सूर के पद
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१ पद बिलावल चरन कमल बंदौ हरि राई । जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै आंधर कों सब कछु दरसाई॥ बहिरो सुनै मूक पुनि बोलै रंक चले सिर छत्र धराई । सूरदास स्वामी करुनामय बार-बार बंदौं तेहि पाई ॥१॥ शब्दार्थ राई राजा। पंगु लंगड़ा। लघै लांघ जाता है पार कर जाता है। मूक गूंगा। रंक निर्धन गरीब कंगाल। छत्र धरा राज-छत्र धारण करके। तेहि तिनके। पाई चरण। भाव जिस पर श्रीहरि की कृपा हो जाती है उसके लिये असंभव भी सभव हो जाता है। लूला-लंगड़ा मनुष्य पर्वत को भी लांघ जाता है। अंधे को गुप्त और प्रकट सबकुछ देखने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। बहरा सुनने लगता है। गूंगा बोलने लगता है कंगाल राज-छत्र धारण कर लेता हे। ऐसे करूणामय प्रभु की पद-वन्दना कौन अभागा न करेगा। २ बिलावल अबिगत गति कछु कहति न आवै। ज्यों गूंगो मीठे फल की रस अन्तर्गत ही भावै॥ परम स्वादु सबहीं जु निरन्तर अमित तोष उपजावै। मन बानी कों अगम अगोचर सो जाने जो पावै॥ रूप रैख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब मन चकृत धावै। सब बिधि अगम बिचारहिं तातों सूर सगुन लीला पद गावै॥२॥ शब्दार्थ अबिगत अव्यक्त अज्ञेय जो जाना न जा सके। गति बात। अन्तर्गत हृदय अन्तरात्मा। भावै रुचिकर प्रतीत होता है। अमित अपार। तोष सन्तोष आनन्द। अगोचर इन्द्रियजन्य ज्ञान से परे। गुन गुण सत्व रज और तमो गुण से आशय है। निरालंब बिना अवलंब या सहारे के। सगुन सगुण दिव्यगुण संयुक्त साकार ब्रह्म श्रीकृष्ण। भाव यहां अव्यक्तोपासना को देहाभिमानियों के लि क्लिष्ट बताया है। निराकार निर्गुण ब्रह्म का चिंतन अनिर्वचनीय है। वह मन और वाणी का विषय नहीं। गूंगे को मिठा खिला दी जाय और उससे उसका स्वाद पूछा जाय तो वह कैसे बतला सकता है वह रसानंद तो उसका अन्तर ही जानता है। अव्यक्त ब्रह्म का न रूप है न रेख न गुण है न जाति। मन वहां स्थिर ही नहीं हो सकता। सब प्रकार से वह अगम्य है अतः सूरदास सगुण ब्रह्म श्रीकृष्ण की लीलां का ही गायन करना ठीक समझते हैं। ३ धनाश्री प्रभु मेरे औगुन न विचारौ। धरि जिय लाज सरन आये की रबि-सुत-त्रास निबारौ॥ जो गिरिपति मसि धोरि उदधि में लै सुरतरू निज हाथ। ममकृत दोष लिखे बसुधा भरि त नहीं मिति नाथ॥ कपटी कुटिल कुचालि कुदरसन अपराधी मतिहीन। तुमहिं समान और नहिं दूजो जाहिं भजौं ह्वै दीन॥ जोग जग्य जप तप नहिं कीण।ह्हौं बेद बिमल नहिं भाख।ह्यौं। अति रस लुब्ध स्वान जूठनि ज्यों अनतै ही मन राख्यौ॥ जिहिं जिहिं जोनि फिरौं संकट बस तिहिं तिहिं यहै कमायो। काम क्रोध मद लोभ ग्रसित है विषै परम विष खायो॥ अखिल अनंत दयालु दयानिधि अघमोचन सुखरासि। भजन प्रताप नाहिंने जान।ह्यौं बंध्यौ काल की फांसि॥ तुम सर्वग्य सबै बिधि समरथ असरन सरन मुरारि। मोह समुद्र सूर बूड़त है लीजै भुजा पसारि॥३॥ शब्दार्थ औगुन अवगुण दोष। सरन आ की शरण में आने की। रविसुत सूर्य पुत्र यमराज। त्रास भय। निवारो दूर कर दो। मसि स्याही। सुरतरु कल्पवृक्ष यहां कल्पवृक्ष का लेखनी से आशय है। मिति अन्त। परम बिष तेज जहर। अखिल सर्वरूप। अघमोचन पापों से छुड़ानेवाला। मोह अज्ञान संसार से तात्पर्य है। पसारि बढ़ाकर। भाव जीव के अपराधों का अन्त नहीं। अपराधों की तरफ देखकर यदि न्याय किया गया तब तो उद्धार पाने की को आशा नहीं। शरणागत को भगवान तार देते हैं इस न्याय पर ही सूर का उद्धार भाव सागर से होना चाहि। ४ सारंग प्रभु हौं सब पतितन कौ राजा। परनिंदा मुख पूरि रह्यौ जग यह निसान नित बाजा॥ तृस्ना देसरु सुभट मनोरथ इंद्रिय खड्ग हमारे। मंत्री काम कुमत दैबे कों क्रोध रहत प्रतिहारे॥ गज अहंकार चढ्यौ दिगविजयी लोभ छ।ह्त्र धरि सीस॥ फौज असत संगति की मेरी ऐसो हौं मैं ईस। मोह मदै बंदी गुन गावत मागध दोष अपार॥ सूर पाप कौ गढ दृढ़ कीने मुहकम लाय किंवार॥४॥ शब्दार्थ पूरि रह्यौ भर रहा है। निसान नगाड़ा। रु अरु और। सुभट योद्धा। कुमंत कुमंत्र बुरी सलाह। प्रतिहार द्वारपाल। असत झूठदुष्ट ईस राजा। मदै मद ही। मागध मगध देश के भाट जो वंश विरुदावली बखानते हैं। गढ़ किला। मुहकम मजबूत। किंवार किवाड़ फाटक। भाव यहां बड़े पापी की राजा से तुलना की ग है। परनिन्दा ही राजमहल के द्वार पर नौबत का बजना है। तृष्णा पतितेश का देश है। अनेक मनोरथ योद्धा हैं। इन्द्रियां तलवार का काम देती हैं।काम कुमंत्री है और क्रोध है द्वारपाल। अहंकार दिग्विजय कराने में साथी है। सिर पर लोभ का राज छत्र है। दुष्टों की संगति सेना है। ऐसे नरेश की विरुदावली का गान मोह मदादि कर रहे हैं। भक्तिवाद में दीनता ही दीनबंधु की शरण में ले जाती है। ५ बिलावल अब कै माधव मोहिं उधारि। मगन हौं भाव अम्बुनिधि में कृपासिन्धु मुरारि॥ नीर अति गंभीर माया लोभ लहरि तरंग। लियें जात अगाध जल में गहे ग्राह अनंग॥ मीन इन्द्रिय अतिहि काटति मोट अघ सिर भार। पग न इत उत धरन पावत उरझि मोह सिबार॥ काम क्रोध समेत तृष्ना पवन अति झकझोर। नाहिं चितवत देत तियसुत नाम-नौका ओर॥ थक्यौ बीच बेहाल बिह्वल सुनहु करुनामूल। स्याम भुज गहि काढ़ि डारहु सूर ब्रज के कूल॥५॥ शब्दार्थ अब कैं अबकी बार इस जन्म में। उधारि उद्धार करो। मगन मग्न डूबा हुआ। भाव संसार। अंबुनिधि समुद्र। ग्राह मगर। अनंग काम वासना। मोट गठरी। सिवार शैवाल पानी के अन्दर उगनेवाली घास जिसमें मनुष्य प्रायः फंस जाता है। कूल किनारा। भाव संसार-सागर में माया अगाध जल है लोभ की लहरें हैं काम वासना का मगर है इन्द्रियां मछलियां हैं और इस जीवन के सिर पर पापों की गठरी रखी हु है।इस समुद्र में मोह सवार है। काम-क्रोधादि की वायु झकझोर रही है। तब एक हरि नाम की नौका ही पार लगा सकती है पर-स्त्री तथा पुत्र का माया-मोह उधर देखने ही नहीं देता। भगवान ही हाथ पकड़कर पार लगा सकते हैं। ६ देवगंधार मोहिं प्रभु तुमसों होड़ परी। ना जानौं करिहौ जु कहा तुम नागर नवल हरी॥ पतित समूहनि उद्धरिबै कों तुम अब जक पकरी। मैं तो राजिवनैननि दुरि गयो पाप पहार दरी॥ एक अधार साधु संगति कौ रचि पचि के संचरी। भ न सोचि सोचि जिय राखी अपनी धरनि धरी॥ मेरी मुकति बिचारत हौ प्रभु पूंछत पहर घरी। स्रम तैं तुम्हें पसीना ऐहैं कत यह जकनि करी॥ सूरदास बिनती कहा बिनवै दोषहिं देह भरी। अपनो बिरद संभारहुगै तब यामें सब निनुरी॥६॥ शब्दार्थ होड़ बाजी। नागर चतुर। जक हठ। दरी कन्दरागुफा। दुर गयो छिप गया। अपनी धरनी अपनी शक्ति भर। जकनि करी हठ किया। निनुरी निर्णय हो जागा। भाव तुम सों होड़ परी तुम्हारा नाम पतितोद्धारक है पर मुझे इसका विश्वास नहीं। आज जांचने आया हूं कि तुम कहां तक पतितों का उद्धार करते हो। तुमने उद्धार करने का हठ पकड़ रखा है तो मैंने पाप करने का सत्याग्रह ठान रखा है। इस बाजी में देखना है कौन जीतता है। मैं तो राजिव॥॥दरी तुम्हारे कमलदल जैसे नेत्रों की दृष्टि बचाकर मैं पाप-पहाड़ की गुफा में छिपकर बैठ गया हूं। ७ धनाश्री अब हों नाच्यौ बहुत गोपाल। काम क्रोध कौ पहिरि चोलना कंठ विषय की माल॥ महामोह के नूपुर बाजत निन्दा सब्द रसाल। भरम भर।ह्यौ मन भयौ पखावज चलत कुसंगति चाल॥ तृसना नाद करति घट अन्तर नानाविध दै ताल। माया कौ कटि फैंटा बांध्यो लोभ तिलक दियो भाल॥ कोटिक कला काछि दिखरा जल थल सुधि नहिं काल। सूरदास की सबै अविद्या दूरि करौ नंदलाल॥७॥ शब्दार्थ चोलना नाचने के समय का घेरदार पहनावा। पखावज मृदंग। विषय कुवासना। फैंटा कमरबंद। अविद्या अज्ञान। भाव संसार के प्रवृति मार्ग पर भटकते-भटकते जीव अन्त में प्रभु से कहता है तुम्हारी आज्ञा से बहुत नाच मैंने नाच लिया। अब इस प्रवृति से मुझे छुटकारा दे दो मेरा सारा अज्ञान दूर कर दो। वह नृत्य कैसा काम-क्रोध के वस्त्र पहने। विषय की माला पहनी। अज्ञान के घुंघरू बजे। परनिन्दा का मधुर गान गाया। भ्रमभरे मन ने मृदंग का काम दिया। तृष्णा ने स्वर भरा और ताल तद्रुप दिये। माया का फेंटा कस लिया था। माथे पर लोभ का तिलक लगा लिया था। तुम्हें रिझाने के लि न जाने कितने स्वांग रचे। कहां-कहां नाचना पड़ा किस-किस योनि में चक्कर लगाना पड़ा। न तो स्थान का स्मरण है न समय का। किसी तरह अब तो रीझ जा नंदनंदन। ८ बिलावल कब तुम मोसो पतित उधारो। पतितनि में विख्यात पतित हौं पावन नाम तिहारो॥ बड़े पतित पासंगहु नाहीं अजमिल कौन बिचारो। भाजै नरक नाम सुनि मेरो जमनि दियो हठि तारो॥ छुद्र पतित तुम तारि रमापति जिय जु करौ जनि गारो। सूर पतित कों ठौर कहूं नहिं है हरि नाम सहारो॥८॥ शब्दार्थ मोसो मेरे समान। पावन पवित्र करने वाला। पासंगहुं पासंग भी। अजमिल भक्त अजामिल जो लड़के का नारायण नाम लेने से यम पाश से मुक्त हो गया था। बिचारो बेचारा। भाजै भागता है। जमनि यमदूतों ने। हठी जबरदस्ती से। तारो ताला। गारो बड़ा अभिमान। ठौर जगह। भाव जो पुण्य करता है वह स्वर्ग पद पाता है। मैंने को पुण्य नहीं किया इससे स्वर्ग जाने का तो मेरा अधिकार है नहीं। अब रह गया नरक। मगर नरक भी मेरे महान पापों को देखकर डर गया है। वहां भी प्रवेश नहीं। अब कहां जां। अब तो नाथ तुम्हारे चरणों का ही अवलम्ब है सो वहीं थोड़ी-सी जगह कृपाकर दे दो। ९ धनाश्री अपन जान मैं बहुत करी। कौन भांति हरि कृपा तुम्हारी सो स्वामी समुझी न परी॥ दूरि गयौ दरसन के तां व्यापक प्रभुता सब बिसरी। मनसा बाचा कर्म अगोचर सो मूरति नहिं नैन धरी॥ गुन बिनु गुनी सुरूप रूप बिनु नाम बिना श्री स्याम हरी। कृपासिंधु अपराध अपरिमित छमौ सूर तैं सब बिगरी॥९॥ शब्दार्थ तां लि। प्रभुता ईश्वरता। मनसा मनसे। वाचा वाणी से। अगोचर इन्द्रियजन्य ज्ञान से परे। धरी धारणा की। छमौ क्षमा करो। भाव जीव मानता है कि अपनी शक्ति पर प्रभु प्राप्ति की उसने अनेक साधनां की पर अन्त में यह उसकी भ्रांत धारणा ही निकली। प्रभु तो सर्वत्र व्यापक है पर यह कहां- कहां उसके दर्शन को भटकता फिरा। समझ में न आया कि वह निर्गुण होते हु भी सगुण है निराकार होते हु भी साकार है। अज्ञान में तो अपराध हु ही ज्ञानाभिमान के द्वारा भी कम अपराध नहीं हु। सो अब तो बिगड़ी हु बात क्षमा मांगने से ही बनेगी। १० सारंग आछो गात अकारथ गार।ह्यो। करी न प्रीति कमललोचन सों जनम जनम ज्यों हार।ह्यो॥ निसदिन विषय बिलासिन बिलसत फूटि गं तु चार।ह्यो। अब लाग्यो पछितान पाय दुख दीन द कौ मार।ह्यो॥ कामी कृपन कुचील कुदरसन को न कृपा करि तार।ह्यो। तातें कहत दयालु देव पुनि काहै सूर बिसार।ह्यो॥१०॥ शब्दार्थ आछो अच्छा सुन्दर। गात शरीर। अकारथ व्यर्थ। गार।ह्यो बरबाद कर दिया। ज्यो जीव। तु तेरी। चार।ह्यो चारों नेत्र दो बाहर के नेत्र और दो भीतर के ज्ञान नेत्र। द दुर्दैव दुर्भाग्य। कृपन लोभी घृणित। कुचील मैला गंदा। कुदरसन कुरूप। भाव जनम॥॥हार।ह्यो प्रत्येक जन्म में व्यर्थ ही सुन्दर शरीर नष्ट कर दिया। नर शरीर पाकर भी हरि का भजन करते न बना। जिस शरीर को मोक्ष का द्वार कहा है उसे भी विषय-भोगों में नष्ट कर दिया। पर भक्त को प्रभु की कृपा का अब भी भरोसा है। हरि की कृपा ने बड़े-बड़े कामी कृपण मलिन और कुरूपों को भाव-सागर से तार दिया। लेकिन सूर को तो इस नियम में भी अपवाद प्रतीत होता है। न जाने उस दयालु ने सूर को क्यों बिसरा दिया ११ कान्हरा सो रसना जो हरिगुन गावै। नैननि की छवि यहै चतुरता जो मुकुंद मकरंदहिं धावै॥ निर्मल चित तौ सो सांचो कृष्ण बिना जिहिं और न भावै। स्रवननि की जु यहै अधिका सुनि हरि कथा सुधारस प्यावै॥ कर तै जै स्यामहिं सेवैं चरननि चलि बृन्दावन जावै। सूरदास जै यै बलि ताको जो हरिजू सों प्रीति बढ़ावै॥११॥ शब्दार्थ रसना जीभ वाणी। छवि शोभा। मकरंद पराग। न भावै अच्छा नहीं लगता है। अधिका बड़ा सार्थकता। भाव हरि-परायण होने में ही हरेक इंद्रिय की सार्थकता है यही इस पद का सार है नैननि की॥॥।धावे नेत्रों को अप्रकट रूप से यहां भ्रमर बनाया गया है। उसी नैन रूपी मधुकर के सफल जीवन हैं जो मुकुंदरूपी मकरंद अर्थात कृष्ण-छवि पराग का पान करने के लि दौड़ते हैं। १२ सारंग माधवजू जो जन तैं बिगरै। तौ कृपाल करुनामय केसव प्रभु नहिं जीय धर॥ जैसें जननि जठर अन्तरगत सुत अपराध करै। तो जतन करै अरु पोषे निकसैं अंक भरै॥ जद्यपि मलय बृच्छ जड़ काटै कर कुठार पकरै। त सुभाव सुगंध सुशीतल रिपु तन ताप हरै॥ धर विधंसि नल करत किरसि हल बारि बांज बिधरै। सहि सनमुख तौ सीत उष्ण कों सो सफल करै॥ रसना द्विज दलि दुखित होति बहु तौ रिस कहा करै। छमि सब लोभ जु छांड़ि छवौ रस लै समीप संचरै॥ करुना करन दयाल दयानिधि निज भय दीन डर। इहिं कलिकाल व्याल मुख ग्रासित सूर सरन उबरे॥१२॥ शब्दार्थ त तो भी। नहिं जीय धरै मन में नहीं लाते। जठर अन्तर्गत पेट के भीतर गर्भ में। अंक गोद। रिपु शत्र काटने से तात्पर्य है। धर धरा पृथ्वी। नल नाला। करषि जोत कर। द्विज दांत। भाव जीव के प्रति भगवान की असीम करुणाशीलता है। कितना ही को अपराध करे करुणामय हरि उसे क्षमा ही करते हैं। बच्चा कितने ही अपराध करे माता तो उसे छाती से लगा कर प्यार ही करेगी। मलयागिर कुठाराघात करने वाले के शरीर को भी शीतलता देगा। धरती को हल से जोतते हैं उसे विदीर्ण करते हैं फिर भी वह दुःखों को झेलकर सुन्दर फल देती है। जीभ की भी यही बात है। सदा दांतों तले दबी रहती है पर कभी दांतों पर क्रोध नहीं करती। छहों रसों का स्वाद उनको चखाती है। ऐसे ही ईश्वर अपनों के अज्ञानावस्था में किये अपराधों को क्षमा कर देता है। १३ कान्हरा कीजै प्रभु अपने बिरद की लाज। महापतित कबहूं नहिं आयौ नैकु तिहारे काज॥ माया सबल धाम धन बनिता बांध्यौ हौं इहिं साज। देखत सुनत सबै जानत हौं त न आयौं बाज॥ कहियत पतित बहुत तुम तारे स्रवननि सुनी आवाज। द न जाति खेवट उतरा चाहत चढ्यौ जहाज॥ लीजै पार उतारि सूर कौं महाराज ब्रजराज। न न करन कहत प्रभु तुम हौ सदा गरीब निवाज॥१३॥ शब्दार्थ बिरद बड़ा। न आयौं बाज छोड़ा नहीं। खेवट नाव खेने वाला। उतरा पार उतारने की मजदूरी। न को न बात। भाव इस पद में भक्त ने भगवान के आगे अपना हृदय खोलकर रख दिया है। कहता है तुम्हें अपने विरद की लाज रखनी हो तो तार ही दो। पूछो तो मैं आज तक तुम्हारे काम नहीं आया। इस प्रबल माया अकोन कामिनी-कांचन के बंधन में बहुत बुरी तरह से जकड़ा हूं। देखता हूं सुनता हूं और सब जानता हूं पर जो नहीं करना चाहि वही करता चला जाता हूं। पर यह विश्वास है कि तुम पतितोद्धारक हो। यद्दपि मैं पार उतरा नहीं देना चाहता हूं फिर भी नाव पर चढ़ना चाहता हूं। तुमसे को न बात करने को नहीं कहता। तुम तो सदा से पतितों को पार उतारते आये हो। तुम गरीब-निवाज हो तो मुझ गरीब को भी पार लगा दो। नेकु तिहारे काज त न आयौं बाज द न जाति॥॥जहाज न न करन कहत आदि की बड़ी सुन्दर और मुहावरे-दार भाषा है। अहंकार को भगवान की अगाध करुणा में डुबो देने की ओर इस पद में संकेत किया गया है। १४ रामकली सरन गये को को न उबार।ह्यो। जब जब भीर परीं संतति पै चक्र सुदरसन तहां संभार।ह्यौ। महाप्रसाद भयौ अंबरीष कों दुरवासा को क्रोध निवार।ह्यो॥ ग्वालिन हैत धर।ह्यौ गोवर्धन प्रगट इन्द्र कौ गर्व प्रहार।ह्यौ॥ कृपा करी प्रहलाद भक्त पै खम्भ फारि हिरनाकुस मार।ह्यौ। नरहरि रूप धर।ह्यौ करुनाकर छिनक माहिं उर नखनि बिदार।ह्यौ। ग्राह-ग्रसित गज कों जल बूड़त नाम लेत वाकौ दुख टार।ह्यौ॥ सूर स्याम बिनु और करै को रंगभूमि में कंस पछार।ह्यौ॥१४॥ शब्दार्थ उबार।ह्यौ रक्षा की। भीर संकट। संभार।ह्यौ हाथ में लिया। अंबरीष एक हरि भक्त राजा। दुरवासा दुर्वासा नामके एक महान क्रोधी ऋषि। प्रहार।ह्यौ नष्ट किया। नरहरि नृसिंह। नखनि नाखूनों से। बिदार।ह्यौ चीर फाड़ डाला। रंगभूमि सभा स्थल। भाव जो भी भगवान की शरण में गया उसने अभय पद पाया। यद्यपि भगवान् का न को मित्र है न को शत्रु तो भी सत्य और असत्य की मर्यादा की रक्षा के लि अजन्मा होते हु भी वह रक्षक और भक्षक के रूप धारण करते हैं। प्रतिज्ञा भी यही है। १५ नट जौलौ सत्य स्वरूप न सूझत। तौलौ मनु मनि कंठ बिसारैं फिरतु सकल बन बूझत॥ अपनो ही मुख मलिन मंदमति देखत दरपन माहीं। ता कालिमा मेटिबै कारन पचतु पखारतु छाहिं॥ तेल तूल पावक पुट भरि धरि बनै न दिया प्रकासत। कहत बनाय दीप की बातैं कैसे कैं तम नासत॥ सूरदास जब यह मति आ वै दिन गये अलेखे। कह जानै दिनकर की महिमा अंध नयन बिनु देखे॥१५॥ शब्दार्थ बूझत फिरतु पूछता फिरता है। पचतु परेशान होता है। पखारतु धोता है साफ करता है। तूल रु। पुट दीपक से तात्पर्य है। अलख वृथा। भाव सत्य स्वरूप अपनी आत्मा का वास्तविक रूप। असत् शरीर को ही अविद्यावश आत्मा मान लिया गया है। वह तो सनातन सत्य है। तौलों॥॥।बूझत मणि-माला गले में ही पहने है पर भ्रमवश इधर-उधर खोजता फिरता है। आत्मा तो अन्तर में ही है पर उसे हम जगह-जगह खोजते फिरते हैं। अपनी॥ॅह्हाहिं मुंह में तो अपना काला है पर वह मूर्ख शीशे में कालिमा समझ रहा है उस शीशे को बार-बार साफ कर रहा है। असद।ह्ज्ञान के साधन भी असत् ही होते हैं। जब तक जीवात्मा को स्वरूप का यथार्थ ज्ञान नहीं हुआ उसे सत् असत् का विवेक प्राप्त नहीं हो सकता। १६ लारंग तुम्हारी भक्ति हमारे प्रान। छूटि गये कैसे जन जीवै ज।ह्यौं प्रानी बिनु प्रान॥ जैसे नाद-मगन बन सारंग बधै बधिक तनु बान। ज।ह्यौं चितवै ससि ओर चकोरी देखत हीं सुख मान॥ जैसे कमल होत परिफुल्लत देखत प्रियतम भान। दूरदास प्रभु हरिगुन त्योंही सुनियत नितप्रति कान॥१६॥ शब्दार्थ जन दास। नाद शब्द राग। सारंग मृग। भान भानुसूर्य। भाव यह अनन्यता का वर्णन है। यह तन्मयता से प्राप्त होती है। बिना प्राण के जैसे प्राणी शब्द निरर्थक है वैसे ही भगवद्भक्ति-रहित जीवन व्यर्थ है। मृग का राग-प्रेम चकोर का चन्द्र-प्रेम और कमल का सूर्य प्रेम प्रसिद्ध है। जीव को इसी प्रकार भगवत्प्रेम में तन्मय हो जाना चाहि। १७ कल्याण धोखैं ही धोखैं डहकायौ। समुझी न परी विषय रस गीध्यौ हरि हीरा घर मांझ गंवायौं॥ क।ह्यौं कुरंग जल देखि अवनि कौ प्यास न ग दसौं दिसि धायौ। जनम-जनम बहु करम किये हैं तिन में आपुन आपु बंधायौ॥ ज।ह्यौं सुक सैमर -फल आसा लगि निसिबासर हठि चित्त लगायौ। रीतो पर।ह्यौ जबै फल चाख्यौ उड़ि गयो तूल तांबरो आयौ॥ ज।ह्यौं कपि डोरि बांधि बाजीगर कन-कन कों चौहटें नचायौ। सूरदास भगवंत भजन बिनु काल ब्याल पै आपु खवायौ॥१७॥ शब्दार्थ डहकायौ ठगा गया। गीध्यौ लालच में पड़ गया। कुरंग मृग। जल देखि अवनि कौ ग्रीष्म में धरती से उठती हु गर्म हवा को जल समझ लिया यही मृगतृष्णा है। सेमर शाल्मलि वृक्ष। तूल रू। तांवरो मूर्छा।चौंहटे चौहटाचौक। टिप्पणी क्षणिक विषय-रसों में आनंद मानकर यह जीव आत्मानन्द से विमुख रह गया। धोखे में ठगाया गया। हरि-हीरा को अंतर में खोकर जीवनभर विषय-रस में भूला रहा। कालरूपी सर्प खा गया। ज्यों सुक॥।आयौ। तोता सेमर के फल में रात-दिन आशा लगाये बैठा रहा कि कब पकता है। अंत में पका जानकर चोंच मारी तो अंदर से केवल रु निकली। इससे किसकी भूख बुझी है विषय-सुखों का परिणाम सारहीन ही है। अंत में जब काल-ब्याल के मुख में पड़ गया तब पछताने से क्या होगा १८ नट कहावत ऐसे दानी दानि। चारि पदारथ दिये सुदामहिं अरु गुरु को सुत आनि॥ रावन के दस मस्तक छेद सर हति सारंगपानि। लंका राज बिभीषन दीनों पूरबली पहिचानि। मित्र सुदामा कियो अचानक प्रीति पुरातन जानि। सूरदास सों कहा निठुर नैननि हूं की हानि॥१८॥ शब्दार्थ छेदे काट डाले। सारंगपानि धनुर्धारी राम। पूरबली पुरानी पहले की। निठुरा निर्दयता निठुरां। टिप्पणी कहावत॥।दानि ऐसे दानी आजदानी के नाम से प्रसिद्ध हैं राम और कृष्ण को लोग बड़ा दानी कहते हैं। पर उन्होंने को निःस्वार्थ दान तो दिया नहीं। अकारण दान करते तो दानी अवश्य कहे जाते। फिर भी वे आज दानी के नाम से पुकारे जाते हैं। चारि॥।सुदामहिं सुदामा और श्रीकृष्ण उज्जैन में गुरु सांदीपन के गुरुकुल में पढ़ते थे। सुदामा ने वहां कभी कृष्ण को को कष्ट नहीं होने दिया। यदि द्वारिकाधीश ने तब उसे माला-माल कर दिया होता तो कौन-सी बड़ी बात थी। प्रत्युपकार ही होना था। विभीषण ने घर के सारे भेद राम को बतला दिये थे उन्होंने उसे लंका का राज्य सौंप दिया। फिर भी राम और कृष्ण आदर्श दानी कहे जाते हैं। कुछ हो सूर के साथ तो निठुरा का ही व्यवहार किया नेत्रों से भी हीन कर दिया। १९ देवगंधार मेरो मन अनत कहां सचु पावै। जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै॥ कमलनैन कौ छांड़ि महातम और देव को ध्यावै। परमगंग कों छांड़ि पियासो दुर्मति कूप खनावै॥ जिन मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ क्यों करील-फल खावै। सूरदास प्रभु कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै॥१९॥ शब्दार्थ अनत अन्यत्र। सचु सुख शान्ति। कमलनैन श्रीकृष्ण। दुर्मति मूर्ख खनावै खोदता है। करील -फल टेंट। छेरी बकरी। टिप्पणी यहां भक्त की भगवान् के प्रति अनन्यता की ऊंची अवस्था दिखा ग है। जीवात्मा परमात्मा की अंश-स्वरूपा है। उसका विश्रान्ति-स्थल परमात्माही है अन्यत्र उसे सच्ची सुख-शान्ति मिलने की नहीं। प्रभु को छोड़कर जो इधर-उधर सुख खोजता है वह मूढ़ है। कमल-रसास्वादी भ्रमर भला करील का कड़वा फल चखेगा कामधेनु छोड़कर बकरी को कौन मूर्ख दुहेगा २० नट प्रभु मेरे औगुन चित न धरौ। समदरसी प्रभु नाम तिहारो अपने पनहिं करौ॥ इक लोहा पूजा में राखत इक घर बधिक परौ। यह दुबिधा पारस नहिं जानत कंचन करत खरौ॥ इक नदिया इक नार कहावत मैलो नीर भरौ। जब मिलिकैं दो एक बरन भये सुरसरि नाम परौ॥ एक जीव इक ब्रह्म कहावत सूरस्याम झगरौ। अब की बेर मोहिं पार उतारौ नहिं पन जात टरौ॥२०॥ शब्दार्थ औगुन अवगुण दोष। चित्त न धरौ मन में न ला। पन प्रण प्रतिज्ञा। दुबिधा भेद- भाव । पारस एक पत्थर जिसके स्पर्श से कहते हैं लोहा सोना हो जाता है। खरौ चोखा। असली। नारनाला। सुरसरि गंगा। टिप्पणी भगवान् समदर्शी हैं। ब्राह्मण और चांडाल को वह एक दृष्टि से देखते हैं। जीव अपनी स्वयं की शक्ति से कुछ नहीं कर सकता पुरुषार्थ तो परमात्मा का ही है। यदि वह जीव के अपराधों पर ध्यान देगा तब तो न्याय हो चुका तब उसकी समदर्शिता कहां रह जायेगी। २१ केदारा है हरि नाम कौ आधार। और इहिं कलिकाल नाहिंन रह्यौ बिधि-ब्यौहार॥ नारदादि सुकादि संकर कियौ यहै विचार। सकल स्रुति दधि मथत पायौ इतौ घृत-सार॥ दसहुं दिसि गुन कर्म रोक्यौ मीन कों ज्यों जार। सूर हरि कौ भजन करतहिं गयौ मिटि भाव-भार॥२१॥ शब्दार्थ आधार भरोसा। बिधि वेदोक्त कर्म-कांड से आशय है। ब्यौहार क्रिया साधन। सुक शुकदेव। इतौ इतना ही। गुन गुण-सत्व रज और तमोगुण। जार जाल। भाव भार जन्म मरण के चक्र से अभिप्राय है। टिप्पणी हरि-भजन ही मुक्ति का सर्वोत्कृष्ट और तत्काल फलदायक साधन है। इसलि सब तज हरि भज ही मुख्य है। २२ सारंग रे मन राम सों करि हेत। हरिभजन की बारि करिलै उबरै तेरो खेत॥ मन सुवा तन पींजरा तिहि मांझ राखौ चेत। काल फिरत बिलार तनु धरि अब धरी तिहिं लेत॥ सकल विषय-विकार तजि तू उतरि सागर-सेत। सूर भजु गोविन्द-गुन तू गुर बताये देत॥२२॥ शब्दार्थ हेत प्रेम। वारि कांटों का घेरा जो पशुं से बचाने के लि खेत के चारों तरफ लगा दिया जाता है। उबरे तेरो खेत तेरे जीवन-क्षेत्र की रक्षा हो जाय चेत होशियार हो। सेत सेतु पुल। टिप्पणी यह जीवन क्षेत्र है पर क्षणस्थायी है। इसकी यदि रखवाली करनी है इसे सार्थक बनाना है तो भगवान् का भजन किया कर। काल से मुक्ति पाने का हरि-भजन ही अमोघ उपाय है। काल किसी का लिहाज नहीं करता। विषयों से मोह हटाकर गोविन्द का गुण- गान करने से ही तू संसार-सागर पार कर सकेगा अन्यथा नहीं। २३ सारंग मो सम कौन कुटिल खल कामी। जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ ऐसौ नोनहरामी॥ भरि भरि उदर विषय कों धावौं जैसे सूकर ग्रामी। हरिजन छांड़ि हरी-विमुखन की निसदिन करत गुलामी॥ पापी कौन बड़ो है मोतें सब पतितन में नामी। सूर पतित कों ठौर कहां है सुनि श्रीपति स्वामी॥२३॥ शब्दार्थ कुटिल कपटी। विषय सांसारिक वासनां। ग्रामी सूकर गांव का सूर। श्रीपति श्रीकृष्ण से आशय है। २४ सारंग जापर दीनानाथ ढरै। सो कुलीन बड़ो सुन्दर सी जिहिं पर कृपा करै॥ राजा कौन बड़ो रावन तें गर्वहिं गर्व गरै। कौन विभीषन रंक निसाचर हरि हंसि छत्र धरै॥ रंकव कौन सुदामाहू तें आपु समान करै। अधम कौन है अजामील तें जम तहं जात डरै॥ कौन बिरक्त अधिक नारद तें निसि दिन भ्रमत फिरै। अधिक कुरूप कौन कुबिजा तें हरि पति पा तरै॥ अधिक सुरूप कौन सीता तें जनम वियोग भरै। जोगी कौन बड़ो संकर तें ताकों काम छरै॥ यह गति मति जानै नहिं को किहिं रस रसिक ढरै। सूरदास भगवन्त भजन बिनु फिरि-फिरि जठर जरै॥२४॥ शब्दार्थ ढरे प्रसन्न हो जाय। गर्व हि गर्व गरै अहंकार ही अहंकार में गल कर नष्ट हो जाता है। छत्र राजछत्र। छरे छलता है। किहिं रस रसिक ढरै किस साधन से भगवान् रीझ जाते हैं। जठर जरै गर् भाव स का दुःख भोगता रहेगा। टिप्पणी भगवान् की लीला के अन्दर क्या-क्या रहस्य भरे पड़े हैं को समझ नहीं सकता। को एक सिद्धान्त देखने में नहीं आता। बड़े बड़े उच्चकुलीनों का पतन हो गया और नीच कहे जानेवाले पार हो गये। विभीषन को लंका का राज्य दे दिया और रावण का गर्व धूल में मिला दिया। भिखारी सुदामा को द्वारकाधीश कृष्ण ने अपनी बराबरी का बना लिया योगिराज नारद दर-दर घूमते फिरे। कुरूपा कुब्जा कृष्णको पसन्द आ ग जबकि सीता को जीवनभर वियोग भोगना पड़ा।शंकर जैसे महान् योगी को कामदेव ने छलना चाहा। ये सब विपरीत बातें हुं। भगवान् के प्रसन्न होने का कहां सिद्धान्त स्थिर किया जाय २५ बिलावल मन तोसों कोटिक बार कहीं। समुझि न चरन गहे गोविन्द के उर अघ-सूल सही॥ सुमिरन ध्यान कथा हरिजू की यह एकौ न रही। लोभी लंपट विषयनि सों हित यौं तेरी निबही॥ छांड़ि कनक मनि रत्न अमोलक कांच की किरच गही। ऐसो तू है चतुर बिबेकी पय तजि पियत महीं॥ ब्रह्मादिक रुद्रादिक रबिससि देखे सुर सबहीं। सूरदास भगवन्त-भजन बिनु सुख तिहुं लोक नहीं॥२५॥ शब्दार्थ अघसूल सही पाप-कर्म जनित यातना सहता रहा। यह एकौ न रही एक भी बात पसन्द न आ। हित प्रेम। किरच टुकड़ा। मही छाछ। टिप्पणी बहुत समझाने पर भी यह मन वास्तविक तत्व को समझा ही नहीं। विषय-सुखों से ही मित्रता जोड़ी। उन जैसों के साथ ही इसकी बनी। भगवद्-भजन न किया न किया। कांचन और रत्न को छोड़कर अभागे ने कांच के टुकड़े पसन्द किये। दूध फेंककर मट्ठा पिया सारांश यह कि विषयों में स्थायी आनन्द नहीं। वह तो विवेकपूर्वक किये हु हरि भजन में ही है। २६ बिहाग भजु मन चरन संकट-हरन। सनक संकर ध्यान लावत सहज असरन-सरन॥ सेस सारद कहैं नारद संत-चिन्तन चरन। पद-पराग-प्रताप दुर्लभ रमा के हित-करन॥ परसि गंगा भ पावन तिहूं पुर-उद्धरन। चित्त चेतन करत अन्तसकरन-तारन-तरन॥ गये तरि ले नाम कैसे संत हरिपुर-धरन। प्रगट महिमा कहत बनति न गोपि-डर-आभरन॥ जासु सुचि मकरंद पीवत मिटति जिय की जरन। सूर प्रभु चरनारबिन्द तें नसै जन्म रु मरन॥२६॥ शब्दार्थ सनक सनक सनन्दन सनातन और सनत्कुमार। सेस शेषनाग। संत-चिंतत संतों द्वारा जिनका चिंतन किया जाता है। रमा लक्ष्मी। चेतन चैतन्य ज्ञान-युक्त। अंतसकरन अंतःकरण। हरि-पुर-धरन वैकुंठ में वास कराने वाले। मकरंद पराग।रु अरु और। टिप्पणी परसि गंगा॥।उद्धरन पुराणों में कहा गया है कि जब वामन भगवान् ने राजा बलि से दान में प्राप्त पृथ्वी को अपने पैर से नापा तब अंगूठे के लगने से हिमालय से गंगा की उत्पत्ति हु। इसी से गंगा-जल को हरि-चरणोदक मानते हैं। वात्सल्य २७ धनाश्री जसोदा हरि पालने झुलावै। हलरावै दुलरा मल्हावै जो सो कछु गावै॥ मेरे लाल को आ निंदरिया काहै न आनि सुवावै। तू काहे नहिं बेगहिं आवै तो कों कान्ह बुलावै॥ कबहुं पलक हरि मूंदि लेत हैं कबहुं अधर फरकावै। सोवत जानि मौन ह्वै के रहि करि करि सैन बतावै॥ इहिं अंतर अकुला उठे हरि जसुमति मधुरैं गावै। जो सुख सूर अमर मुनि दुरलभ सो नंद-भामिनि पावै॥१॥ शब्दार्थ पालना झूला। हलरावै हाथ में लेकर हिलाती है। मल्हावै पुचकारती है। जो सो कछु गावै मन में जो आता है वही योंही कुछ गुनगुनाती है। निंदरिया नींद। सैन आंख का इशारा। मधुरै धीरे-धीरे सुर में। नंद-भामिनि नंद की पत्नी यशोदा। टिप्पणी मेरे लाल कों॥।बुलावे में बच्चे को सुलाने के समय का माता का यह गीतोद्गार बड़ा स्वाभाविक है। फिर सोवत जानि॥।बतावै इस पंक्ति में माता की प्रकृति का कितना अच्छा मनोवैज्ञानिक चित्षण किया गया है। उधर कबहुं पलक॥।फरकावै और इहिं अन्तर अकुला उठें आदि में हैं शिशु की स्वाभाविक क्रियां। बाललीला का यह रस देवतां और मुनियों को भी दुर्लभ है। २८ धनाश्री सुत-मुख देखि जसोदा फूली। हरषित देखि दूध की दंतुली प्रेम-मगन तन की सुधि भूली॥ बाहिर तें तब नंद बुला देखौं धौ सुन्दर सुखदा। तनक-तनक-सी दूध-दंतुलियां देखौ नैन सफल करौं आ॥ आनंद सहित महर तब आये मुख चितवत दो नैन अघा। सूर स्याम किलकत द्विज देखे मानों कमल पर बिज्जु जमा॥२॥ शब्दार्थ फूली प्रसन्न हु। दंतुली छोटे-छोटे दांत। तनक-तनक-सी जरा-सी। महर गोप नंद बाबा से तात्पर्य है। द्विज दांत। बिज्जु बिजली। टिप्पणी मनो कमल पर बिज्जु जमा मानो मुख-कमल पर दंत-रूपी दामिनि जड़ी हु है। दूध की दंतुलियां निकल आने पर माता को कितनी प्रसन्नता होती है। २९ धनाश्री किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत। मनिमय कनक नंद के आंगन बिंब पकरिबे धावत॥ कबहुं निरखी हरि आपु छांह कों कर सों पकरन चाहत। किलकि हंसत राजति द्वै दंतियां पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत॥ कनकभूमि पर कर पग छाया यह उपमा इक राजत। करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा कमल बैठकी साजत॥ बालदशा सुख निरखी जसोदा पुनि-पुनि नंद बुलावति। अंचरा तर लै ढांकि सूर प्रभु जननी दूध पियावति॥३॥ शब्दार्थ किलकत किलकारी देते हैं। घुटुरुवनि घुटनों के बल। बिंब परछाहीं कनक सुवर्ण। प्रतिमन प्रतिमां को। अंचरा आंचल। टिप्पणी कनक-भूमि॥।साजत सुवर्ण की धरती पर कृष्ण के हाथ-पैरों की परछाहीं पड़ रही है मानो पृथ्वी कृष्ण के प्रत्येक चरण की मूर्ति बनाकर अपनी कमल की बैठक सजा रही है। नागरी प्रचारिणी सभा काशी से प्रकाशित सूर-सुषमा में पंडित नण।ह्ददुलारे वाजपेयी ने कमल बैठकी के बड़े सुन्दर अर्थ कि हैं इसके दो अर्थ हो सकते हैं। एक तो कमल की बैठक दूसरा कमल से बैठक सजा रही है। पृथ्वी अपनी कमल की बैठक सजा रही है अर्थात अपना सरोज-सदन सजा रही है। दूसरे अर्थ में पृथ्वी कृष्ण के चरणों की प्रतिमा बनाती और हाथों के कमलों से अपनी बैठक सजाती है। पहले अर्थ में अधिक चमत्कार है किन्तु दूसरा अर्थ अधिक स्पष्ट है ३० आसावरी खेलत नंद-आंगन गोविन्द। निरखि निरखि जसुमति सुख पावति बदन मनोहर चंद॥ कटि किंकिनी कंठमनि की द्युति लट मुकुता भरि माल। परम सुदेस कंठ के हरि नखबिच बिच बज्र प्रवाल॥ करनि पहुंचियां पग पैजनिया रज-रंजित पटपीत। घुटुरनि चलत अजिर में बिहरत मुखमंडित नवनीत॥ सूर विचित्र कान्ह की बानिक कहति नहीं बनि आवै। बालदसा अवलोकि सकल मुनि जोग बिरति बिसरावै॥४॥ शब्दार्थ किंकिनी करधनी। लट अलक। मुकुता भरि मोतियों से गुही हु। सुदेस सुंदर। केहरि नख बघनखा बाघ के नख जो बच्चों के गले में सोने से मढ़कर पहना दिये जाते हैं। बज्र हीरा। प्रवाल मूंगा। रज-रंजित धूल से सना हुआ। अजिर आंगन। मुख-मंडित नवनीत मुंह मक्खन से सना हुआ है। बानिक शोभा। ३१ देवगंधार सिखवति चलन जसोदा मैया। अरबरा कैं पानि गहावति डगमगा धरनी धरै पैया॥ कबहुंक सुन्दर बदन बिलोकति उर आनंद भरि लेति बलैया। कबहुंक कुल-देवता मनावति चिर जीवहु मेरी कुंवर कन्हैया॥ कबहुंक बलकों टेरि बुलावति इहिं आंगर खेलौ दो भैया। सूरदास स्वामी की लीला अति प्रताप बिलसत नंदरैया॥५॥ शब्दार्थ अरबरा कैं जल्दी में घबराकर। पानि गहावति हाथ पकड़ाती है। पैयां छोटे-छोटे पैर। बल बलराम। टेरि पुकारकर। टिप्पणी दो डग आगे रखकर नंदनंदन जब अरबराकर गिरने लगते हैं तब यशोदा अपना हाथ पकड़ाकर फिर चलाने लगती हैं बार-बार सुन्दर मुख देखती और बलैया लेती हैं। जब अपने -आप थोड़ा-सा चलने लगते हैं तब बलराम को पुकार कर बुलाती और कहती हैं देखो तुम्हारा भैया कैसा खेलता है आ दोनों भा यहीं आंगन में खेलो। ३२ रामकली मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी। किती बार मोहिं दूध पिवत भ यह अजहूं है छोटी॥ तू तो कहति बल की बैनी ज्यों ह्वै है लांबी मोटी। काढ़त गुहत न्हवावत ओंछत नागिनि-सी भुंई लोटी॥ काचो दूध पिवावति पचि-पचि देति न माखन रोटी। सूर स्याम चिरजीवौ दो भैया हरि-हलधर की जोटी॥६॥ शब्दार्थ किती बार कितना समय कितने दिन यानी बहुत दिन। बल बलदेव। बेनी चोटी। काढ़त बनाते हु। ओंछत कंघी करते हु। भुं भूमि जमीन। पचि-पचि जैसे तैसे। कठिना से हलधर बलदेव। जोटी जोड़ी। टिप्पणी काचो॥॥रोटी मैया तू मुझे कच्चा दूध पिलाती है वह भी राजी से नहीं। मक्खन-रोटी तू मुझे देती नहीं। दा को देती है। हां इसीलि उनकी चोटी लंबी और मोटी है। ३३ रामकली मेरी मा हठी बालगोबिन्दा। अपने कर गहि गगन बतावत खेलन कों मांगै चंदा॥ बासन के जल धर।ह्यौ जसोदा हरि कों आनि दिखावै। रुदन करत ढ़ूढ़ै नहिं पावतधरनि चंद क्यों आवै॥ दूध दही पकवान मिठा जो कछु मांगु मेरे छौना। भौंरा चकरी लाल पाट कौ लेडुवा मांगु खिलौना॥ जो जो मांगु सो-सो दूंगी बिरुझै क्यों नंद नंदा। सूरदास बलि जा जसोमति मति मांगे यह चंदा॥७॥ शब्दार्थ अपने कर गहि अपने हाथ से मेरा हाथ पकड़कर। बासन बर्तन। छौना बच्चा। भौंरा लट्टू। पाट रेशम। लेडुआ लट्टू घुमाने का डोरा। बिरुझे क्यों मचल क्यों रहा है टिप्पणी रुदन॥॥॥आवै बर्तन में जल भरकर यशोदा ने रख दिया और उसमें चंद्र का प्रतिबिंब दिखाकर कहा देखो यह है चंदा मंगा दिया न मैंने तेरे लि। कृष्ण ने उसे पकड़ना चाहा पर हाथ में परछाहीं क्यों आने लगी और भी अधिक रोने लगे। ज्यों-ज्यों उसे ढूंढते वह हाथ में नहीं आता था। ३४ रामकली प्रात समय उठि सोवत हरि कौ बदन उघारौ नंद। रहि न सकत देखन कों आतुर नैन निसा के द्वंद॥ स्वच्छ सैज में तें मुख निकसत गयौ तिमिर मिटि मंद। मानों मथि पय सिंधु फेन फटि दरस दिखायौ चंद॥ धायौ चतुर चकोर सूर मुनि सब सखि सखा सुछंद। रही न सुधिहुं सरीर धीर मति पिवत किरन मकरंद॥८॥ शब्दार्थ निसा के द्वंद रात्रि के झंझट से। पय-सिन्धु दूध का समुद्र। सुकंद प्रसन्नचित्त। किरन मकरंद सुन्दरतारूपी पराग। टिप्पणी रहिन॥।द्वंद कृष्ण का सुन्दर शरीर देखने के लि नन्द बाबा के नेत्र बड़े उत्कंठित हो रहे हैं। निगोड़ी नींद ने इतना बीच डाल दिया नहीं तो वे निरन्तर देखते ही रहते। रात्रि की यह सोने की झंझट बुरी है। उतनी देर तक मुखचंद्र को नन्द बाबा के निद्रित नेत्र न देख सके। स्नेह-पथ में यह घाटा क्या कम है। स्वच्छ सेज॥चंद स्वच्छ सेज में से कृष्ण ने मुख क्या खोला मानो दूध का समुद्र मथे जाने पर उसमें से फेन अलग हो गया और चंद्रमा निकल पड़ा। फेन यहां सफेद चादर है उसके अलग करते ही मुख-चंद्र दीख पड़ा। ३५ गौरी मैया मोहिं दा बहुत खिझायौ। मोसों कहत मोल कौ लिन।ह्हौं तू जसुमति कब जायौ॥ कहा कहौं इहिं रिस के मारे खेलत हौं नहि जात। पुनि-पुनि कहत कौन है माता को है तेरो तात॥ गोरे नंद जसोदा गोरी तू कत स्याम सरीर। चुटकी दै दै हंसत ग्वाल सब सिखै देत बलबीर॥ तू मोहीं कों मारन सीखी दाहिं कबहुं न खीझै॥ मोहन-मुख रिस की ये बातें जसुमति सुनि-सुनि रीझै॥ सुनहु कान्ह बलभद्र चबा जनमत ही कौ धूत। सूर श्याम मोहिं गोधन की सौं हौं माता तू पूत॥९॥ शब्दार्थ जायौ जन्म दिया। रिस गुस्सा। कत क्यों कैसा। चुटकी दै दै ताना मार-मारकर। बलबीर भा बलराम। कबहुं न खीझै कभी नहीं डांटती। चबा चालाक। धूत कपटी। गोधन गाय रूपी धनबहुत सी गों। सौं शपथ। टिप्पणी तू मोहीं॥॥।कबहुं न खीझै इस पंक्ति ने तो भाव में जान डाल दी है। जब देखो तू मुझे ही डांटती-दपटती है। सीधे-सादे को सभी बुरा-भला कहते हैं। मैया दा से तो तू कुछ नहीं कहती। शपथ भी गायों की ग्वालिनी के लि गोधन से बड़ा धन और क्या हो सकता है गाय ही धन है गाय ही धाम है और गाय ही धर्म है। अब भी कृष्ण विश्वास न करेंगे कि यशोदा ही उनकी माता है। ३६ कान्हरा सांझ भ घर आवहु प्यारे। दौरत तहां चोट लगि जैहै खेलियौ होत सकारे॥ आपुहिं जा बांह गहि ल्या खेह रही लपटा। सपट झारि तातो जल ला तेल परसि अन्हवा॥ सरस बसन तन पोंछि स्याम कौ भीतर ग लिवा। सूर श्याम कछु करी बियारी पुनि राख्यौ पौढ़ा॥१०॥ शब्दार्थ सकारे सवेरे। खेह धूल। सुपट सुन्दर वस्त्र। झारि धूल साफ करके। तातो गरम। परसि लगाकर। बियारि ब्यालूरात का भोजन। टिप्पणी दौरत॥॥।सकारे कहां दौड़ते फिरते हो अंधेरे में कहीं गिर पड़ोगे तो चोट लग जायगी। बस करो सवेरे खेलना। ३७ बिहाग खेलत में को काको गुसैयां। हरि हारे जीते श्रीदामा बरबसहीं कत करत रिसैयां॥ जाति पांति हम तें बड़ नाहीं नाहीं बसत तुम्हारी छैयां। अति अधिकार जनावत हम पै हैं कछु अधिक तुम्हारे गैयां॥ रुहठि करै तासों को खेलै कहै बैठि जहं तहं सब ग्वैयां। सूरदास प्रभु कैलो चाहत दांव दियौ करि नंद-दुहैया॥११॥ शब्दार्थ गुसैयां स्वामी। श्रीदामा श्रीकृष्ण का एक सखा। बरबस हीं जबरदस्ती ही। कत क।ह्यौं। रिसैयां गुस्सा। छैयां छत्र-छायां के नीचे अधीन। रुहठि बेमानी। ग्वैयां सुसखा। टिप्पणी हार गये तो बहुत बुरा लगा। खेल में भी अपना विशेष अधिकार चाहते हैं श्रीदामा बिलकुल ठीक कहता है। भा जबरदस्ती ही अपनी जीत मनवाना चाहते हो रूठना हो रूठ जा हम तुमसे डरने वाले नहीं। खेल में कौन किसका मालिक और कौन किसका नौकर फिर तुम हमसे बड़े किस बात में हो तुम भी ग्वाल हम भी ग्वाल। तुम्हारी जमींदारी में तो हम बस नहीं रहे हैं। तुम राजा होगे तो अपने घर के हम लोगों पर शासन जताने आ हैं नंद के राजकुमार तुम्हारे खरिक में कुछ गौं अधिक हैं तो इसी से क्या तुम राजाधिराज हो ग जो खेल में बेमानी करता है उसके साथ कौन खेलेगा ३८ गौरी सखा सहित गये माखन-चोरी। देख्यौ स्याम गवाच्छ-पंथ है गोपी एक मथति दधि भोरी॥ हेरि मथानी धरी माट पै माखन हो उतरात। आपुन ग कमोरी मांगन हरि हूं पा घात॥ पैठे सखन सहित घर सूने माखन दधि सब खा। छूंछी छांड़ि मटुकिया दधि की हंस सब बाहिर आ॥ आ ग कर लियें मटुकिया घर तें निकरे ग्वाल। माखन कर दधि मुख लपटायें देखि रही नंदलाल॥ भुज गहि लियौ कान्ह कौ बालक भाजे ब्रज की खोरि। सूरदास प्रभु ठगि रही ग्वालिनि मनु हरि लियौ अंजोरि॥१२॥ शब्दार्थ गवाच्छ झरोखा। हो था। माट मिट्टी का बड़ा बर्तन जिसमें दही मथा जाता है। कमोरी मिट्टी का छोटा-सा बर्तन जिसमें मक्खन निकालकर रखते हैं। घात मौका। छूंछी खाली। खोरि गली। ठगि रही मोहित हो ग। टिप्पणी ठगि रही ग्वालिनि चोर पकड़ तो लिया पर कुछ करते न बना। माखन-चोर की मोहनी छवि देखकर ग्वालिनी मोहित-सी हो ग। अब तक तो माखन ही चोरी गया था अब मन भी चुरा लिया गया। भौली-भाली गोपी का मन बालगोविन्द ने अपनी मुट्ठी में कर लिया। हाथ में माखन लिये और मुख पर दही का लेप किये गोपाल को देखकर मन हाथ में रखना बड़ा कठिन था। ३९ गौरी मैया री मोहिं माखन भावै। मधु मेवा पकवान मिठा मोंहि नाहिं रुचि आवे॥ ब्रज जुवती इक पाछें ठाड़ी सुनति स्याम की बातें। मन-मन कहति कबहुं अपने घर देखौ माखन खातें॥ बैठें जाय मथनियां के ढिंग मैं तब रहौं छिपानी। सूरदास प्रभु अन्तरजामी ग्वालि मनहिं की जानी॥१३॥ शब्दार्थ मधु स्वादिष्ट। नहिं रुचि आवै पसंद नहीं आते। मन-मन कहति मन ही मन अभिलाषा करती है। ढिंग पास। टिप्पणी मन-मन॥॥छिपानी कभी क्या ऐसा दिन होगा जब अपने घर मे गोपाल को मैं माखन खाते हु देखूंगी अच्छा हो कि मैं छिपकर खड़ी हो जांगा और नंद-नंदन यह जानकर कि अब यहां को नहीं है मथानी के पास बैठकर माखन खाने लगें। ४० देश गोपालहिं माखन खान दै। सुनु री सखी को जिनि बोले बदन दही लपटान दै॥ गहि बहिया हौं लै कै जैहों नयननि तपनि बुझान दै। वा पे जाय चौगुनो लैहौं मोहिं जसुमति लौं जान दै॥ तुम जानति हरि कछू न जानत सुनत ध्यान सों कान दै। सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन कों राखौं तन मन प्रान दै॥१४॥ शब्दार्थ को जिनि बोलै बीच में को मत रोको।तपनि जलन। वापै यशोदा से। जसुमतिलौं यशोदा के पास तक। टिप्पणी नयननि तपनि बुझान दै अरी सखी बीच में बोलकर विघ्न मत कर। तू जानती नहीं कितने दिनों से यह अभिलाषा थी कि कभी कृष्ण को अपने घर में माखन खाते हु देखूं। वह आज कहीं पूरी हु है। इतनी बाकी और है कि मैं इस नन्हें-से प्यारे चोर का हाथ पकड़कर यशोदा के पास ले जां। तू चुप रह। इस सुन्दर छवि की जलधारा से मुझे अपनी आंखों की जलन सिरा लेने दे।
[edit] संबंधित कड़ियाँ
- सूरदास
- सूर_के_पद
- सूर_के_पद-1
- सूर_के_पद-2
- सूरदास (हिन्दी विकिपीडिया पर)