यज्ञसंभवा मूर्ति

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यरवड़ा - जेल का लोहे का दरवाजा खुला , और दूसरा बन्द हुआ। फिर दूसरा खुला , तब पहला बन्द हुआ। खाकी वर्दीधारी पुलिस और पीली टोपीवाले वार्डरों के बीच से हम अन्दर गए। सामने दिखाई देती थीं ऊँची दीवालें और उनके बीच बन्दी आकाश। दोनों ओर ईंटोंवाली सड़क और एक - दो पेड़। एक - दो पगडण्डियों से होते हुए एक बड़ी दीवाल पार कर हमारा अंदर प्रवेश हुआ। वहाँ एक छोटा मैदान था। उसमें एक छोटा - सा आम का पेड़ था। उसकी छाया के नीचे खटिया पर दुबले - पतले देहधारी बापू सोये हुए थे। चरण - स्पर्श करके हम बगल में खिसक गए। हमेशा की तरह ‘ क्यों सेठिया ‘ कहकर पीठ पर मुक्का लगाने जितनी ताकत तो उस क्षीण देह में थी नहीं , लेकिन मुँह पर जरा - सी मुसकान आयी। दुनिया की सम्पूर्ण पाशवी शक्ति के सामने निर्भयता से आत्मिक शक्ति का झण्डा फहरानेवाली वह मुसकान थी। बापू के उपवास का वह सातवाँ दिन था। तीन - सप्ताह के उपवास सहजता से खींच ले जाने वाले बापू का शरीर सातवें दिन ही क्षीण हो गया था और कितने घण्टे तक उपवास चल सकेगा , ( यानी बापू जीवित रह सकेंगे ) यही सबके सामने प्रश्न था। ‘अस्पृश्यों को अलग मताधिकार दिया जाएगा , तो उसका विरोध प्राण की बाजी लगा कर मैं करूँगा। ‘ - ये शब्द लन्दन की गोलमेज परिषद में बापू ने कहे , तब बापू को न जानने वालों ने उसको भाषा का अलंकार समझ लिया था। बापू जो कहते हैं वही करते हैं , यह जाननेवालों ने उसको धमकी माना होगा। लेकिन बापू के लिए यह जीवन - मरण का प्रश्न था। अस्पृश्यों को दोहरा मतदाता - मण्डल देकर उनको कायम के लिए अस्पृश्य बनाये रखने की व्यवस्था हो रही थी। हमेशा अस्पृश्यों का पक्ष लेनेवाले बापू इस समय अस्पृश्यों को दोहरा मतदाता - मण्डल नहीं मिलना चाहिए यह आग्रह कर रहे थे , तो दूसरी तरफ अस्पृश्यों के नेता बने हुए भीमराव अम्बेडकर इस उधेड़बुन में थे कि दोहरा मताधिकार गांधीजी ने अगर रुकवा दिया तो उसके बदले अधिक - से - अधिक कितना अधिकार अस्पृश्यों के लिए प्राप्त किया जा सकेगा। मालवीयजी के नेतृत्व में देश के हिन्दू नेता एकत्र होकर बम्बई में तो कभी पूना में विचार - विमर्श कर रहे थे। उधर शिमला में उच्च स्तरों में सलाह - मशविरा हो रहा था और यहाँ के सब समाचार इंग्लैंड के शासकों तक पहुँचाकर उनसे सूचनाएँ प्राप्त की जा रही थीं।

लम्बी चर्चाओं के अन्त में किसी भी समझौते की वार्ता में बरती जानेवाली उदारता से अधिक उदारता का रुख अपनाकर अबेडकर को मनाया गया था। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने जाहिर वचन दिया था कि उनके निर्णय में तभी परिवर्तन हो सकता है, जब सारे हिन्दू - नेता एक राय हो जाँए। लेकिन लन्दन से को ई लिखित सम्वाद बापू के पास नहीं पहुँचा था। पूना में और सारे देश में यह अफवाह फैल गई थी कि इस तरह का हुक्म लन्दन से रवाना हो चुका है। लेकिन जिसके जीवित रहने के लिए एक - एक क्षण महत्व का बन गया था , उसके पास यह हुक्म पहुँचाने में पता नहीं कौन सी लाल-फीताशाही आड़े आ गयी थी !!

चारों ओर से साथी आ पहुँचे थे। सरदार , राजाजी , राजेन्द्रबाबू , सरोजिनी और कमला नेहरू। काका और देवदासभाई तो लगातार भागदौड़ कर रहे थे।

किसीने पूछा , ‘ गुरुदेव अब तक पहुँच जाने चाहिए थे। वे नहीं आए ? ‘
‘ शायद उनको जेल के बाहर पुलिस ने रोका होगा , देवदास , जाओ तो देख आओ। ‘



सचमुच गुरुदेव की मोटर को पुलिस ने बीच में रोक लिया था। देवदासकाका यदि समय से न पहुँचे होते तो और देर हो जाती।

गुरुदेव बापू के पास पहुँचे तो बापू ने उनको दीर्घ समय तक छाती से लगा लिया। हमेशा की तरह झुककर प्रणाम करने का यह अवसर नहीं था।

काका बोले , ‘ बहुत अच्छा हुआ आप आ गये। बापू चातक की तरह आपकी राह देख रहे थे। ‘
‘ मेरे आने से देश की समस्या हल होने में कुछ मदद होगी , ऐसा मानने की भूल मैं नहीं करूँगा। लेकिन मेरे आने से बापू को सन्तोष हुआ , यह मेरे लिए आनन्द की बात है। ‘



अधिक बातचीत नहीं हुई। गुरुदेव बापू की खटिया के पास थोड़ी देर बैठे और बाद में दूर एक कोने में जाकर बैठ गये। बापू का शरीर क्षीण हो गया था लेकिन उनका चित्त क्षीण नहीं था। राजनीतिक नेताओं के साथ की चर्चा में पहले की तरह वे गहराई में जाते थे। गुरुदेव के साथ प्रत्यक्ष बातचीत भले ही नहीं हो रही थी , लेकिन उन दोनों में आत्मिक अनुसंधान चालू था। मृत्यु की वेदी पर सोये हुए इस महात्मा का स्वर आज भारत की कोटि - कोटि जनता तक पहुँच चुका था। जेल की दीवारें , राजनीति-पटु लोगों की चालें,या सैकड़ों वर्षों से चली आयी अन्य मान्यताएँ महात्मा के इस स्वर को रोक नहीं सकीं। इसी कारण सारा भारत इस चिन्ता में था कि किस प्रकार समझौता हो और कौन - से प्रायश्चित से महात्मा के प्राण बच जायँ।

जेल में उनके चारों ओर बैठे लोगों में बहुत - से सत्याग्रही भी थे। उनके चेहरों पर से चिन्ता टपकती थी , लेकिन किसी का भी चेहरा म्लान नहीं था। उनके चारित्र्य का असर जेल के अधिकारियों पर पड़ा था। इसीलिए जेल के अन्दर बेखटके घूमने की उनको इजाजत मिली थी। किसी भी सत्याग्रही ने इसका दुरुपयोग नहीं किया था।

बापू के इस राष्ट्रशुद्धि के यज्ञ के साथ मेरा भी चित्त्शुद्धि का यज्ञ हो गया। गत चरखा - द्वादशी के दिन मैंने कताई किये बगैर ही आश्रम के रजिस्टर में झूठ्मूठ तार लिखवा दिये थे। यह बात किसीने काका से कह दी। ‘ क्या तू झूठ बोला ? तुझसे ऐसी अपेक्षा नही थी। ‘ - काका ने दर्दभरे स्वर से कहा। और मेरी आँखों से आँसुओं ने टप - टप टपककर प्रायश्चित कर लिया।

आखिर जेल के अधिकारी सरकारी दूत के साथ के साथ हाजिर हो गये। उनके चेहरे पर आनन्द नाच रह था। बापू ने गम्भीरता से सरकारी पत्र पढ़ा , फिर दूसरों को पढ़ने दिया। उस पत्र से सबको सन्तोष हुआ। फिर भी पं. हृदयनाथ कुंजरू को वह पत्र दिया गया और उसके एक - एक शब्द की बारीकी से छानबीन की गयी। बापू को इस छानबीन से सन्तोष हुआ। फिर भी उपवास छोड़ने का निर्णय करने से पहले वह सरकारी पत्र बापू ने अम्बेडकर को बताया। उनकी स्वीकृति मिली , तब अनशन तोड़ने का निर्णय लिया गया। कमलादेवी नेहरू नारंगी का रस लायीं। उपवास की समाप्ति कस्तूरबा के हाथ से हो , इस दृष्टि से रस का गिलास उनके हाथ में दिया गया। प्रार्थना की गयी। ऐसी प्रार्थना में उपस्थित रहने का अवसर मिलना एक सौभाग्य की बात थी।

गुरुदेव ने अपने कोमल , करीब - करीब नारीतुल्य स्वर में ‘ जीवन जखन शुकाये जाय , करुणा धाराय एशो ‘ यह गीत गाया। इस गीत का मेरे काका द्वारा किया गया गुजराती अनुवाद यहाँ दिये बगैर रहा नही जाता -

जीवन जब सुकाई जाय
करुणा वर्षतां आवो।
मधुरी मात्र छुपाई जाय
गीत सुधा झरतां आवो।
कर्मनां ज्यारे काळां वादळ
गरजी गगड़ी ढांके सौ स्थल।
हृदय आंगणे हे नीरवनाथ-
प्रशान्त पगले आवो !
मोटुं मन ज्यारे नानुं थई ,
छुपाई जाये ताळुं दई
ताळुं तोडी , हे उदार नाथ
वाजतां गाजतां आवो।
काम - क्रोधनां आकरां तुफान
आंधळां करी भुलावे भान।
हे सदा जागन्त, पाप धुवन्त।
बीजली चमकतां आवो !



हिन्दी रूपान्तर :

                    जीवन जिस दिन रीते उस दिन
                                         करुणा धारा बन आना
                       सकल माधुरी बीते जिस दिन
                                        गीत सुधा-रस बरसाना !
                       कर्म प्रबल आकार धरे जब
                                        गरजे - तरजे दिशा भरे सब
                         हे जीवन-प्रभु शान्त चरण से
                                      मन का आँगन सरसाना !
                        दीन हीन मन जब कोने में
                                      सुख माने छुपकर रोने में
                         गाजे-बाजे से उदार हे
                                           द्वार खोलकर मुसकाना !
                          उठे वासना की आँधी जब
                                           पंथ - कुपंथ नही सूझे तब
                           हे पवित्र तुम हे अनिद्र तुम
                                           रुद्र-किरण बनकर छाना !


इसके बाद मोटी बा ( कस्तूरबा ) ने बापू को नारंगी का रस धीरे -धीरे पिलाया। फिर वहाँ उपस्थित सब लोगों ने मिलकर “वैष्णवजन” भजन गाया -


  वैष्णवजन तो तेने कहीये, जे पीड पराई जाणे रे।
  परदु:खे उपकार करे तोये , मन अभिमान न आणे रे।

सबको फल और मिठाई की प्रसादी बाँटी गयी। बापू के उपवास-यज्ञ की यह फलश्रुति थी। इस प्रसंग का शान्ति-निकेतन के अपने साथियों को सुनाते हुए गुरुदेव ने कहा था , ‘ प्राणोत्सर्ग का यज्ञ कारागृह में शुरु हुआ , उसकी सफलता वहीं पर मूर्तिमन्त हुई और मिलन की वह अकस्मात आविर्भूत हुई अपरूप मूर्ति -इसीको यज्ञसम्भवा कहते हैं।’