बापू की प्रयोगशाला

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सैकड़ों सालों की कंगाली के परिणामस्वरूप अज्ञान का बोझ ढोते - ढोते भारत की ग्रामीण जनता के सामाजिक जीवन को एक प्रकार का लकवा मार गया था। उसमें किसी भी घटना या प्रसंग से चेतना जाग ही नहीं सकती थी। ग्रामीण जनता की शुष्क भूमि में से आर्द्रता का रहा - सहा अंश भी बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में मानो सूख गया था। वैसे तो उस समय सारी दुनिया में ही अभूतपूर्व आर्थिक संकट खड़ा हो गया था। लेकिन प्रेसिडेन्ट रूजवेल्ट के नेतृत्व में अमरीका उस संकट को पार करके आगे बढ़ने लगा था। इस परिस्थिति में ही जर्मनी में हिटलर पैदा हुआ था। राजनीतिक दृष्टि से १९३२ - ३४ के आन्दोलन के बाद भारत आराम की साँस ले रहा था। लेकिन कोई नया आन्दोलन छिड़ने के लक्षण देश में नहीं दीख रहे थे। आर्थिक दृष्टि से देश की स्थिति स्वाभाविकतया अधिक बिगड़ गयी थी। इसी समय बापू ने अपने कदम गाँवों की ओर बढ़ाये। उनका रास्ता कष्टमय , लम्बा और तरह - तरह की कठिनाइयों वाला था।

क्या थी गाँवों की दशा ? गुजरात में रहनेवाले तो इसकी कल्पना ही नहीं कर सकेंगे। दरिद्रता में से सिर ऊँचा करने की ताकत खो बैठे , ये गाँव ! अस्वच्छता और बीमारियों का घर बने और सैकड़ों वर्षों का अज्ञान भरे !

वर्धा में मगनवाड़ी में रहते थे , तभी से बापू ने पड़ोस के सिन्दी गाँव में सफाई का काम शुरु कर दिया था। मैं मगनवाड़ी में रहने गया , तब बापू सेगाँव जा चुके थे। सिन्दी गाँव की सफाई में बापू की जगह काका जाने लगे थे। शहर से लगा हुआ वह गाँव था , न कि रेलवे से दूर किसी जंगल का। लेकिन उस गाँव के लोग कई महीनों तक गांधीजी , महादेवभाई और उनके साथियों को गाँव की सफाई करनेवाले भंगी-से ही मान बैठे थे। हाँ , ये भंगी पैसे नहीं लेते थे , यह लाभ जरूर था। एक आदमी हाथ में लोटा लिये शौच करके आ रहा था। उसने उँगली से इशारा करते हुए काका से कहा,’अरे, उस तरफ जाओ,वहाँ अधिक गन्दगी है -’ त्या बाजूला जा , तिकडे जास्त घाण आहे।

साबरमती - आश्रम में मेरी बारी आती ,तब मैं संडास-सफाई का काम करता था। लेकिन वहाँ संडास की बालटियों को खाद के गढ़ों में डालने और नारियल के झाडू से बालटियाँ साफ करने का काम था। यहाँ तो बिना ढँका हुआ ताजा मैला फावडे से या टीन के टुकड़े से सीधे उठाने का काम था। कुछ जगहों पर तो पुराने मैले में कीड़े बिलबिलाते थे , उसको उठाना एक कठिन परीक्षा थी। लेकिन काका निष्टापूर्वक वह काम किये जा रहे थे।

एक दिन रविवार को मैंने बापू से पूछा,’ बापूजी, ऐसे काम से क्या लाभ है? गाँव वालों पर तो कोई असर ही नहीं हो रहा है। उलटे हमारे पास आकर जहाँ-जहाँ मैला पड़ा होगा , वहाँ - वहाँ जा कर उठाने का हुक्म छोड़ते हैं।’ बापू ने कहा ,’ बस,इतने में ही थक गया ? महादेव को पूछ, वह कब से सफाई कर रहा है। महादेव के काम में भक्ति है,वह तुझमें आनी चाहिए। अस्पृष्यता का कलंक ऐसा-वैसा नही है। उसको मिटाने के लिए हमें दीर्घ तपस्या करनी पड़ेगी।’

लेकिन इतनी दलील से मेरा समाधान कैसे होता ! मैंने कहा ,’बापू, उनमें कोई सुधार ही न होता हो तो सफाई से लाभ ही क्या है ? ‘ बापू ने चर्चा को एक नया मोड़ देते हुए कहा ,’ सफाई करनेवाले का तो लाभ होता है न ? उसको तालीम मिल रही है।’ मैंने कहा ,’तालीम तो गाँववालों को भी मिलनी चाहिए।’ बापू हँसकर बोले , ‘ तू वकील है,वकील। तेरे कहने में सार जरूर है। उन लोगों को तालीम देना हम को आ जाए, तो मैं नाचूँगा।’ अपनी बात आगे बढ़ाते हुए बापू ने कहा , ‘ तेरी जगह मैं होता तो ध्यान से देखता। कोई शौच करके उठा हो तो तुरन्त वहाँ दौड़ जाता। उसके मैले में खराबी नजर आती , तो उससे नम्रतापूर्वक कहता,’ देखो भाई, तुम्हारा पेट बिगड़ा है। तुमको अमुक इलाज करना चाहिए। इस तरह उसका हृदय मैं जीत लेता।’

मैं चुप हो गया। यह देखकर बापू का उत्साह बढ़ा। उन्होंने कहा , ‘ मेरा बस चले तो उस रास्ते को झाड़ू लगाकर साफ-सुथरा कर दूँ। इतना ही नहीं, बल्कि वहाँ फूल के पौधे लगा दूँ। रोज पानी दूँ और आज जहाँ घूरा है , वहाँ सुन्दर-सा बगीचा बना दूँ। सफाई का काम एक कला है, कला।’

निजी तौर पर सेगाँव के काम को बापू ने हाथ में लिया था , तो सामाजिक तौर पर उन्होंने अपने संस्थागत प्रयोग भी शुरु कर दिये थे। मगनवाड़ी में अखिल भारत ग्रामोद्योग संघ का मुख्य दफ्तर था। लेकिन बापू ने जिन संस्थाओं की स्थापना की , उनका मुख्य दफ्तर उस क्षेत्र की एक प्रयोग-शाला ही बन जाती थी। मगनवाड़ी में एक तरफ तेल घानी चलती थी , तो दूसरी तरफ हाथ - कागज बन रहा था। वाड़ी में जगह - जगह मधुमक्खी - पालन की पेटियाँ दिखाई दे रही थीं। विविध प्रकार की आटा पीसने की चक्कियों के प्रयोगों में खुद बापू भी भिड़ जाते। इन उद्योगों के साथ-साथ ग्रामोद्योगों की तालीम देने के लिए विद्यालय भी चलाया जा रहा था। देश - विदेश में अर्थशास्त्र की विद्या पढ़ने के बाद , ‘ भारत के अर्थशास्त्र की कुंजी तो ग्रामोद्योगों में ही है ‘ इस श्रद्धा से बैठे हुए जे.सी. कुमारप्पा और उनके छोटे भाई भारतन कुमारप्पा तो मगनवाड़ी की शोभा थे। जे.सी. कुमारप्पा के ओजस्वी सम्पादकत्व में ‘ ग्रामोद्योग पत्रिका ‘ नामक साप्ताहिक भी प्रकाशित होता था। मेरे पिताजी विनोद में कुमारप्पा को कई बार ‘अहिंसा के हिंसक प्रतिपादक’ ( Violent exponent of non-violence ) कहते थे।

इन प्रयोगों के साथ बापू के रसोई के प्रयोग भी चलते थे। उन दिनों सोयाबीन में अमुक - अमुक गुण हैं इत्यादि चर्चा बहुत होती थी। इसलिए सोयाबीन के प्रयोग शुरु हुए। लेकिन थोड़े दिनों के बाद उत्साह कम हुआ और वे प्रयोग बन्द हो गये। सूरजमुखी के तेल का प्रयोग , फिर कडुवे नीम की पत्तियों की चटनी के प्रयोग , इमली के प्रयोग इत्यादि। बापू कहते थे , ‘इमली तो गरीबों का फल है। भारत के लाखों देहातों को उसका लाभ मिल सकता है। लेकिन उसका उपयोग जीभ के स्वाद के खातिर करने के बदले शरीर - पोषण के लिए किया जाना चाहिए।’ इन प्रयोगों के अलावा चूल्हों के अलग - अलग प्रयोग। किस प्रकार के चूल्हे में कम लकड़ियाँ खर्च होती हैं , यह देखने में बापू को बहुत रस रहता था। कुछ दिनों के बाद देशी तेल से जलने वाली लालटेनों के भी प्रयोग चले। इन प्रयोगों में से जो शोध हाथ में आए , उन्हींके परिणामस्वरूप ‘ मगन चूल्हा ‘ और ‘ मगनदीप ‘ का अविष्कार हुआ। नीरा से गुड़ बनाने और खजूर के पत्तों से अन्य चीजें बनाने के प्रयोग भी होते थे।

उस समय के ग्रामोद्योग - संघ ने ऐसे कार्यकर्ता तैयार किए , जिनकी ग्रामोद्योगों में गहरी निष्ठा हो गयी। आज देश में जहाँ कहीं भी ग्रामोद्योगों की अच्छी प्रवृत्तियाँ चलती दिखाई देती हैं , वहाँ ऐसा कोई कार्यकर्ता जरूर मिलेगा , जो मगनवाड़ी की हवा खाकर आया हो।

खादी के प्रयोग ग्रामोद्योगों से आगे बढ़े हुए थे। उन दिनों खादी के अर्थशास्त्र की दृष्टि से एक महत्व का प्रस्ताव चरखा - संघ ने किया था , वह है कत्तिन - बुनकरों को जीवन - वेतन देने का प्रस्ताव। वर्धा और चांदा जिले में खादी का काम अधिक होता था। लेकिन बापू ने देखा कि दिनभर कताई करके भी कत्तिन को सिर्फ सवा आना मिल रहा है , तो वे काँप उठे। चरखा - संघ की बैठक बुलाकर कताई की दर बढ़ाने की बात बापू ने आग्रहपूर्वक रखी। बापू ने कहा कि आठ घण्टे के काम की मजदूरी कम-से-कम आठ आना कत्तिन को मिलनी चाहिए ( यह १९३६ की बात है ) । खादी के व्यवहार-कुशल लोगों ने हिसाब जोड़कर खादी के भाव कितने बढ़ जाएंगे , यह बताना शुरु किया। आखिर आठ घण्टे में तीन आने मजदूरी देने का प्रस्ताव स्वीकार किया गया। विनोबा ने इस प्रस्ताव पर एक लेख लिखा था , जिसका शीर्षक था - ‘ अथातो न्यायारम्भ:’ ( अब न्याय का प्रारम्भ हुआ )। खादी के भाव दुगुने बढ़े , लेकिन उसकी खपत में ५० प्रतिशत की कमी हुई हो , ऐसा अनुभव नहीं आया। लाखों कत्तिनों के पेट आधे भर गए। इन दिनों बापू की हालत उन स्वामीजी के जैसी हो गयी थी , जिनके बदन में सामने की गली में जाड़े से ठिठुरते हुए भिखारी को देख कर ठण्ड लग रही थी। स्वामीजी के बदन पर एक के बाद एक कपड़ा डाला जा रहा था , लेकिन उनका ठिठुरना कम नही हो सका। अन्त में उस भिखारी के बदन को ढाँका गया , तब कहीं स्वामीजी की ठण्ड दूर हुई। इस तरह बापू की भूख कत्तिनों की मजदूरी बढ़ने के बाद ही मिटी। बापू ने ग्रामीण जीवन की ओर ध्यान देना शुरु किया , तब से उनकी हर प्रवृत्ति की एक ही कसौटी रहती थी - क्या इससे देश के दरिद्रनारायण के पेट भर सकते हैं ? किसी कुशल गायक के कंठ से निकले स्वरों के साथ पास में पड़े हुए तन्तुओं के तार झनझनाते हैं , वैसे बापू की हृदय-वीणा के तार देश के दरिद्रनारायण की वेदना के स्वर से झनझनाते थे।