पत्र और पत्राचार

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दिल्ली 15.11.2000

प्रिय योगेंद्र जी,

आपका स्नेहपूर्ण पत्र मिला। धन्यवाद।

आपने जो कुछ मेरी कहानियों के संबंध में लिखा, वह आपकी संवेदनशील लेखकीय दृष्टि और सहृदयता का ही परिचय देता है।

पटना में बिताए दो अविस्मरणीय दिन आंखों के सामने घूम गए, आपका पत्र पढ़ते हुए। शायद ही किसी शहर के पाठकों, साहित्य-प्रेमियों ने मेरे प्रति इतनी स्नेहसिक्त उदारता प्रगट की हो, जितना पटना में मुझे मिली। यह संयोग नहीं है कि जयप्रकाश जी और रेणु-- बिहार की दो महान विभूतियां-- मेरी प्रेरणा के सतत स्रोत रहे हैं।

साक्ष्य की प्रति मुझे मिल गई थी, जिसके लिए आभारी हूं। आपकी कहानी पढ़ कर मन बहुत उद्वेलित हुआ था-- अस्पताल का इतना बीहड़ और पीड़ायुक्त विवरण मेरे लिए इसलिए भी इतना जीवित था, क्योंकि इन्हीं दिनों मैं भी कुछ दिन अस्पताल में रह कर लौटा था। पिता का चरित्र यदि कम नाटकीय और अधिक स्पष्ट होता, तो शायद अधिक विश्वसनीय बन पड़ता। अस्पताल का वातावरण जितना अधिक प्रभावित करता है, उतना पिता-पुत्र के संबंध नहीं, जो कुहासे में ही छिपे रहते हैं। किंतु यह एक सचमुच सशक्त रचना बन पड़ी है, इसमें कोई संदेह नहीं।

साक्ष्य में कविताओं का पक्ष कहानियों की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली है। मुझे विशेष रूप से अरुण कमल और ज्ञानेंद्रपति की कविताएं बहुत अच्छी लगीं। संस्मरण में नंद किशोर नवल का `पटना परिदृश्य´ बेजोड़ है, बेहद पठनीय और अनेक दिलचस्प तफसीलों से भरा हुआ। नागार्जुन के चरित्र के विभिन्न पहलू बहुत अच्छी तरह उभर कर आए हैं। नवल जी को इन सब पर एक पुस्तक लिखनी चाहिए-- उन्हें मेरी बधाई दीजिए।

और तो विशेष कुछ नहीं। जाबिर हुसैन साहब को मेरा प्रणाम दें।

सस्नेह,

आपका,

निर्मल वर्मा



वाई ए 1, सहविकास 68, इंद्रप्रस्थ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली 92 19.1.2001

प्रिय योगेंद्र जी, आपका स्नेहपूर्ण पत्र मिला था। इस दौरान मुझे दो-तीन बार दिल्ली के बाहर जाना पड़ा, अत: आपको शीघ्र न लिख सका।

आपने अंतिम अरण्य पर जो कुछ लिखा, वह मेरे लिए बहुत मूल्यवान है। सबसे अधिक प्रसन्नता की बात यह है, कि आपकी संवेदनशील दृष्टि ने उपन्यास के मर्म को पकड़ा है. आपने बहुत सुंदर, सटीक ढंग से उपन्यास के विभिन्न पात्रों की अंत:प्रक्रियाओं का विवरण दिया है। किसी कथाकृति के विशिष्ट संसार में कैसे प्रवेश किया जाता है--आपका पत्र इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। क्या हमारे समीक्षक कभी इतनी सूक्ष्मता से किसी कृति के सत्य को उद्घाटित करने की संवेदनात्मक दृष्टि अर्जित कर सकेंगे?

आपकी कहानी पढ़ी। वह एक बहुत खामोश कहानी है, न कहने में भी छोटी स्पेस में बहुत कुछ कहती है. फिर भी एक तरह का असंतोष आखीर में छोड़ जाती है--अपनी समस्त भाषाई सुंदरता के बावजूद। शायद यह असंतोष कथ्य की अस्पष्टता के कारण उपजता है। पिछली कहानी की तरह यहां भी संबंधों की दुनिया कुहरे में ढकी रहती है। आपको परिवेश के यथार्थ को अधिक ठोस, अधिक प्रमाणिक बनाने का प्रयास करना चाहिए। भाषा की पारदर्शिता बहुत सम्मोहित करती है किंतु पात्रों की भावनात्मक दुनिया में प्रवेश करने के लिए वह ही काफी नहीं है। फिलहाल मैं इतना ही कह सकता हूं।

आशा है आप सानंद होंगे। नए वर्ष की शुभकामनाएं,

आपका, निर्मल वर्मा



दिल्ली 21.5.2001


प्रिय योगेंद्र जी,

आपका पत्र मिला। मैं पिछले दिनों देश के बाहर था, अत: आपके पत्र का उत्तर शीघ्र न दे सका। मुझे विलंब के लिए गहरा अफसोस है।

आपकी काव्य पुस्तक मिल गई थी। उसे पढ़ना बहुत अच्छा भी लगा, किंतु हर रचना के बारे में अपनी प्रतिक्रिया भेजना संभव नहीं हो पाता।

आपका अंतिम अरण्य पर आलेख बहुत सुंदर और भाव-प्रवण है। यदि आप चाहें, तो इसे कलकत्ता से निकलने वाली पत्रिका वागर्थ में भेज सकते हैं। जहां तक मेरा ख्याल है, अभी तक उसमें अंतिम अरण्य की कोई समीक्षा नहीं छपी है। आप इच्छानुसार इसे किसी दूसरी पत्रिका में भी भेज सकते हैं। लेख इतना विचारशील है कि इसे हर पत्रिका का संपादक प्रकाशित करना चाहेगा।

आशा है, आप सानंद हैं।

सस्नेह,

आपका निर्मल वर्मा



दिल्ली 1 अगस्त, 2001

प्रिय योगेंद्र जी,

आपका पत्र मिला। अंतिम अरण्य पर आपकी समीक्षा वागर्थ में दुबारा पढ़ी, और इस बार पहली बार से भी अधिक भावप्रवण, प्रांजल और प्रभावशाली जान पड़ी। आपकी समीक्षा पर जो प्रशंसापूर्ण पत्र आए, उन्हें पढ़ कर सचमुच बहुत प्रसन्नता हुई। हिंदी जगत में अब सुदूर कोनों में साहित्य के मर्मज्ञ पारखी पाए जा सकते हैं, यह इन पत्रों से स्पष्ट है।

आपने पत्र लेखकों को राजकमल का पता लिख दिया, इसके लिए आभारी हूं। आश्चर्य है, श्रोत्रिय जी ऐसी भूल कैसे कर सकते थे? मुझे खुशी है, आपने पत्र लिख कर स्पष्टीकरण कर दिया।

आशा है आप हमेशा की तरह सृजनरत होंगे। शुभकामनाओं के साथ,


आपका, निर्मल वर्मा

गगन जी को आपकी शुभकामनाएं दे दी है.


दिल्ली 21.3


प्रिय योगेंद्र जी,

आपका पत्र और काव्य पुस्तक मिली। आपकी कविताएं धीरे-धीरे पढ़ रहा हूं, और उनमें से कुछ बहुत अच्छी भी लगी हैं। मुझे खेद है, कि मैं आपको पुस्तक की प्राप्ति सूचना शीघ्र नहीं दे सका।

आशा है, आप सानंद होंगे।

सस्नेह, निर्मल वर्मा



वाई ए 1 सहविकास, 68 इंद्रप्रस्थ एक्सटेंशन पटपड़गंज, दिल्ली 92 21.4.2003


प्रिय योगेंद्र जी,

आपका पत्र मिल गया था। इस बीच मुझे जरेवी जाना पड़ा, जहां भारतीय साहित्य पर एक विचार गोष्ठी आयोजित हुई थी। इसी कारण आपको यह पत्र इतने विलंब से लिख रहा हूं।

आशा है, अब तक आप नए घर में रस-बस गए होंगे।

आपकी कविता पढ़ी, अच्छी लगी। और आजकल क्या लिख पढ़ रहे हैं?

आपका स्वास्थ्य कैसा है? उसका ध्यान रखें। सस्नेह,


आपका, निर्मल वर्मा



दिल्ली 5 नवंबर, 2004

प्रिय योगेंद्र जी,

आपका पत्र मिला. मुझे नहीं मालूम था कि आप जब पिछली बार दिल्ली आए थे, तो आपका अनुभव इतना कटु और अप्रीतिकर रहा था. यहां के लोग काफी आक्रामक और रूखे हो सकते हैं, इस बारे में हमें भी--जो यहां रहते हैं--बार-बार याद दिलाया जाता है!

आपने अंतिम अरण्य के जर्मन में अनुवाद होने के संबंध में जिस विवाद की चर्चा की, उसे पढ़ कर काफी अजीब लगा. जर्मन लोग--योरप वासियों की तरह--मृत्यु के काफी निकट रह चुके हैं--स्वयं उनके साहित्य में एक ऐतिहासिक अनुभव के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक विमर्श का भी मृत्यु एक सनातन विषय रही है. आश्चर्य का दूसरा कारण यह था कि इस उपन्यास का जर्मन अनुवाद तुबिंगन वि.वि. के एक इंडोलॉजिस्ट ने पहले से ही आरंभ कर रखा है. पिछली बार (दो वर्ष पूर्व) जब मैं जर्मनी गया था तो उनसे मिला भी था. आपने जिस प्रोजेक्ट के बारे में लिखा है, उसके अंतर्गत कौन से व्यक्ति उपन्यास का अनुवाद कर रहे हैं, कृपया उनका नाम लिख सकते हैं?

नंदकिशोर आचार्य के संकलन में अनेक उत्कृष्ट लेख स्थानाभाव के कारण नहीं जा सके. मुझे दु:ख है उन्होंने आपके लेख को अपनी पुस्तक में सम्मिलित नहीं किया.

आशा है, आप सानंद हैं.

सस्नेह,

आपका, निर्मल वर्मा