विनयपत्रिका
From Wikisource
[edit] विनयपत्रिका
[edit] TOC
- विनयपत्रिका १-९
- विनयपत्रिका १०-१९
- विनयपत्रिका २०-२९
- विनयपत्रिका ३०-३९
- विनयपत्रिका ४०-४९
- विनयपत्रिका ५०-५९
- विनयपत्रिका ६०-६९
- विनयपत्रिका ७०-७९
- विनयपत्रिका ८०-८९
- विनयपत्रिका ९०-९९
- विनयपत्रिका १००-१०९
- विनयपत्रिका ११०-११९
- विनयपत्रिका १२०-१२९
- विनयपत्रिका १३०-१३९
- विनयपत्रिका १४०-१४९
- विनयपत्रिका १५०-१५९
- विनयपत्रिका १६०-१६९
- विनयपत्रिका १७०-१७९
- विनयपत्रिका १८०-१८९
- विनयपत्रिका १९०-१९९
- विनयपत्रिका २००-२०९
- विनयपत्रिका २१०-२१९
- विनयपत्रिका २२०-२२९
- विनयपत्रिका २३०-२३९
- विनयपत्रिका २४०-२४९
- विनयपत्रिका २५०-२५९
- विनयपत्रिका २६०-२६९
- विनयपत्रिका २७०-२७९
॥ राम ॥
विषयानुक्रमणिका विषय पदाङ्क विषय पदाङ्क श्री गणेश\-स्तुति
- १ श्री राम स्तुति
- २ श्री राम नाम वन्दना
- ३-१४ श्री राम आरती
- १५-१६ हरिशङ्करी\-पद
- १७\-२० श्रीराम\-स्तुति
- २१ श्रीरंग\-स्तुति
- २२ श्रीनर\-नारायण\-स्तुति
- २३\-२४ श्रीविन्दुमाधव\-स्तुति
- २५\-३६ श्री राम वन्दना
- ३७\-३८ श्रीराम\-नाम\-जप
- ३९ विनयावली
- ४० \-\-\- \-\-\- श्रीसीता\-स्तुति
- ४१\-४२ \-\-\- \-\-\- राग\-सूचौ आसावरी
- ४३\-४५ सूर्य\-स्तुति
- ४६ शिव\-स्तुति
- ४७\-४८ देवी\-स्तुति
- ४९ गङ्गा\-स्तुति
- ५०\-५६ यमुना\-स्तुति
- ५७\-५९ काशी\-स्तुति
- ६० चित्रकूट\-स्तुति
- ६१\-६३ हनुमत\-स्तुति
- ६४ लक्ष्मण\-स्तुति
- ६५\-७० भरत\-स्तुति
- ७१\-२७९ शत्रुघ्न\-स्तुति
६२,१८३\-१८८ बिहाग १०७\-१३४ कल्याण २०८\-२११,२१४\-२७९ भैरव २२,६५\-७३ कान्हरा २४,२०४\-२०७ भैरवी १९८\-२०३ केदारा ४१\-४४,२१२\-२१३ मलार १६१ गौरी ३१,३६,४५,१८९\-१९७ मारु १५ जैतश्री ६३,८३\-८४ रामकली ६\-९,१६\-२०,४६\-६१,१०६ टोड़ी
- ७८\-८२ ललित
- ७५\-७७ दण्डक
- ३७ विभास
- ७४ धनाश्री
४\-५,१\.१२,२५\-२९, सारंग ३०,१५५\-१५७ ३८\-४०,८५\-१०५ सूहो बिलावल १३५\-१३६ नट १५८\-१६० सोरठ १६२\-१७८ बसन्त १३\-१४,२३,६४ \-\-\- \-\-\- बिलावल १\-३,२१,३२\-३५,१०७, \-\-\- \-\-\- १३४,१३७\-१५४,१७९\-१८२ \-\-\- \-\-\-
[edit] ॥ राम ॥
॥ श्री हनुमते नमः ॥ दो० श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि । बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि ॥ बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौ पवन\-कुमार । बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेस बिकार ॥ चौपाई जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥ राम दूत अतुलित बल धामा । अंजनि\-पुत्र पवनसुत नामा ॥ महाबीर बिक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ॥ कंचन बरन बिराज सुबेसा । कानन कुंडल कुंचित केसा ॥ हाथ बज्र और ध्वजा बिराजै । काँधे मूँज जनेऊ साजै ॥ संकर सुवन केसरीनंदन । तेज प्रताप महा जग बंदन ॥ बिद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥ प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लखन सीता मन बसिया ॥ सूक्ष्म रुप धरि सियहि दिखावा । बिकट रुप धरि लंक जरावा ॥ भीम रुप धरि असुर सँहारे । रामचन्द्र के काज सँवारे ॥ लाय संजीवन लखन जियाये । श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥ रघुपति कीन्ही बहुत बडाई । तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥ सहस बदन तुम्हरो जस गावैं । अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥ सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा ॥ जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते । कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥ तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥ तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना । लंकेश्वर भए सब जग जाना ॥ जुग सहस्त्र जोजन पर भानू । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥ प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही । जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥ दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥ राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥ सब सुख लहै तुम्हारी सरना । तुम रच्छक काहु को डरना ॥ आपन तेज सम्हारो आपै । तीनो लोक हाँक ते काँपै ॥ भूत पिसाच निकट नहि आवै । महाबीर जब नाम सुनावै ॥ नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥ संकट तें हनुमान छुडावैं । मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥ सब पर राम तपस्वी राजा । तिन के काज सकल तुम साजा ॥ और मनोरथ जो कोई लावै । सोइ अमित जीवन फल पावै ॥ चारो जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥ साधु संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ॥ अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता । अस बर दीन जानकी माता ॥ राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥ तुम्हरे भजन राम को पावै । जनम जनम के दुख बिसरावै ॥ अंत काल रघुबर पुर जाई । जहाँ जन्म हरि\-भक्त कहाई ॥ और देवता चित्त न धरई । हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥ संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥ जै जै जै हनुमान गोसाई । कृपा करहु गुरुदेव की नाई ॥ जो सत बार पाठ कर कोई । छूटहि बंदि महासुख होई ॥ जो यह पढै हनुमान चालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥ तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥ दो० पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप । राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ॥ ॥ इति ॥ सियावर रामचन्द्र की जय । पवनसुत हनुमान की जय ॥ उमापति महादेव की जय । बोलो भाइ सब संतन्ह की जय ॥ ॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥ विनय\-पत्रिका राग बिलावल श्रीगणेश\-स्तुति