-बुझा देना और कहना कि दो-चार दिन में हम अवश्य आयेंगे। ६० सारंग नीके रहियौ जसुमति मैया। आवहिंगे दिन चारि पांच में हम हलधर दो भैया॥ जा दिन तें हम तुम तें बिछुरै कह्यौ न को कन्हैया। कबहुं प्रात न कियौ कलेवा सांझ न पीन्हीं पैया॥ वंशी बैत विषान दैखियौ द्वार अबेर सबेरो। लै जिनि जा चुरा राधिका कछुक खिलौना मेरो॥ कहियौ जा नंद बाबा सों बहुत निठुर मन कीन।ह्हौं। सूरदास पहुंचा मधुपुरी बहुरि न सोधौ लीन।ह्हौं॥५॥ शब्दार्थ नीके रहियौ को चिम्ता न करना। न पीन्हीं पैया ताजे दूध की धार पीने को नहीं मिली। बिषान सींग बजाने का। अबेर सबेरी समय-असमय बीच-बीच में जब अवसर मिले। सोधौ खबर भी। टिप्पणी कह्यौ न को कन्हैया यहां मथुरा में तो सब लोग कृष्ण और यदुराज के नाम से पुकारते है मेरा प्यार का कन्हैया नाम को नहीं लेता। लै जिनि जा चुरा राधिका राधिका के प्रति १२ बर्ष के कुमार कृष्ण का निर्मल प्रेम थायह इस पंक्ति से स्पष्ट हो जाता है।राधा कहीं मेरा खिलौना न चुरा ले जाय कैसी बालको-चित सरलोक्ति है। ६१ देश जोग ठगौरी ब्रज न बिकहै। यह ब्योपार तिहारो ऊधौ ऐसो फिरि जैहै॥ यह जापे लै आये हौ मधुकर ताके उर न समैहै। दाख छांडि कैं कटुक निबौरी को अपने मुख खैहै॥ मूरी के पातन के कैना को मुकताहल दैहै। सूरदास प्रभु गुनहिं छांड़िकै को निरगुन निरबैहै॥६॥ शब्दार्थ ठगौरी ठगी का सौदा। एसो फिरि जैहैं योंही बिना बेचे वापस ले जाना होगा। जापै जिसके लि। उर न समैहै हृदय में न आगा। निबौरी नींम का फल। मूरी मूली। केना अनाज के रूप में साग-भाजी की कीमत जिसे देहात में कहीं-कहीं देकर मामूली तरकारियां खरीदते थे। मुकताहल मोती। निर्गुन सत्य रज और तमोगुण से रहित निराकार ब्रह्म। टिप्पणी उद्धव ने कृष्ण-विरहिणी ब्रजांगनां को योगभ्यास द्वारा निराकार ब्रह्म का साक्षात्कार करने के लि जब उपदेश दिया तो वे ब्रजवल्लभ उपासिनी गोपियां कहती हैं कि इस ब्रज में तुम्हारे योग का सौदा बिकने का नहीं। जिन्होंने सगुण ब्रह्म कृष्ण का प्रेम-रस-पान कर लिया उन्हें तुम्हारे नीरस निर्गुण ब्रह्म की बातें भला क्यों पसन्द आने लगीं अंगूर छोड़कर कौन मूर्ख निबोरियां खायगा मोतियों को देकर कौन मूढ़ बदले में मूली के पत्ते खरीदेगा योग का यह ठग व्यवसाय प्रेमभूमि ब्रज में चलने का नहीं। ६२ टोडी ऊधो होहु इहां तैं न्यारे। तुमहिं देखि तन अधिक तपत है अरु नयननि के तारे॥ अपनो जोग सैंति किन राखत इहां देत कत डारे। तुम्हरे हित अपने मुख करिहैं मीठे तें नहिं खारे॥ हम गिरिधर के नाम गुननि बस और काहि उर धारे। सूरदास हम सबै एकमत तुम सब खोटे कारे॥७॥ शब्दार्थ न्यारे होहु चले जा। सैंति भली-भांति संचित करके।खोटे बुरे। टिप्पणी तुमहि॥॥।तारे तुम जले पर और जलाते हो एक तो कृष्ण की विरहाग्नि से हम योंही जली जाती है उस पर तुम योग की दाहक बातें सुना रहे हो। आंखें योंही जल रही है। हमारे जिन नेत्रों में प्यारे कृष्ण बस रहे हैं उनमें तुम निर्गुण निराकार ब्रह्म बसाने को कह रहे हो। अपनो॥॥डारें तुम्हारा योग-शास्त्र तो एक बहुमूल्य वस्तु है उसे हम जैसी गंवार गोपियों के आगे क्यों व्यर्थ बरबाद कर रहे हो। तुम्हारे॥॥खारे तुम्हारे लि हम अपने मीठे को खारा नहीं कर सकतीं प्यारे मोहन की मीठी याद को छोड़कर तुम्हारे नीरस निर्गुण ज्ञान का आस्वादन भला हम क्यों करने चलीं ६३ केदारा फिर फिर कहा सिखावत बात। प्रात काल उठि देखत ऊधो घर घर माखन खात॥ जाकी बात कहत हौ हम सों सो है हम तैं दूरि। इहं हैं निकट जसोदानन्दन प्रान-सजीवनि भूरि॥ बालक संग लियें दधि चोरत खात खवावत डोलत। सूर सीस नीचैं कत नावत अब नहिं बोलत॥८॥ शब्दार्थ नावत झुकाते हो। टिप्पणी जाकी बात॥॥दूरि जिस निर्गुण ब्रह्म की बात तुम हमारे सामने बना रहे हो वह तो हमसे बहुत दूर है हमारे परिमित ज्ञान के परे है। सीस नीचें॥।बोलत अब क्यों नीचे को सिर कर लिया कुछ बोलते क्यों नहीं ६४ रामकली उधो मन नाहीं दस बीस। एक हुतो सो गयौ स्याम संग को अवराधै ईस॥ सिथिल भं सबहीं माधौ बिनु जथा देह बिनु सीस। स्वासा अटकिरही आसा लगि जीवहिं कोटि बरीस॥ तुम तौ सखा स्यामसुन्दर के सकल जोग के ईस। सूरदास रसिकन की बतियां पुरवौ मन जगदीस॥९॥ शब्दार्थ हुतो था। अवराधै आराधना करे उपासना करे। ईस निर्गुण ईश्वर। सिथिल भं निष्प्राण सी हो ग हैं। स्वासा श्वास प्राण। बरीश वर्ष का अपभ्रंश। पुरवौ मन मन की इच्छा पूरी करो। टिप्पणी गोपियां कहती है मन तो हमारा एक ही है दस-बीस मन तो हैं नहीं कि एक को किसी के लगा दें और दूसरे को किसी और में। अब वह भी नहीं है कृष्ण के साथ अब वह भी चला गया। तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म की उपासना अब किस मन से करें स्वासा॥॥बरीस गोपियां कहती हैंयों तो हम बिना सिर की-सी हो ग हैं हम कृष्ण वियोगिनी हैं तो भी श्याम-मिलन की आशा में इस सिर-विहीन शरीर में हम अपने प्राणों को करोड़ों वर्ष रख सकती हैं। सकल जोग के ईस क्या कहना तुम तो योगियों में भी शिरोमणि हो। यह व्यंग्य है। ६५ टोडी अंखियां हरि-दरसन की भूखी। कैसे रहैं रूप-रस रांची ये बतियां सुनि रूखी॥ अवधि गनत इकटक मग जोवत तब ये तौ नहिं झूखी। अब इन जोग संदेसनि ऊधो अति अकुलानी दूखी॥ बारक वह मुख फेरि दिखावहुदुहि पय पिवत पतूखी। सूर जोग जनि नाव चलावहु ये सरिता हैं सूखी॥१०॥ शब्दार्थ रांची रंगी हुं अनुरूप। अवधि नियत समय। झूखी दुःख से पछता खीजी। दुःखी दुःखित हु। बारक एक बार। पतूखी पत्तेश का छोटा-सा दाना टिप्पणी अंखियां॥। रूखी जिन आंखों में हरि-दर्शन की भूल लगी हु है जो रूप- रस मे रंगी जा चुकी हैं उनकी तृप्ति योग की नीरस बातों से कैसे हो सकती है अवधि॥॥।दूखी इतनी अधिक खीझ इन आंखों को पहले नहीं हु थी क्योंकि श्रीकृष्ण के आने की प्रतीक्षा में अबतक पथ जोहा करती थीं। पर उद्धव तुम्हारे इन योग के संदेशों से इनका दुःख बहुत बढ़ गया है। जोग जनि॥।सूखी अपने योग की नाव तुम कहां चलाने आ हो सूखी रेत की नदियों में भी कहीं नाव चला करती है हम विरहिणी ब्रजांगनां को क्यों योग के संदेश देकर पीड़ित करते हो हम तुम्हारे योग की अधिकारिणी नहीं हैं। ६६ मलार ऊधो हम लायक सिख दीजै। यह उपदेस अगिनि तै तातो कहो कौन बिधि कीजै॥ तुमहीं कहौ इहां इतननि में सीखनहारी को है। जोगी जती रहित माया तैं तिनहीं यह मत सोहै॥ कहा सुनत बिपरीत लोक में यह सब को कैहै। देखौ धौं अपने मन सब को तुमहीं दूषन दैहै॥ चंदन अगरु सुगंध जे लेपत का विभूति तन छाजै। सूर कहौ सोभा क्यों पावै आंखि आंधरी आंजै॥११॥ शब्दार्थ सिख शिक्षा उपदेश। तातो गरम। जती यति संन्यासी। यह मत सोहै यह निर्गुणवाद शोभा देता है। कैहै कहेगा। चंदन अगरु मलयागिर चंदन विभूति भस्म भभूत। छाजै सोहती है। टिप्पणी हम लायक हमारे योग्य हमारे काम की। अधिकारी देखकर उपदेश दो। कहौ॥।कीजै तुम्हीं बता इसे किस तरह ग्रहण करे विपरीत उलटा स्त्रियों को भी कठिन योगाभ्यास की शिक्षा दी जा रही है यह विपरीत बात सुनकर संसार क्या कहेगा आंखि आंधरी आंजै अंधी स्त्री यदि आंखों में काजल लगा तो क्या वह उसे शोभा देगा इसी प्रकार चंदन और कपूर का लेप करने वाली को स्त्री शरीर पर भस्म रमा ले तो क्या वह शोभा पायेगी ६७ सारंग ऊधो मन माने की बात। दाख छुहारो छांड़ि अमृतफल बिषकीरा बिष खात॥ जो चकोर कों दे कपूर को तजि अंगार अघात। मधुप करत घर कोरि काठ में बंधत कमल के पात॥ ज्यों पतंग हित जानि आपुनो दीपक सो लपटात। सूरदास जाकौ जासों हित सो ताहि सुहात॥१२॥ शब्दार्थ अंगार अघात अंगारों से तृप्त होता है प्रवाद है कि चकोर पक्षी अंगार चबा जाता है। कोरि छेदकर। पात पत्ता। टिप्पणी अंगार अघात तजि अंगार न अघात भी पाठ है उसका भी यही अर्थ होता है अर्थात अंगार को छोड़कर दूसरी चीजों से उसे तृप्ति नहीं होती। तजि अंगार कि अघात भी एक पाठान्तर है। उसका भी यही अर्थ है। ६८ काफी निरगुन कौन देश कौ बासी। मधुकर कहि समुझा सौंह दै बूझति सांच न हांसी॥ को है जनक जननि को कहियत कौन नारि को दासी। कैसो बरन भेष है कैसो केहि रस में अभिलाषी॥ पावैगो पुनि कियो आपुनो जो रे कहैगो गांसी। सुनत मौन ह्वै रह्यौ ठगो-सौ सूर सबै मति नासी॥१३॥ शब्दार्थ निरगुन त्रिगुण से रहित ब्रह्म। सौंह शपथ कसम। बूझति पूछती हैं। जनक पिता। वरन वर्ण रंग। गांसी व्यंग चुभने वाली बात। टिप्पणी गोपियां ऐसे ब्रह्म की उपासिकां हैं जो उनके लोक में उन्हीं के समान रहता हो जिनके पिता भी हो माता भी हो और स्त्री तथा दासी भी हो। उसका सुन्दर वर्ण भी हो वेश भी मनमोहक हो और स्वभाव भी सरस हो। इसी लि वे उद्धव से पूछती हैं अच्छी बात है हम तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म से प्रीति जोड़ लेंगी पर इससे पहले हम तुम्हारे उस निर्गुण का कुछ परिचय चाहती हैं। वह किस देश का रने वाला है उसके पिता का क्या नाम है उसकी माता कौन है को उसकी स्त्री भी है रंग गोरा है या सांवला वह किस देश में रहता है उसे क्या-क्या वस्तुं पसंद हैं यह सब बतला दो। फिर हम अपने श्यामसुन्दर से उस निर्गुण की तुलना करके बता सकेंगी कि वह प्रीति करने योग्य है या नहीं। पावैगो॥॥गांसी जो हमारी बातों का सीधा-सच्चा उत्तर न देकर चुभने वाली व्यंग्य की बाते कहेगा उसे अपने कि का फल मिल जायगा। ६९ नट कहियौ जसुमति की आसीस। जहां रहौ तहं नंदलाडिले जीवौ कोटि बरीस॥ मुरली द दौहिनी घृत भरि ऊधो धरि ल सीस। इह घृत तौ उनहीं सुरभिन कौ जो प्रिय गोप-अधीस॥ ऊधो चलत सखा जुरि आये ग्वाल बाल दस बीस। अबकैं ह्यां ब्रज फेरि बसावौ सूरदास के ईस॥१४॥ शब्दार्थ कोटि बरीस करोड़ों वर्ष। दोहिनी मिट्टी का बर्तन जिसमें दूध दुहा जाता है छोटी मटकिया। सुरभिन गाय। जो प्रिय गोप अधीस जो गों ग्वाल-बालों के स्वामी कृष्ण को प्रिय थीं। जुरि आ इकट्ठे हो ग। टिप्पणी जहां रहौं॥।बरीस प्यारे नंदनंदन तुम जहां भी रहो सदा सुखी रहो और करोड़ों वर्ष चिरंजीवी रहो। नहीं आना है तो न आ मेरा वश ही क्या मेरी शुभकामना सदा तुम्हारे साथ बनी रहेगी तुम चाहे जहां भी रहो। मुरली॥।सीस यशोदा के पास और देने को है ही क्या अपने लाल की प्यारी वस्तुं ही भेज रही हैं- बांसुरी और कृष्ण की प्यारी गौं का घी। उद्धव ने भी बडे प्रेम से मैया की भेंट सिरमाथे पर ले ली। ७० गोरी कहां लौं कहि ब्रज की बात। सुनहु स्याम तुम बिनु उन लोगनि जैसें दिवस बिहात॥ गोपी गा ग्वाल गोसुत वै मलिन बदन कृसगात। परमदीन जनु सिसिर हिमी हत अंबुज गन बिनु पात॥ जो कहुं आवत देखि दूरि तें पूंछत सब कुसलात। चलन न देत प्रेम आतुर उर कर चरननि लपटात॥ पिक चातक बन बसन न पावहिं बायस बलिहिं न खात। सूर स्याम संदेसनि के डर पथिक न उहिं मग जात॥१५॥ शब्दार्थ विहात बीतते हैं। मलिन बदन उदास। सिसिर हिमी हत शिशिर ऋतु के पाले से मारे हु। बिनु पात बिना पत्ते के। कुसलात कुशल-क्षेम। बायस कौआ। बलि भोजन का भाग। टिप्पणी परमदीन॥।पात सारे ब्रजबासी ऐसे श्रीहीन और दीन दिखा देते है जैसे शिशिर के पाले से कमल कुम्हला जाता है और पत्ते उसके झुलस जाते हैं। पिक॥॥पावहिं कोमल और पपीहे विरहाग्नि को उत्तेजित करते हैं अतः बेचारे इतने अधिक कोसे जाते हैं कि उन्होंने वहां बसेरा लेना भी छोड़ दिया है। बायस॥॥खात कहते हैं कि कौआ घर पर बैठा बोल रहा हो और उसे कुछ खाने को रख दिया जाय तो उस दिन अपना को प्रिय परिजन या मित्र परदेश से आ जाता है। यह शकुन माना जाता है। पर अब को भी वहां जाना पसंद नहीं करते। वे बलि की तरफ देखते भी नहीं। यह शकुन भी असत्य हो गया। ७१ मारू ऊधो मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं। बृंदावन गोकुल तन आवत सघन तृनन की छाहीं॥ प्रात समय माता जसुमति अरु नंद देखि सुख पावत। माखन रोटी दह्यो सजायौ अति हित साथ खवावत॥ गोपी ग्वाल बाल संग खेलत सब दिन हंसत सिरात। सूरदास धनि धनि ब्रजबासी जिनसों हंसत ब्रजनाथ॥१६॥ शब्दार्थ गोकुल तन गोकुल की तरफ। तृनन की वृक्ष-लता आदि की। हित स्नेह। सिरात बीतता था। टिप्पणी निर्मोही मोहन को अपने ब्रज की सुध आ ग। व्याकुल हो उठे बाल्यकाल का एक-एक दृष्य आंखों में नाचने लगा। वह प्यारा गोकुल वह सघन लतां की शीतल छाया वह मैया का स्नेह वह बाबा का प्यार मीठी-मीठी माखन रोटी और वह सुंदर सुगंधित दही वह माखन-चोरी और ग्वाल बालों के साथ वह ऊधम मचाना कहां गये वे दिन कहां ग वे घड़ियां ७२ मलार तबतें बहुरि न को आयौ। वहै जु एक बेर ऊधो सों कछुक संदेसों पायौ॥ छिन-छिन सुरति करत जदुपति की परत न मन समुझायौ। गोकुलनाथ हमारे हित लगि द्वै आखर न पठायौ॥ यहै बिचार करहु धौं सजनी इतौ गहरू क्यों लायौ। सूर स्याम अब बेगि मिलौ किन मेघनि अंबर छायौ॥१७॥ शब्दार्थ द्वै आखर दो अक्षर छोटी-सी चिट्ठी। गहरू विलंब। किन क्यों नहीं। टिप्पणी परत न मन समुजायो मन समझाने से भी नहीं समझता। अब बेगि॥। छायौ घनघोर घटां घिर आ है। यह संकेत किया गया है कि कहीं इन्द्र तब का बदला न चुका बैठे। ब्रज को कौन जाने अबकी बार डुबा कर ही छोड़े।इसलि गोवर्द्धनधारी ये काली-काली घटनां देखकर तो ब्रज को बचाने के लि आ जा। ७३ मलार अब या तनुहिं राखि कहा कीजै। सुनि री सखी स्यामसुंदर बिनु बांटि विषम विष पीजै॥ के गिरि गिरि चढ़ि सुनि सजनी सीस संकरहिं दीजै। के दहि दारुन दावानल जा जमुन धंसि लीजै॥ दुसह बियोग अरी माधव को तनु दिन-हीं-दिन छीजै। सूर स्याम अब कबधौं मिलिहैं सोचि-सोचि जिय जीजै॥१८॥ शब्दार्थ बांटि पीसकर। सीस संकरहिं दीजै यह सिर काट-कर शिव पर चढ़ा दिया जाय। दावानल वन में लगी हु आग। छीजै क्षीण होता है। जीजै जी रहा है। टिप्पणी शरीर का रखना व्यर्थ है अब। बिना स्यामसुन्दर के देह-धारण किये रहना अच्छा नहीं। ऐसे जीने से तो मर जाना ही अच्छा। शरीर नित्य क्षीण होता जाता हैं। ७४ ईमन आथ अनाथन की सुधि लीजै। गोपी गा ग्वाल गौ-सुत सब दीन मलीन दिंनहिं दिन छीज॥ नैन नीर-धारा बाढ़ी अति ब्रज किन कर गहि लीजै। इतनी बिनती सुनहु हमारी बारक तो पतियां लिखि दीजै॥ चरन कमल-दरसन नवनौका करुनासिन्धु जगत जसु लीजै। सूरदास प्रभु आस मिलन की एक बार आवन ब्रज कीजै॥१९॥ शब्दार्थ बारक तो एक बार तो। दरसन नवनौका दर्शन रूपी न नाव। टिप्पणी नैन नीर॥॥।लीजे आंसुं की धारा बाढ़ पर है। कौन जाने वह ब्रज को किसी दिन डुबाकर रहे। जैसे तुमने पहले गोवर्द्धन उंगली पर उठा ब्रज की रक्षा कर ली थी उसी प्रकार ब्रजवासियों के आंसुं की बाढ़ से फिर वहां चलकर अपनी लीलाभूमि का उद्धार करो। विविध कृष्ण-सुदामा-मैत्री ७५ बिलावल ऐसैं मोहिं और कौन पहिंचानै। सुनि री सुंदरि दीनबंधु बिनु कौन मिता मानै॥ कहं हौं कृपन कुचील कुदरसन कहं जदुनाथ गुसां। भैंट।ह्यौ हृदय लगा प्रेम सों उठि अग्रज की नां॥ निज आसन बैठारि परम रुचि निजकर चरन पखारे। पूंछि कुसल स्यामघन सुंदर सब संकोच निबारे॥ लीन्हें छोरि चीर तें चार कर गहि मुख में मेले। पूरब कथा सुना सूर प्रभु गुरु-गृह बसे अकेले॥१॥ शब्दार्थ मिता मित्रता। कृपन दीन गरीब। कुचील मैले कपड़े पहनने वाला। कुदरसन कुरूप। सब संकोच निवारे निःसंकोच होकर। चीर वस्त्र। मेले डाल दिये पूरब कथा बाल्यकाल की बातें। टिप्पणी निज कर चरन पखारे अपने हाथ से मेरे पैर धोये। इस प्रसंग पर कवि नरोत्तमदास का बड़ा ही सुंदर सवैया है कैसे बिहाल बेवांन सों भये कंटक-जाल गड़े पग जोये। हाय महादुख पाये सखा तुम आये इतै न कितै दिन खोये॥ देखि सुदामा की दीन दसा करुना करि कैं करुनाकर रोये। पानी परात कौ हाथ छुयौ नहिं नैनन के जल सों पग धोये॥ लीन्हें॥॥मेले सुदामा की पत्नी ने एक फटे पुराने चिथड़े में श्रीकृष्ण के लि भेंट-स्वरूप थोड़े-से चावल बांध दि थे। श्रीकृष्ण ने सुदामा से पूछा क्यों भैया मेरे लि भाभी ने कुछ दिया है या नहीं बेचारे ब्राह्मण से लज्जा और संकोच के मारे कुछ बोलते न बना। वह फटी पोटली बगल में और जोर से दबा ली। कृष्ण ने पकड़कर वह खींच ही ली और खोलकर वे कच्चे चावल मुट्ठी भर-भर बड़े प्रेम से चबाने लगे। ७६ विदुर के अतिथि हरि तुम क्यों न हमारैं आये। षटरस व्यंजन छाड़ि रसौ साग बिदुर घर खाये॥ ताकी कुटिया में तुम बैठे कौन बड़प्पन पायौ। जाति पांति कुलहू तैं न्यारो है दासी कौ जायौ॥ मैं तोहि कहौं अरे दुरजोधन सुनि तू बात हमारी। बिदुर हमारो प्रान पियारो तू विषया अधिकारी॥ जाति-पांति हौं सबकी जानौं भक्तनि भेद न मानौं। संग ग्वालन के भोजन कीनों एक प्रेमव्रत ठानौं॥ जहं अभिमान तहां मैं नाहीं भोजन बिषा सो लागे। सत्य पुरुष बैठ्यो घट ही में अभिमानी को त्यागे॥ जहं जहं भीर परै भक्तन पै पै पयादे धां। भक्तन के हौं संग फिरत हौं भक्तनि हाथ बिकां॥ भक्तबछलता बिरद हमारो बेद उपनिषद गायौ। सूरदास प्रभु निजजन-महिमा गावत पार न पायौ॥१॥ शब्दार्थ जायौ गर्भ से उत्पन्नपुत्र। विषया माया विषय-वासना। ठानैं पक्का कर लिया है। घट शरीर। भीर कष्ट। भक्तवछलता भक्त-वत्सलता भक्तों पर प्यार करना। बिरद गाना टिप्पणी अभिमानी दुर्योधन का राजसी सम्मान और षटरस व्यंजन छोड़कर श्रीकृष्ण ने विदुर के यहां बिना ही निमंत्रण के अलौना साग बड़े प्रेम से खाया था। यह पद उसी प्रसंग का है। सत्य पुरुष॥।त्यागै अंतःकरण में विराजमान सत्यरूपी नारायण अभिमानी के पास कभी नहीं जाता। जहां अहं भाव है वहां ईश्वर भाव का काम ही क्या भगवान् तो प्रेम के भूखे हैं राजसी सम्मान के नहीं। गर्गभंजन गोविन्द को अभिमानी दुर्योधन का मान भंग तो करना ही था इसीलि उसका आतिथ्य त्याग दिया और विदुर की कुटिया में जाकर रूखा-सूखा भोजन बड़े प्रेम से किया। ७७ प्रतिज्ञा-भंग जो पै हरिहिंन शस्त्र गहां। तौ लाजौं गंगा जननी कौं सांतनु-सुतत कहां॥ स्यंदन खंडि महारथ खंडौं कपिध्वज सहित डुलां। इती न करौं सपथ मोहिं हरि की छत्रिय गतिहिं न पां॥ पांडव-दल सन्मुख ह्वै धां सरिता रुधिर बहां। सूरदास रणविजयसखा कौं जियत न पीठि दिखां॥१॥ शब्दार्थ स्यंदन रथ। खंडि टुकड़े-टुकड़े करके। कपिधवज अर्जुन के रथ की पताका जिस पर हनुमान का चित्र था। डुलां विचलित कर दूं। विजयसखा अर्जुन के सखा श्रीकृष्ण। टिप्पणी जब अर्जुन श्रीकृष्ण को रण का निमंत्रण देने गये तब उन्होंने अर्जुन से कहा मैं तुम्हारे साथ रहूंगा अवश्य पर हाथ में शस्त्र नहीं लूंगा। उसी प्रतिज्ञा के अनुसार श्रीकृष्ण ने रथ हांकना स्वीकार किया। इधर भीष्म पितामह ने प्रतिज्ञा की कि मैं अवश्य कृष्ण की प्रतिज्ञा तोड़ डालूंगा उन्हें शस्त्र लेना ही पड़ेगा। यह पद उसी प्रसंग का है। तौ॥॥कों भीष्म पितामह ने गंगा के गर्भ से जन्म लिया था। कहते है यदि मैंने इतना न किया तो गंगा का पुत्र नहीं गंगा के दूध लजाने वाला कुपुत्र कहा जांगा। सांतनु-सुत भीष्म के पिता का नाम महाराज शांतनु था। इती॥॥पां जिन्हें वे परास्त करना चाहते है उसी की शपथ लेते हैं। हरि के ही बल पर हराना चाहते हैं। ७८ सारंग मो परतिग्या रहै कि जा। इत पारथ कोप्यौ है हम पै उत भीषम भटरा॥ रथ तै उतरि चक्र धरि कर प्रभु सुभटहिं सन्मुख आयौ। ज्यों कंदर तें निकसि सिंह झुकि गजजुथनि पै धायौ॥ आय निकट श्रीनाथ बिचारी परी तिलक पर दीठि। सीतल भ चक्र की ज्वाला हरि हंसि दीनी पीठि॥ जय जय जय जनबत्सल स्वामी सांतनु-सुत यौं भाखै। तुम बिनु ऐसो कौन दूसरो जौं मेरो प्रन राखै॥ साधु साधु सुरसरी-सुवन तुम मैं प्रन लागि डरां। सूरदास भक्त दो दिसि का पै चक्र चलां॥२॥ शब्दार्थ परतिग्या प्रतिज्ञा प्रण। पारथ पार्थ पृथा के पुत्र अर्जुन। भटरा योद्धां में श्रेष्ठ। कंदर कंदरा गुफा। झुकि झपटकर। दीठी दृष्टि नजर। भाखै कहता है। साधु साधु धन्य हो। सुरसरी-सुवन गंगा के पुत्र भीष्म। दिसि तरफ। टिप्पणी ज्यों॥।धायौ जैसे गुफा से ललकारा हुआ क्रुद्ध शेर झपटकर हाथियों के झुंडों पर दौड़ता है उसी प्रकार श्रीकृष्ण बड़े-बड़े योद्धां पर आक्रमण करते हु रथ से उतर-कर भीष्म की ओर दौड़े। हरि हंसि दीनीं पीठि श्रीकृष्ण ने हंसकर स्वयं ही पीठ दिखा दी खुद ही हार स्वीकार कर ली। मैं प्रन लागि डरां मैं अपने भक्तों के प्रण से बहुत डरता हूं। ७९ देश वा पटपीत की फहरानि। कर धरि चक्र चरन की धावनि नहिं बिसरति वह बानि॥ रथ तें उतरि अवनि आतुर ह्वै कचरज की लपटानि। मानौं सिंह सैल तें निकस्यौ महामत्त गज जानि॥ जिन गुपाल मेरा प्रन राख्यौ मेटि वेद की कानि। सो सूर सहाय हमारे निकट भये हैं आनि॥३॥ शब्दार्थ पटपीथ पीताम्बर। कर धरी हाथ में लेकर। बानि बानिक रूप। अवनि भूमि। आतुर ह्वै जल्दी में घबरा-कर। कच बाल। रज धूल सैल पर्वत। कानि मर्यादा। हाथ में सुदर्शन चक्र लिये हु वह तेजी से दौड़ना को कैसे भूल सकता है वह शोभा ही निराली है। रथ से कूदकर भीष्म की ओर झपट रहे हैं। पीतांबर फहरा रहा है। अलकों में धूल लगी हु है। श्रीकृष्ण उस समय ऐसे दिखा देते हैं मानो किसी महामदोद्धत गजेन्द्र पर को क्रुद्ध केसरी आक्रमण कर रहा हो। हरि-सुमिरन ८० बिलावल हरि हरि हरि सुमिरन करौ। हरि चरनारबिंद उर धरौं॥ हरि की कथा हो जब जहां। गंगाहू चलि आवै तहां॥ जमुना सिन्धु सरस्वति आवै। गोदावरी विलंब न लाबै॥ सर्व तीर्थ को बासा तहां। सूर हरि-कथा होवे जहां॥१॥
[edit] संबंधित कड़ियाँ
- सूरदास
- सूर_के_पद
- सूर_के_पद-1
- सूर_के_पद-2
- सूरदास (हिन्दी विकिपीडिया पर)