From Wikisource
॥गोस्वामी तुलसीदास कृत दोहावली ॥
॥ श्रीसीतारामाभ्यां नमः ॥
दोहावली
ध्यान
राम बाम दिसि जानकी लखन दाहिनी ओर ।
ध्यान सकल कल्यानमय सुरतरु तुलसी तोर ॥
सीता लखन समेत प्रभु सोहत तुलसीदास ।
हरषत सुर बरषत सुमन सगुन सुमंगल बास ॥
पंचबटी बट बिटप तर सीता लखन समेत ।
सोहत तुलसीदास प्रभु सकल सुमंगल देत ॥
राम-नाम-जपकी महिमा
चित्रकूट सब दिन बसत प्रभु सिय लखन समेत ।
राम नाम जप जापकहि तुलसी अभिमत देत ॥
पय अहार फल खाइ जपु राम नाम षट मास ।
सकल सुमंगल सिद्धि सब करतल तुलसीदास ॥
राम नाम मनीदीप धरु जीह देहरी द्वार ।
तुलसी भीतर बाहरेहुँ जौं चाहसि उजियार ॥
हियँ निर्गुन नयनन्हि सगुन रसना राम सुनाम ।
मनहुँ पुरट संपुट लसत तुलसी ललित ललाम ॥
सगुन ध्यान रुचि सरस नहिं निर्गुन मन ते दूरि ।
तुलसी सुमिरहु रामको नाम सजीवन मूरि ॥
एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ ।
तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ ॥
नाम राम को अंक है सब साधन हैं सून ।
अंक गएँ कछु हाथ नहिं अंक रहें दस गून ॥
नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु ।
जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु ॥
राम नाम जपि जीहँ जन भए सुकृत सुखसालि ।
तुलसी इहाँ जो आलसी गयो आजु की कालि ॥
नाम गरीबनिवाज को राज देत जन जानि ।
तुलसी मन परिहरत नहिं घुर बिनिआ की बानि ॥
कासीं बिधि बसि तनु तजें हठि तनु तजें प्रयाग ।
तुलसी जो फल सो सुलभ राम नाम अनुराग ॥
मीठो अरु कठवति भरो रौंताई अरु छैम ।
स्वारथ परमारथ सुलभ राम नाम के प्रेम ॥
राम नाम सुमिरत सुजस भाजन भए कुजाति ।
कुतरुक सुरपुर राजमग लहत भुवन बिख्याति ॥
स्वारथ सुख सपनेहुँ अगम परमारथ न प्रबेस ।
राम नाम सुमिरत मिटहिं तुलसी कठिन कलेस ॥
मोर मोर सब कहँ कहसि तू को कहु निज नाम ।
कै चुप साधहि सुनि समुझि कै तुलसी जपु राम ॥
हम लखि लखहि हमार लखि हम हमार के बीच ।
तुलसी अलखहि का लखहि राम नाम जप नीच ॥
राम नाम अवलंब बिनु परमारथ की आस ।
बरषत बारिद बूँद गहि चाहत चढ़न अकास ॥
तुलसी हठि हठि कहत नित चित सुनि हित करि मानि ।
लाभ राम सुमिरन बड़ो बड़ी बिसारें हानि ॥
बिगरी जनम अनेक की सुधरै अबहीं आजु ।
होहि राम को नाम जपु तुलसी तजि कुसमाजु ॥
प्रीति प्रतीति सुरीति सों राम राम जपु राम ।
तुलसी तेरो है भलो आदि मध्य परिनाम ॥
दंपति रस रसना दसन परिजन बदन सुगेह ।
तुलसी हर हित बरन सिसु संपति सहज सनेह ॥
बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास ।
रामनाम बर बरन जुग सावन भादव मास ॥
राम नाम नर केसरी कनककसिपु कलिकाल ।
जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल ॥
राम नाम कलि कामतरु राम भगति सुरधेनु ।
सकल सुमंगल मूल जग गुरुपद पंकर रेनु ॥
राम नाम कलि कामतरु सकल सुमंगल कंद ।
सुमिरत करतल सिद्धि सब पग पग परमानंद ॥
जथा भूमि सब बीजमय नखत निवास अकास ।
राम नाम सब धरममय जानत तुलसीदास ॥
सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन ।
नाम सुप्रेम पियूष हृद तिन्हहुँ किए मन मीन ॥
ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि ।
राम चरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि ॥
सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ ।
नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ ॥
राम नाम पर नाम तें प्रीति प्रतीति भरोस ।
सो तुलसी सुमिरत सकल सगुन सुमंगल कोस ॥
लंक बिभीषन राज कपि पति मारुति खग मीच ।
लही राम सों नाम रति चाहत तुलसी नीच ॥
हरन अमंगल अघ अखिल करन सकल कल्यान ।
रामनाम नित कहत हर गावत बेद पुरान ॥
तुलसी प्रीति प्रतीति सों राम नाम जप जाग ।
किएँ होइ बिधि दाहिनो देइ अभागेहि भाग ॥
जल थल नभ गति अमित अति अग जग जीव अनेक ।
तुलसी तो से दीन कहँ राम नाम गति एक ॥
राम भरोसो राम बल राम नाम बिस्वास ।
सुमिरत सुभ मंगल कुसल माँगत तुलसीदास ॥
राम नाम रति राम गति राम नाम बिस्वास ।
सुमिरत सुभ मंगल कुसल दुहुँ दिसि तुलसीदास ॥
रामप्रेमके बिना सब व्यर्थ है
रसना साँपिनि बदन बिल जे न जपहिं हरिनाम ।
तुलसी प्रेम न राम सों ताहि बिधाता बाम ॥
हिय फाटहुँ फूटहुँ नयन जरउ सो तन केहि काम ।
द्रवहिं स्त्रवहिं पुलकइ नहीं तुलसी सुमिरत राम ॥
रामहि सुमिरत रन भिरत देत परत गुरु पाँय ।
तुलसी जिन्हहि न पुलक तनु ते जग जीवत जायँ ॥
सोरठा
हृदय सो कुलिस समान जो न द्रवइ हरिगुन सुनत ।
कर न राम गुन गान जीह सो दादुर जीह सम ॥
स्त्रवै न सलिल सनेहु तुलसी सुनि रघुबीर जस ।
ते नयना जनि देहु राम करहु बरु आँधरो ॥
रहैं न जल भरि पूरि राम सुजस सुनि रावरो ।
तिन आँखिन में धूरि भरि भरि मूठी मेलिये ॥
प्रार्थना
बारक सुमिरत तोहि होहि तिन्हहि सम्मुख सुखद ।
क्यों न सँभारहि मोहि दया सिंधु दसरत्थ के ॥
रामकी और रामप्रेमकी महिमा
साहिब होत सरोष सेवक को अपराध सुनि ।
अपने देखे दोष सपनेहु राम न उर धरे ॥
दोहा
तुलसी रामहि आपु तें सेवक की रुचि मीठि ।
सीतापति से साहिबहि कैसे दीजै पीठि ॥
तुलसी जाके होयगी अंतर बाहिर दीठि ।
सो कि कृपालुहि देइगो केवटपालहि पीठि ॥
प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान ।
तुलसी कहूँ न राम से साहिब सील निधान ॥
उद्बोधन
रे मन सब सों निरस ह्वै सरस राम सों होहि ।
भलो सिखावन देत है निसि दिन तुलसी तोहि ॥
हरे चरहिं तापहि बरे फरें पसारहिं हाथ ।
तुलसी स्वारथ मीत सब परमारथ रघुनाथ ॥
स्वारथ सीता राम सों परमारथ सिय राम ।
तुलसी तेरो दूसरे द्वार कहा कहु काम ॥
स्वारथ परमारथ सकल सुलभ एक ही ओर ।
द्वार दूसरे दीनता उचित न तुलसी तोर ॥
तुलसी स्वारथ राम हित परमारथ रघुबीर ।
सेवक जाके लखन से पवनपूत रनधीर ॥
ज्यों जग बैरी मीन को आपु सहित बिनु बारि ।
त्यों तुलसी रघुबीर बिनु गति आपनी बिचारि ॥
तुलसीदासजीकी अभिलाषा
राम प्रेम बिनु दूबरो राम प्रेमहीं पीन ।
रघुबर कबहुँक करहुगे तुलसिहि ज्यों जल मीन ॥
रामप्रेमकी महत्ता
राम सनेही राम गति राम चरन रति जाहि ।
तुलसी फल जग जनम को दियो बिधाता ताहि ॥
आपु आपने तें अधिक जेहि प्रिय सीताराम ।
तेहि के पग की पानहीं तुलसी तनु को चाम ॥
स्वारथ परमारथ रहित सीता राम सनेहँ ।
तुलसी सो फल चारि को फल हमार मत एहँ ॥
जे जन रूखे बिषय रस चिकने राम सनेहँ ।
तुलसी ते प्रिय राम को कानन बसहि कि गेहँ ॥
जथा लाभ संतोष सुख रघुबर चरन सनेह ।
तुलसी जो मन खूँद सम कानन बसहुँ कि गेह ॥
तुलसी जौं पै राम सों नाहिन सहज सनेह ।
मूँड़ मुड़ायो बादिहीं भाँड़ भयो तजि गेह ॥
रामविमुखताका कुफल
तुलसी श्रीरघुबीर तजि करै भरोसो और ।
सुख संपति की का चली नरकहुँ नाहीं ठौर ॥
तुलसी परिहरि हरि हरहि पाँवर पूजहिं भूत ।
अंत फजीहत होहिंगे गनिका के से पूत ॥
सेये सीता राम नहिं भजे न संकर गौरि ।
जनम गँवायो बादिहीं परत पराई पौरि ॥
तुलसी हरि अपमान तें होइ अकाज समाज ।
राज करत रज मिलि गए सदल सकुल कुरुराज ॥
तुलसी रामहि परिहरें निपट हानि सुन ओझ ।
सुरसरि गत सोई सलिल सुरा सरिस गंगोझ ॥
राम दूरि माया बढ़ति घटति जानि मन माँह ।
भूरि होति रबि दूरि लखि सिर पर पगतर छाँह ॥
साहिब सीतानाथ सों जब घटिहै अनुराग ।
तुलसी तबहीं भालतें भभरि भागिहैं भाग ॥
करिहौ कोसलनाथ तजि जबहिं दूसरी आस ।
जहाँ तहाँ दुख पाइहौं तबहीं तुलसीदास ॥
बिंधि न ईंधन पाइऐ सागर जुरै न नीर ।
परै उपास कुबेर घर जो बिपच्छ रघुबीरो ॥
बरसा को गोबर भयो को चहै को करै प्रीति ।
तुलसी तू अनुभवहि अब राम बिमुख की रीति ॥
सबहिं समरथहि सुखद प्रिय अच्छम प्रिय हितकारि ।
कबहुँ न काहुहि राम प्रिय तुलसी कहा बिचारि ॥
तुलसी उद्यम करम जुग जब जेहि राम सुडीठि ।
होइ सुफल सोइ ताहि सब सनमुख प्रभु तन पीठि ॥
राम कामतरु परिहरत सेवत कलि तरु ठूँठ ।
स्वारथ परमारथ चहत सकल मनोरथ झूँठ ॥
कल्याणका सुगम उपाय
निज दूषन गुन राम के समुझें तुलसीदास ।
होइ भलो कलिकाल हूँ उभय लोक अनयास ॥
कै तोहि लागहिं राम प्रिय कै तू प्रभु प्रिय होहि ।
दुइ में रुचै जो सुगम सो कीबे तुलसी तोहि ॥
तुलसी दुइ महँ एक ही खेल छाँड़ि छल खेलु ।
कै करु ममता राम सों के ममता परहेलु ॥
श्रीरामजीकी प्राप्तिका सुगम उपाय
निगम अगम साहेब सुगम राम साँचिली चाह ।
अंबु असन अवलोकिअत सुलभ सबै जग माँह ॥
सनमुख आवत पथिक ज्यों दिएँ दाहिनो बाम ।
तैसोइ होत सु आप को त्यों ही तुलसी राम ॥
रामप्रेमके लिये वैराग्यकी आवश्यकता
राम प्रेम पथ पेखिऐ दिएँ बिषय तन पीठि ।
तुलसी केंचुरि परिहरें होत साँपहू दीठि ॥
तुलसी जौ लौं बिषय की मुधा माधुरी मीठि ।
तौ लौं सुधा सहस्त्र सम राम भगति सुठि सीठि ॥
शरणागतिकी महिमा
जैसो तैसो रावरो केवल कोसलपाल ।
तौ तुलसी को है भलो तिहूँ लोक तिहुँ काल ॥
है तुलसी कें एक गुन अवगुन निधि कहैं लोग ।
भलो भरोसो रावरो राम रीझिबे जोग ॥
भक्तिका स्वरुप
प्रीति राम सों नीति पथ चलिय राग रिस जीति ।
तुलसी संतन के मते इहै भगति की रीति ॥
कलियुगसे कौन नहीं छला जाता
सत्य बचन मानस बिमल कपट रहित करतूति ।
तुलसी रघुबर सेवकहि सकै न कलिजुग धूति ॥
तुलसी सुखी जो राम सों दुखी सो निज करतूति ।
करम बचन मन ठीक जेहि तेहि न सकै कलि धूति ॥
गोस्वामीजीकी प्रेम-कामना
नातो नाते राम कें राम सनेहँ सनेहु ।
तुलसी माँगत जोरि कर जनम जनम सिव देहु ॥
सब साधनको एक फल जेहिं जान्यो सो जान ।
ज्यों त्यों मन मंदिर बसहिं राम धरें धनु बान ॥
जौं जगदीस तौ अति भलो जौं महीस तौ भाग ।
तुलसी चाहत जनम भरि राम चरन अनुराग ॥
परौ नरक फल चारि सिसु मीच डाकिनी खाउ ।
तुलसी राम सनेह को जो फल सो जरि जाउ ॥
रामभक्तके लक्षण
हित सों हित, रति राम सों, रिपु सों बैर बिहाउ ।
उदासीन सब सों सरल तुलसी सहज सुभाउ ॥
तुलसी ममता राम सों समता सब संसार ।
राग न रोष न दोष दुख दास भए भव पार ॥
उद्बोधन
रामहि डरु करु राम सों ममता प्रीति प्रतीति ।
तुलसी निरुपधि राम को भएँ हारेहूँ जीति ॥
तुलसी राम कृपालु सों कहि सुनाउ गुन दोष ।
होय दूबरी दीनता परम पीन संतोष ॥
सुमिरन सेवा राम सों साहब सों पहिचानि ।
ऐसेहु लाभ न ललक जो तुलसी नित हित हानि ॥
जानें जानन जोइऐ बिनु जाने को जान ।
तुलसी यह सुनि समुझि हियँ आनु धरें धनु बान ॥
करमठ कठमलिया कहैं ग्यानी ग्यान बिहीन ।
तुलसी त्रिपथ बिहाइ गो राम दुआरें दीन ॥
बाधक सब सब के भए साधक भए न कोइ ।
तुलसी राम कृपालु तें भलो होइ सो होइ ॥
शिव और रामकी एकता
संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास ।
ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास ॥
बिलग बिलग सुख संग दुख जनम मरन सोइ रीति ।
रहिअत राखे राम कें गए ते उचित अनीति ॥
रामप्रेमकी सर्वोत्कृष्टता
जाँय कहब करतूति बिनु जायँ जोग बिन छेम ।
तुलसी जायँ उपाय सब बिना राम पद प्रेम ॥
लोग मगन सब जोगहीं जोग जाँय बिनु छेम ।
त्यों तुलसीके भावगत राम प्रेम बिनु नेम ॥
श्रीरामकी कृपा
राम निकाई रावरी है सबही को नीक ।
जौं यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक ॥
तुलसी राम जो आदर्यो खोटो खरो खरोइ ।
दीपक काजर सिर धर्यो धर्यो सुधर्यो धरोइ ॥
तनु बिचित्र कायर बचन अहि अहार मन घोर ।
तुलसी हरि भए पच्छधर ताते कह सब मोर ॥
लहइ न फूटी कौंड़िहू को चाहै केहि काज ।
सो तुलसी महँगो कियो राम गरीब निवाज ॥
घर घर माँगे टूक पुनि भूपति पूजे पाय ।
जे तुलसी तब राम बिनु ते अब राम सहाय ॥
तुलसी राम सुदीठि तें निबल होत बलवान ।
बैर बालि सुग्रीव कें कहा कियो हनुमान ॥
तुलसी रामहु तें अधिक राम भगत जियँ जान ।
रिनिया राजा राम भे धनिक भए हनुमान ॥
कियो सुसेवक धरम कपि प्रभु कृतग्य जियँ जानि ।
जोरि हाथ ठाढ़े भए बरदायक बरदानि ॥
भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप ।
किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरुप ॥
ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार ।
सोइ सच्चिदानंदघन कर नर चरित उदार ॥
हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान ।
जेहिं मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान ॥
सुद्ध सच्चिदानंदमय कंद भानुकुल केतु ।
चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु ॥
भगवान की बाललीला
बाल बिभूषन बसन बर धूरि धूसरित अंग ।
बालकेलि रघुबर करत बाल बंधु सब संग ॥
अनुदिन अवध बधावने नित नव मंगल मोद ।
मुदित मातु पितु लोग लखि रघुबर बाल बिनोद ॥
राज अजिर राजत रुचिर कोसलपालक बाल ।
जानु पानि चर चरित बर सगुन सुमंगल माल ॥
नाम ललित लीला ललित ललित रूप रघुनाथ ।
ललित बसन भूषन ललित ललित अनुज सिसु साथ ॥
राम भरत लछिमन ललित सत्रु समन सुभ नाम ।
सुमिरत दसरथ सुवन सब पूजहिं सब मन काम ॥
बालक कोसलपाल के सेवकपाल कृपाल ।
तुलसी मन मानस बसत मंगल मंजु मराल ॥
भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल ।
करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहिं जगजाल ॥
निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि ।
सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि ॥
प्रार्थना
परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम ।
प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम ॥
भजनकी महिमा
बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल ।
बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल ॥
हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं ।
भजिअ राम सब काम तजि अस बिचारि मन माहिं ॥
जो चेतन कहँ जड़ करइ जड़हि करइ चैतन्य ।
अस समर्थ रघुनायकहि भजहिं जीव ते धन्य ॥
श्रीरघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान ।
ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन ॥
लव निमेष परमानु जुग बरस कलप सर चंड ।
भजसि न मन तेहि राम कहँ कालु जासु कोदंड ॥
तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम ।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोकधाम तजि काम ॥
बिनु सतसंग न हरिकथा तेहिं बिनु मोह न भाग ।
मोह गएँ बिनु रामपद होइ न दृढ अनुराग ॥
बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु ।
राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न ल बिश्रामु ॥
सोरठा
अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल ।
भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद ॥
भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन ।
तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीता रवन ॥
कहहिं बिमलमति संत बेद पुरान बिचारि अस ।
द्रवहिं जानकी कंत तब छूटै संसार दुख ॥
बिनु गुरु होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु ।
गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु ॥
दोहा
रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान ।
ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान ॥
जरउ सो संपति सदन सुखु सुहृद मातु पितु भाइ ।
सनमुख होत जो रामपद करइ न सहस सहाइ ॥
सेइ साधु गुरु समुझि सिखि राम भगति थिरताइ ।
लरिकाई को पैरिबो तुलसी बिसरि न जाइ ॥
रामसेवककी महिमा
सबइ कहावत राम के सबहि राम की आस ।
राम कहहिं जेहि आपनो तेहि भजु तुलसीदास ॥
जेहि सरीर रति राम सों सोइ आदरहिं सुजान ।
रुद्रदेह तजि नेहबस बानर भे हनुमान ॥
जानि राम सेवा सरस समुझि करब अनुमान ।
पुरुषा ते सेवक भए हर ते भे हनुमान ॥
तुलसी रघुबर सेवकहि खल डाटत मन माखि ।
बाजराज के बालकहि लवा दिखावत आँखि ॥
रावन रिपुके दास तें कायर करहिं कुचालि ।
खर दूषन मारीच ज्यों नीच जाहिंगे कालि ॥
पुन्य पाप जस अजस के भावी भाजन भूरि ।
संकट तुलसीदास को राम करहिंगे दूरि ॥
खेलत बालक ब्याल सँग मेलत पावक हाथ ।
तुलसी सिसु पितु मातु ज्यों राखत सिय रघुनाथ ॥
तुलसी दिन भल साहु कहँ भली चोर कहँ राति ।
निसि बासर ता कहँ भलो मानै राम इताति ॥
राम महिमा
तुलसी जाने सुनि समुझि कृपासिंधु रघुराज ।
महँगे मनि कंचन किए सौंधे जग जल नाज ॥
रामभजनकी महिमा
सेवा सील सनेह बस करि परिहरि प्रिय लोग ।
तुलसी ते सब राम सों सुखद सँजोग बियोग ॥
चारि चहत मानस अगम चनक चारि को लाहु ।
चारि परिहरें चारि को दानि चारि चख चाहु ॥
रामप्रेमकी प्राप्ति सुगम उपाय
सूधे मन सूधे बचन सूधी सब करतूति ।
तुलसी सूधी सकल बिधि रघुबर प्रेम प्रसूति ॥
रामप्राप्तिमें बाधक
बेष बिसद बोलनि मधुर मन कटु करम मलीन ।
तुलसी राम न पाइऐ भएँ बिषय जल मीन ॥
बचन बेष तें जो बनइ सो बिगरइ परिनाम ।
तुलसी मन तें जो बनइ बनी बनाई राम ॥
राम अनुकूलतामें ही कल्याण है
नीच मीचु लै जाइ जो राम रजायसु पाइ ।
तौ तुलसी तेरो भलो न तु अनभलो अघाइ ॥
श्रीरामकी शरणागतवत्सलता
जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि ।
महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि ॥
बंधु बधू रत कहि कियो बचन निरुत्तर बालि ।
तुलसी प्रभु सुग्रीव की चितइ न कछू कुचालि ॥
बालि बली बलसालि दलि सखा कीन्ह कपिराज ।
तुलसी राम कृपालु को बिरद गरीब निवाज ॥
कहा बिभीषन लै मिल्यो कहा बिगार्यो बालि ।
तुलसी प्रभु सरनागतहि सब दिन आए पालि ॥
तुलसी कोसलपाल सो को सरनागत पाल ।
भज्यो बिभीषन बंधु भय भंज्यो दारिद काल ॥
कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि ।
चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि ॥
बलकल भूषन फल असन तृन सज्या द्रुम प्रीति ।
तिन्ह समयन लंका दई यह रघुबर की रीति ॥
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ ॥
अबिचल राज बिभीषनहि दीन्ह राम रघुराज ।
अजहुँ बिराजत लंक पर तुलसी सहित समाज ॥
कहा बिभीषन लै मिल्यो कहा दियो रघुनाथ ।
तुलसी यह जाने बिना मूढ़ मीजिहैं हाथ ॥
बैरि बंधु निसिचर अधम तज्यो न भरें कलंक ।
झूठें अघ सिय परिहरी तुलसी साइँ ससंक ॥
तेहि समाज कियो कठिन पन जेहिं तौल्यो कैलास ।
तुलसी प्रभु महिमा कहौं सेवक को बिस्वास ॥
सभा सभासद निरखि पट पकरि उठायो हाथ ।
तुलसी कियो इगारहों बसन बेस जदुनाथ ॥
त्राहि तीनि कह्यो द्रौपदी तुलसी राज समाज ।
प्रथम बढ़े पट बिय बिकल चहत चकित निज काज ॥
सुख जीवन सब कोउ चहत सुख जीवन हरि हाथ ।
तुलसी दाता मागनेउ देखिअत अबुध अनाथ ॥
कृपन देइ पाइअ परो बिनु साधें सिधि होइ ।
सीतापति सनमुख समुझि जौ कीजै सुभ सोइ ॥
दंडक बन पावन करन चरन सरोज प्रभाउ ।
ऊसर जामहिं खल तरहिं होइ रंक ते राउ ॥
बिनहिं रितु तरुबर फरत सिला द्रवहि जल जोर ।
राम लखन सिय करि कृपा जब चितवत जेहि ओर ॥
सिला सुतिय भइ गिरि तरे मृतक जिए जग जान ।
राम अनुग्रह सगुन सुभ सुलभ सकल कल्यान ॥
सिला साप मोचन चरन सुमिरहु तुलसीदास ।
तजहु सोच संकट मिटिहिं पूजहि मनकी आस ॥
मुए जिआए भालु कपि अवध बिप्रको पूत ।
सुमिरहु तुलसी ताहि तू जाको मारुति दूत ॥
प्रार्थना
काल करम गुन दोर जग जीव तिहारे हाथ ।
तुलसी रघुबर रावरो जानु जानकीनाथ ॥
रोग निकर तनु जरठपनु तुलसी संग कुलोग ।
राम कृपा लै पालिऐ दीन पालिबे जोग ॥
मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर ।
अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर ॥
भव भुअंग तुलसी नकुल डसत ग्यान हरि लेत ।
चित्रकूट एक औषधी चितवत होत सचेत ॥
हौंहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास ।
साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास ॥
रामराज्यकी महिमा
राम राज राजत सकल धरम निरत नर नारि ।
राग न रोष न दोष दुख सुलभ पदारथ चारि ॥
राम राज संतोष सुख घर बन सकल सुपास ।
तरु सुरतरु सुरधेनु महि अभिमत भोग बिलास ॥
खेती बनि बिद्या बनिज सेवा सिलिप सुकाज ।
तुलसी सुरतरु सरिस सब सुफल राम कें राज ॥
दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज ।
जीतहु मनहिं सुनिअ अस रामचंद्र कें राज ॥
कोपें सोच न पोच कर करिअ निहोर न काज ।
तुलसी परमिति प्रीति की रीति राम कें राज ॥
श्रीरामकी दयालुता
मुकुर निरखि मुख राम भ्रू गनत गुनहि दै दोष ।
तुलसी से सठ सेवकन्हि लखि जनि परहिं सरोष ॥
श्रीरामकी धर्मधुरन्धरता
सहसनाम मुनि भनित सुनि तुलसी बल्लभ नाम ।
सकुचित हियँ हँसि निरखि सिय धरम धुरंधर राम ॥
श्रीसीताजीका अलौकिक प्रेम
गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसति पग पानि ।
मन बिहँसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि ॥
श्रीरामकी कीर्ति
तुलसी बिलसत नखत निसि सरद सुधाकर साथ ।
मुकुता झालरि झलक जनु राम सुजसु सिसु हाथ ॥
रघुपति कीरति कामिनी क्यों कहै तुलसीदासु ।
सरद अकास प्रकास ससि चारु चिबुक तिल जासु ॥
प्रभु गुन गन भूषन बसन बिसद बिसेष सुबेस ।
राम सुकीरति कामिनी तुलसी करतब केस ॥
राम चरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु ।
सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु ॥
रघुबर कीरति सज्जननि सीतल खलनि सुताति ।
ज्यों चकोर चय चक्कवनि तुलसी चाँदनि राति ॥
रामकथाकी महिमा
राम कथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु ।
तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु ॥
स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान ।
गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान ॥
हरि हर जस सुर नर गिरहुँ बरनहिं सुकबि समाज ।
हाँड़ी हाटक घटित चरु राँधे स्वाद सुनाज ॥
राममहिमाकी अज्ञेयता
तिल पर राखेउ सकल जग बिदित बिलोकत लोग ।
तुलसी महिमा राम की कौन जानिबे जोग ॥
श्रीरामजीके स्वरुपकी अलौकिकता
सोरठा
राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर ।
अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह ॥
ईश्वर\-महिमा
दोहा
माया जीव सुभाव गुन काल करम महदादि ।
ईस अंक तें बढ़त सब ईस अंक बिनु बादि ॥
श्रीरामजीकी भक्तवत्सलता
हित उदास रघुबर बिरह बिकल सकल नर नारि ।
भरत लखन सिय गति समुझि प्रभु चख सदा सुबारि ॥
सीता,लक्ष्मण और भरतके रामप्रेमकी अलौकिकता
सीय सुमित्रा सुवन गति भरत सनेह सुभाउ ।
कहिबे को सारद सरस जनिबे को रघुराउ ॥
जानि राम न कहि सके भरत लखन सिय प्रीति ।
सो सुनि गुनि तुलसी कहत हठ सठता की रीति ॥
सब बिधि समरथ सकल कह सहि साँसति दिन राति ।
भलो निबाहेउ सुनि समुझि स्वामिधर्म सब भाँति ॥
भरत\-महिमा
भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरिहर पद पाइ ।
कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ ॥
संपति चकई भरत चक मुनि आयस खेलवार ।
तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार ॥
सधन चोर मग मुदित मन धनी गही ज्यों फेंट ।
त्यों सुग्रीव बिभीषनहिं भई भरतकी भेंट ॥
राम सराहे भरत उठि मिले राम सम जानि ।
तदपि बिभीषन कीसपति तुलसी गरत गलानि ॥
भरत स्याम तन राम सम सब गुन रूप निधान ।
सेवक सुखदायक सुलभ सुमिरत सब कल्यान ॥
लक्ष्मणमहिमा
ललित लखन मूरति मधुर सुमिरहु सहित सनेह ।
सुख संपति कीरति बिजय सगुन सुमंगल गेह ॥
शत्रुघ्नमहिमा
नाम सत्रुसूदन सुभग सुषमा सील निकेत ।
सेवत सुमिरत सुलभ सुख सकल सुमंगल देत ॥
कौसल्यामहिमा
कौसल्या कल्यानमइ मूरति करत प्रनाम ।
सगुन सुमंगल काज सुभ कृपा करहिं सियाराम ॥
सुमित्रामहिमा
सुमिरि सुमित्रा नाम जग जे तिय लेहिं सनेम ।
सुअन लखन रिपुदवन से पावहिं पति पद प्रेम ॥
सीतामहिमा
सीताचरन प्रनाम करि सुमिरि सुनाम सुनेम ।
होहिं तीय पतिदेवता प्राननाथ प्रिय प्रेम ॥
रामचरित्रकी पवित्रता
तुलसी केवल कामतरु रामचरित आराम ।
कलितरु कपि निसिचर कहत हमहिं किए बिधि बाम ॥
कैकेयीकी कुटिलता
मातु सकल सानुज भरत गुरु पुर लोग सुभाउ ।
देखत देख न कैकइहि लंकापति कपिराउ ॥
सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान ।
चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान ॥
दशरथमहिमा
दसरथ नाम सुकामतरु फलइ सकलो कल्यान ।
धरनि धाम धन धरम सुत सदगुन रूप निधान ॥
तुलसी जान्यो दसरथहिं धरमु न सत्य समान ।
रामु तजे जेहि लागि बिनु राम परिहरे प्रान ॥
राम बिरहँ दसरथ मरन मुनि मन अगम सुमीचु ।
तुलसी मंगल मरन तरु सुचि सनेह जल सींचु ॥
सोरठा
जीवन मरन सुनाम जैसें दसरथ राय को ।
जियत खिलाए राम राम बिरहँ तनु परिहरेउ ॥
जटायुका भाग्य
दोहा
प्रभुहि बिलोकत गोद गत सिय हित घायल नीचु ।
तुलसी पाई गीधपति मुकुति मनोहर मीचु ॥
बिरत करम रत भगत मुनि सिद्ध ऊँच अरु नीचु ।
तुलसी सकल सिहात सुनि गीधराज की मीचु ॥
मुए मरत मरिहैं सकल घरी पहरके बीचु ।
लही न काहूँ आजु लौं गीधराज की मीचु ॥
मुँए मुकुत जीवत मुकुत मुकुत मुकुत हूँ बीचु ।
तुलसी सबही तें अधिक गीधराज की मीचु ॥
रघुबर बिकल बिहंग लखि सो बिलोकि दोउ बीर ।
सिय सुधि कहि सियल राम कहि देह तजी मति धीर ॥
दसरथ तें दसगुन भगति सहित तासु करि काजु ।
सोचत बंधु समेत प्रभु कृपासिंधु रघुराजु ॥
रामकृपाकी महत्ता
केवट निसिचर बिहग मृग किए साधु सनमानि ।
तुलसी रघुबर की कृपा सकल सुमंगल खानि ॥
हनुमत्स्मरणकी महत्ता
मंजुल मंगल मोदमय मूरति मारुत पूत ।
सकल सिद्धि कर कमल तल सुमिरत रघुबर दूत ॥
धीर बीर रघुबीर प्रिय सुमिरि समीर कुमारु ।
अगम सुगम सब काज करु करतल सिद्धि बिचारु ॥
सुख मुद मंगल कुमुद बिधु सुगुन सरोरुह भानु ।
करहु काज सब सिद्धि सुभ आनि हिएँ हनुमानु ॥
सकल काज सुभ समउ भल सगुन सुमंगल जानु ।
कीरति बिजय बिभूति भलि हियँ हनुमानहि आनु ॥
सूर सिरोमनि साहसी सुमति समीर कुमार ।
सुमिरत सब सुख संपदा मुद मंगल दातार ॥
बाहुपीड़ाकी शान्तिके लिये प्रार्थना
तुलसी तनु सर सुख जलज भुज रुज गज बरजोर ।
दलत दयानिधि देखिऐ कपि केसरी किसोर ॥
भुज तरु कोटर रोग अहि बरबस कियो प्रबेस ।
बिहगराज बाहन तुरत काढ़िअ मिटै कलेस ॥
बाहु बिटप सुख बिहँग थलु लगी कुपीर कुआगि ।
राम कृपा जल सीचिऐ बेगि दीन हित लागि ॥
काशीमहिमा
सोरठा
मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानि कर ।
जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न ॥
शंकरमहिमा
जरत सकल सुर बृंद बिषम गरल जेहिं पान किय ।
तेहि न भजसि मन मंद को कृपालु संकर सरिस ॥
शंकरजीसे प्रार्थना
दोहा
बासर ढासनि के ढका रजनीं चहुँ दिसि चोर ।
संकर निज पुर राखिऐ चितै सुलोचन कोर ॥
अपनी बीसीं आपुहीं पुरिहिं लगाए हाथ ।
केहि बिधि बिनती बिस्व की करौं बिस्व के नाथ ॥
भगवल्लीलाकी दुर्ज्ञेयता
और करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु ।
अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु ॥
प्रेममें प्रपञ्च बाधक है
प्रेम सरीर प्रपंच रुज उपजी अधिक उपाधि ।
तुलसी भली सुबैदई बेगि बाँधिऐ ब्याधि ॥
अभिमान ही बन्धनका मूल है
हम हमार आचार बड़ भूरि भार धरि सीस ।
हठि सठ परबस परत जिमि कीर कोस कृमि कीस ॥
जीव और दर्पणके प्रतिबिम्बकी समानता
केहिं मग प्रबिसति जाति केहिं कहु दरपनमें छाहँ ।
तुलसी ज्यों जग जीव गति करि जीव के नाहँ ॥
भगवन्मायाकी दुर्ज्ञेयता
सुखसागर सुख नींद बस सपने सब करतार ।
माया मायानाथ की को जग जाननिहार ॥
जीवकी तीन दशाएँ
जीव सीव सम सुख सयन सपनें कछु करतूति ।
जागत दीन मलीन सोइ बिकल बिषाद बिभूति ॥
सृष्टि स्वप्नवत है
सपनें होइ भिखारि नृपु रंकु नाकपति होइ ।
जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ ॥
हमारी मृत्यु प्रतिक्षण हो रही है
तुलसी देखत अनुभवत सुनत न समुझत नीच ।
चपरि चपेटे देत नित केस गहें कर मीच ॥
कालकी करतूत
करम खरी कर मोह थल अंक चराचर जाल ।
हनत गुनत गनि गुनि हनत जगत ज्यौतिषी काल ॥
इन्द्रियोंकी सार्थकता
कहिबे कहँ रसना रची सुनिबे कहँ किये कान ।
धरिबे कहँ चित हित सहित परमारथहि सुजान ॥
सगुणके बिना निर्गुणका निरूपण असम्भव है
ग्यान कहै अग्यान बिनु तम बिनु कहै प्रकास ।
निरगुन कहै जो सगुन बिनु सो गुरु तुलसीदास ॥
निर्गुणकी अपेक्षा सगुण अधिक प्रामाणिक है
अंक अगुन आखर सगुन समुझिअ उभय प्रकार ।
खोएँ राखें आपु भल तुलसी चारु बिचार ॥
विषयासक्तिका नाश हुए बिना ज्ञान अधूरा है
परमारथ पहिचानि मति लसति बिषयँ लपटानि ।
निकसि चिता तें अधजरित मानहुँ सती परानि ॥
विषयासक्त साधुकी अपेक्षा वैराग्यवान गृहस्थ अच्छा है
सीस उधारन किन कहेउ बरजि रहे प्रिय लोग ।
घरहीं सती कहावती जरती नाह बियोग ॥
साधुके लिये पूर्ण त्यागकी आवश्यकता
खरिया खरी कपूर सब उचित न पिय तिय त्याग ।
कै खरिया मोहि मेलि कै बिमल बिबेक बिराग ॥
भगवतप्रेममें आसक्ति बाधक है, गृहस्थाश्रम नहीं
घर कीन्हें घर जात है घर छाँड़े घर जाइ ।
तुलसी घर बन बीचहीं राम प्रेम पुर छाइ ॥
संतोषपूर्वक घरमें रहना उत्तम है
दिएँ पीठि पाछें लगै सनमुख होत पराइ ।
तुलसी संपति छाँह ज्यों लखि दिन बैठि गँवाइ ॥
विषयों की आशा ही दुःख का मूल है
तुलसी अद्भूत देवता आसा देवी नाम ।
सेएँ सोक समर्पई बिमुख भएँ अभिराम ॥
मोह-महिमा
सोई सेंवर तेइ सुवा सेवत सदा बसंत ।
तुलसी महिमा मोह की सुनत सराहत संत ॥
बिषय-सुखकी हेयता
करत न समुझत झूठ गुन सुनत होत मति रंक ।
पारद प्रगट प्रपंचमय सिद्धिउ नाउँ कलंक ॥
लोभकी प्रबलता
ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार ।
केहि कै लोभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार ॥
धन और ऐश्वर्यके मद तथा कामकी व्यापकता
श्रीमद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि ।
मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि ॥
मायाकी फौज
ब्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड ।
सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड ॥
काम,क्रोध,लोभकी प्रबलता
तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ ।
मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ ॥
काम,क्रोध,लोभके सहायक
लोभ कें इच्छा दंभ बल काम के केवल नारि ।
क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि ॥
मोहकी सेना
काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि ।
तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारुपी नारि ॥
अग्नि,समुद्र,प्रबल स्त्री और कालकी समानता
काह न पावक जारि सक का न समुद्र समाइ ।
का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ ॥
स्त्री झगड़े और मृत्युकी जड़ है
जनमपत्रिका बरति कै देखहु मनहिं बिचारि ।
दारुन बैरी मीचु के बीच बिराजति नारि ॥
उद्बोधन
दीपसिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग ।
भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग ॥
गृहासक्ति श्रीरघुनाथजीके स्वरूपके ज्ञानमें बाधक है
काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप ।
ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे भव कूप ॥
काम-क्रोधादि एक-एक अनर्थकारक है फिर सबकी
तो बात ही क्या है
ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार ।
तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार ॥
किसके मनको शान्ति नहीं मिलती ?
ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम ।
भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम ॥
ज्ञानमार्गकी कठिनता
कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन बिबेक ।
होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक ॥
भगवद्भजनके अतिरिक्त और सब प्रयत्न व्यर्थ है
खल प्रबोध जग सोध मन को निरोध कुल सोध ।
करहिं ते फोटक पचि मरहिं सपनेहुँ सुख न सुबोध ॥
संतोषकी महिमा
सोरठा
कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु ।
चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ ॥
मायाकी प्रबलता और उसके तरनेका उपाय
सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल ।
अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि ॥
गोस्वामीजीकी अनन्यता
दोहा
एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास ।
एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास ॥
प्रेमकी अनन्यताके लिये चातकका उदाहरण
जौं घन बरषै समय सिर जौं भरि जनम उदास ।
तुलसी या चित चातकहि तऊ तिहारी आस ॥
चातक तुलसी के मतें स्वातिहुँ पिऐ न पानि ।
प्रेम तृषा बाढ़ति भली घटें घटैगी आनि ॥
रटत रटत रसना लटी तृषा सूखि गे अंग ।
तुलसी चातक प्रेम को नित नूतन रुचि रंग ॥
चढ़त न चातक चित कबहुँ प्रिय पयोद के दोष ।
तुलसी प्रेम पयोधि की ताते नाप न जोख ॥
बरषि परुष पाहन पयद पंख करौ टुक टूक ।
तुलसी परी न चाहिऐ चतुर चातकहि चूक ॥
उपल बरसि गरजत तरजि डारत कुलिस कठोर ।
चितव कि चातक मेघ तजि कबहुँ दूसरी ओर ॥
पबि पाहन दामिनि गरज झरि झकोर खरि खीझि ।
रोष न प्रीतम दोष लखि तुलसी रागहि रीझि ॥
मान राखिबो माँगिबो पिय सों नित नव नेहु ।
तुलसी तीनिउ तब फबैं जौ चातक मत लेहु ॥
तुलसी चातक ही फबै मान राखिबो प्रेम ।
बक्र बुंद लखि स्वातिहू निदरि निबाहत नेम ॥
तुलसी चातक माँगनो एक एक घन दानि ।
देत जो भू भाजन भरत लेत जो घूँटक पानि ॥
तीनि लोक तिहुँ काल जस चातक ही के माथ ।
तुलसी जासु न दीनता सुनी दूसरे नाथ ॥
प्रीति पपीहा पयद की प्रगट नई पहिचानि ।
जाचक जगत कनाउड़ो कियो कनौड़ा दानि ॥
नहिं जाचत नहिं संग्रही सीस नाइ नहिं लेइ ।
ऐसे मानी मागनेहि को बारिद बिन देइ ॥
को को न ज्यायो जगत में जीवन दायक दानि ।
भयो कनौड़ो जाचकहि पयद प्रेम पहिचानि ॥
साधन साँसति सब सहत सबहि सुखद फल लाहु ।
तुलसी चातक जलद की रीझि बूझि बुध काहु ॥
चातक जीवन दायकहि जीवन समयँ सुरीति ।
तुलसी अलख न लखि परै चातक प्रीति प्रतीति ॥
जीव चराचर जहँ लगे है सब को हित मेह ।
तुलसी चातक मन बस्यो घन सों सहज सनेह ॥
डोलत बिपुल बिहंग बन पिअत पोखरनि बारि ।
सुजस धवल चातक नवल तुही भुवन दस चारि ॥
मुख मीठे मानस मलिन कोकिल मोर चकोर ।
सुजस धवल चातक नवल रह्यो भुवन भरि तोर ॥
बास बेस बोलनि चलनि मानस मंजु मराल ।
तुलसी चातक प्रेम की कीरति बिसद बिसाल ॥
प्रेम न परखिअ परुषपन पयद सिखावन एह ।
जग कह चातक पातकी ऊसर बरसै मेह ॥
होइ न चातक पातकी जीवन दानि न मूढ़ ।
तुलसी गति प्रहलाद की समुझि प्रेम पथ गूढ़ ॥
गरज आपनी सबन को गरज करत उर आनि ।
तुलसी चातक चतुर भो जाचक जानि सुदानि ॥
चरग चंगु गत चातकहि नेम प्रेम की पीर ।
तुलसी परबस हाड़ पर परिहैं पुहुमी नीर ॥
बध्यो बधिक पर्यो पुन्य जल उलटि उठाई चोंच ।
तुलसी चातक प्रेमपट मरतहुँ लगी न खोंच ॥
अंड फोरि कियो चेटुवा तुष पर्यो नीर निहारि ।
गहि चंगुल चातक चतुर डार्यो बाहिर बारि ॥
तुलसी चातक देत सिख सुतहि बारहीं बार ।
तात न तर्पन कीजिऐ बिना बारिधर धार ॥
सोरठा
जिअत न नाई नारि चातक घन तजि दूसरहि ।
सुरसरिहू को बारि मरत न माँगेउ अरध जल ॥
सुनु रे तुलसीदास प्यास पपीहहि प्रेम की ।
परिहरि चारिउ मास जौ अँचवै जल स्वाति को ॥
जाचै बारह मास पिऐ पपीहा स्वाति जल ।
जान्यो तुलसीदास जोगवत नेही नेह मन ॥
दोहा
तुलसीं के मत चातकहि केवल प्रेम पिआस ।
पिअत स्वाति जल जान जग जाँचत बारह मास ॥
आलबाल मुकुताहलनि हिय सनेह तरु मूल ।
होइ हेतु चित चातकहि स्वाति सलिलु अनुकूल ॥
उष्न काल अरु देह खिन मन पंथी तन ऊख ।
चातक बतियाँ न रुचीं अन जल सींचे रूख ॥
अन जल सींचे रूख की छाया तें बरु घाम ।
तुलसी चातक बहुत हैं यह प्रबीन को काम ॥
एक अंग जो सनेहता निसि दिन चातक नेह ।
तुलसी जासों हित लगै वहि अहार वहि देह ॥
एकाङ्गी अनुरागके अन्य उदाहरण
बिबि रसना तनु स्याम है बंक चलनि बिष खानि ।
तुलसी जस श्रवननि सुन्यो सीस समरप्यो आनि ॥
मृगका उदाहरण
आपु ब्याध को रूप धरि कुहौ कुरंगहि राग ।
तुलसी जो मृग मन मुरै परै प्रेम पट दाग ॥
सर्पका उदाहरण
तुलसी मनि निज दुति फनिहि ब्याधिहि देउ दिखाइ ।
बिछुरत होइ नब आँधरो ताते प्रेम न जाइ ॥
कमलका उदाहरण
जरत तुहिन लखि बनज बन रबि दै पीठि पराउ ।
उदय बिकस अथवत सकुच मिटै न सहज सुभाउ ॥
मछलीका उदाहरण
देउ आपनें हाथ जल मीनहि माहुर घोरि ।
तुलसी जिऐ जो बारि बिनु तौ तु देहि कबि खोरि ॥
मकर उरग दादुर कमठ जल जीवन जल गेह ।
तुलसी एकै मीन को है साँचिलो सनेह ॥
मयूरशिखा बूटीका उदाहरण
तुलसी मिटे न मरि मिटेहुँ साँचो सहज सनेह ।
मोरसिखा बिनु मूरिहूँ पलुहत गरजत मेह ॥
सुलभ प्रीति प्रीतम सबै कहत करत सब कोइ ।
तुलसी मीन पुनीत ते त्रिभुवन बड़ो न कोइ ॥
अनन्यताकी महिमा
तुलसी जप तप नेम ब्रत सब सबहीं तें होइ ।
लहै बड़ाई देवता इष्टदेव जब होइ ॥
गाढ़े दिनका मित्र ही मित्र है
कुदिन हितू सो हित सुदिन हित अनहित किन होइ ।
ससि छबि हर रबि सदन तउ मित्र कहत सब कोइ ॥
बराबरीका स्नेह दुःखदायक होता है
कै लघुकै बड़ मीत भल सम सनेह दुख सोइ ।
तुलसी ज्यों घृत मधु सरिस मिलें महाबिष होइ ॥
मित्रतामें छल बाधक है
मान्य मीत सों सुख चहैं सो न छुऐ छल छाहँ ।
ससि त्रिसंकु कैकेइ गति लखि तुलसी मन माहँ ॥
कहिअ कठिन कृत कोमलहुँ हित हठि होइ सहाइ ।
पलक पानि पर ओड़िअत समुझि कुघाइ सुघाइ ॥
वैर और प्रेम अंधे होते है
तुलसी बैर सनेह दोउ रहित बिलोचन चारि ।
सुरा सेवरा आदरहिं निंदहिं सुरसरि बारि ॥
दानी और याचकका स्वभाव
रुचै मागनेहि मागिबो तुलसी दानिहि दानु ।
आलस अनख न आचरज प्रेम पिहानी जानु ॥
प्रेम और वैर ही अनुकुलता और प्रतिकूलतामें हेतु हैं
अमिअ गारि गारेउ गरल गारि कीन्ह करतार ।
प्रेम बैर की जननि जुग जानहिं बुध न गवाँर ॥
स्मरण और प्रिय भाषण ही प्रेमकी निशानी है
सदा न जे सुमिरत रहहिं मिलि न कहहिं प्रिय बैन ।
ते पै तिन्ह के जाहिं घर जिन्ह के हिएँ न नैन ॥
स्वार्थ ही अच्छाई\-बुराईका मानदण्ड हैं
हित पुनीत सब स्वारथहिं अरि असुद्ध बिनु चाड़ ।
निज मुख मानिक सम दसन भूमि परे ते हाड़ ॥
संसारमें प्रेममार्गके अधिकारी बिरले ही हैं
माखी काक उलूक बक दादुर से भए लोग ।
भले ते सुक पिक मोरसे कोउ न प्रेम पथ जोग ॥
कलियुगमें कपटकी प्रधानता
हृदयँ कपट बर बेष धरि बचन कहहिं गढ़ि छोलि ।
अब के लोग मयूर ज्यों क्यों मिलिए मन खोलि ॥
कपट अन्ततक नहीं निभता
चरन चोंच लोचन रँगौ चलौ मराली चाल ।
छीर नीर बिबरन समय बक उघरत तेहि काल ॥
कुटिल मनुष्य अपनी कुटिलताको नहीं छोड़ सकता
मिलै जो सरलहि सरल ह्वै कुटिल न सहज बिहाइ ।
सो सहेतु ज्यों बक्र गति ब्याल न बिलहिं समाइ ॥
कृसधन सखहि न देब दुख मुएहुँ न मागब नीच ।
तुलसी सज्जन की रहनि पावकल पानी बीच ॥
संग सरल कुटिलहि भएँ हरि हर करहिं निबाहु ।
ग्रह गनती गनि चतुर बिधि कियो उदर बिनु राहु ॥
स्वभावकी प्रधानता
नीच निचाई नहिं तजइ सज्जनहू कें संग ।
तुलसी चंदन बिटप बसि बिनु बिष भए न भुअंग ॥
भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु ।
सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु ॥
मिथ्या माहुर सज्जनहि खलहि गरल सम साँच ।
तुलसी छुअत पराइ ज्यों पारद पावक आँच ॥
सत्संग और असत्संगका परिणामगत भेद
संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ ।
कहहि संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ ॥
सुकृत न सुकृती परिहरइ कपट न कपटी नीच ।
मरत सिखावन देइ चले गीधराज मारीच ॥
सज्जन और दुर्जनका भेद
सुजन सुतरु बन ऊख सम खल टंकिका रुखान ।
परहित अनहित लागि सब साँसति सहर समान ॥
पिअहि सुमन रस अलिल बिटप काटि कोल फल खात ।
तुलसी तरुजीवी जुगल सुमति कुमति की बात ॥
अवसरकी प्रधानता
अवसर कौड़ी जो चुकै बहुरि दिएँ का लाख ।
दुइज न चंदा देखिऐ उदौ कहा भरि पाख ॥
भलाई करना बिरले ही जानते हैं
ग्यान अनभले को सबहि भले भलेहू काउ ।
सींग सूँड़ रद लूम नख करत जीव जड़ घाउ ॥
संसारमें हित करनेवाले कम है
तुलसी जग जीवन अहित कतहुँ कोउ हित जानि ।
सोषक भानु कृसानु महि पवन एक घन दानि ॥
सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल ।
जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल ॥
जलचर थलचर गगनचर देव दनुज नर नाग ।
उत्तम मध्यम अधम खल दस गुन बढ़त बिभाग ॥
बलि मिस देखे देवता कर मिस मानव देव ।
मुए मार सुबिचार हत स्वारथ साधन एव ॥
सुजन कहत भल पोच पथ पापि न परखइ भेद ।
करमनास सुरसरित मिस बिधि निषेध बद बेद ॥
वस्तुही प्रधान है, आधार नहीं
मनि भाजन मधु पारई पूरन अमी निहारि ।
का छाँड़िअ का संग्रहिअ कहहु बिबेक बिचारि ॥
प्रीति और वैरकी तीन श्रेणियाँ
उत्तम मध्यम नीच गति पाहन सिकता पानि ।
प्रीति परिच्छा तिहुन की बैर बितिक्रम जानि ॥
जिसे सज्जन ग्रहण करते है,उसे दुर्जन त्याग देते हैं
पुन्य प्रीति पति प्रापतिउ परमारथ पथ पाँच ।
लहहिं सुजन परिहरहिं खल सुनहु सिखावन साँच ॥
प्रकृतिके अनुसार व्यवहारका भेद भी आवश्यक हैं
नीच निरादरहीं सुखद आदर सुखद बिसाल ।
कदरी बदरी बिटप गति पेखहु पनस रसाल ॥
अपना आचरण सभी को अच्छा लगता है
तुलसी अपनो आचरन भलो न लागत कासु ।
तेहि न बसात जो खात नित लहसुनहू को बासु ॥
भाग्यवान कौन है ?
बुध सो बिबेकी बिमलमति जिन्ह के रोष न राग ।
सुहृद सराहत साधु जेहि तुलसी ताको भाग ॥
साधुजन किसकी सराहना करते है
आपु आपु कहँ सब भलो अपने कहँ कोइ कोइ ।
तुलसी सब कहँ जो भलो सुजन सराहिअ सोइ ॥
संगकी महिमा
तुलसी भलो सुसंग तें पोच कुसंगति सोइ ।
नाउ किंनरी तीर असि लोह बिलोकहु लोइ ॥
गुरु संगति गुरु होइ सो लघु संगति लघु नाम ।
चार पदारथ में गनै नरक द्वारहू काम ॥
तुलसी गुरु लघुता लहत लघु संगति परिनाम ।
देवी देव पुकारिअत नीच नारि नर नाम ॥
तुलसी किएँ कुसंग थिति होहिं दाहिने बाम ।
कहि सुनि सकुचिअ सूम खल गत हरि संकर नाम ॥
बसि कुसंग चह सुजनता ताकी आस निरास ।
तीरथहू को नाम भो गया मगह के पास ॥
राम कृपाँ तुलसी सुलभ गंग सुसंग समान ।
जो जल परै जो जन मिलै कीजै आपु समान ॥
ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग ।
होहिं कुबस्तु सुबस्तु जल लखहिं सुलच्छन लोग ॥
जनम जोग में जानिअत जग बिचित्र गति देखि ।
तुलसी आखर अंक रस रंग बिभेद बिसेषि ॥
आखर जोरि बिचार करु सुमति अंक लिखि लेखु ।
जोग कुजोग सुजोग मय जग गति समुझि बिसेषु ॥
मार्ग-भेदसे फल-भेद
करु बिचार चलु सुपथ भल आदि मध्य परिनाम ।
उलटि जपें 'जारा मरा' सूधें'राजा राम' ॥
भलेके भला ही हो, यह नियम नहीं है
होइ भले के अनभलो होइ दानि के सूम ।
होइ कपूत सपूत कें ज्यों पावक में धूम ॥
विवेककी आवश्यकता
जड़ चेतन गुन दोष मय बिस्व कीन्ह करतार ।
संत हंक गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार ॥
सोरठा
पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रुचिर ।
कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम ॥
दोहा
जो जो जेहिं जेहिं रल मगन तहँ सो मुदित मन मानि ।
रसगुन दोष बिचारिबो रसिक रीति पहिचानि ॥
सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह ।
ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह ॥
कभी\-कभी भलेको बुराई भी मिल जाती है
लोक बेदहू लौं दगो नाम भले को पोच ।
धर्मराज जम गाज पबि कहत सकोच न सोच ॥
सज्जन और दुर्जनकी परीक्षाके भिन्न\-भिन्न प्रकार
बिरुचि परखिऐ सुजन जन राखि परखिऐ मंद ।
बड़वानल सोषत उदधि हरष बढ़ावत चंद ॥
नीच पुरुषकी नीचता
प्रभु सनमुख भएँ नीच नर होत निपट बिकराल ।
रबिरुख लखि दरपन फटिक उगिलत ज्वालाजाल ॥
सज्जनकी सज्जनता
प्रभु समीप गत सुजन जन होत सुखद सुबिचार ।
लवन जलधि जीवन जलद बरषत सुधा सुबारि ॥
नीच निरावहिं निरस तरु तुलसी सींचहिं ऊख ।
पोषत पयद समान सब बिष पियूष के रूख ॥
बरषि बिस्व हरषित करत हरत ताप अघ प्यास ।
तुलसी दोष न जलद को जो जल जरै जवास ॥
अमर दानि जाचक मरहिं मरि मरि फिरि फिरि लेहिं ।
तुलसी जाचक पातकी दातहि दूषन देहिं ॥
नीचनिन्दा
लखि गयंद लै चलत भजि स्वान सुखानो हाड़ ।
गज गुन मोल अहार बल महिमा जान कि राड़ ॥
सज्जनमहिमा
कै निदरहुँ कै आदरहुँ सिंघहि स्वान सिआर ।
हरष बिषाद न केसरिहि कुंजर गंजनिहार ॥
दुर्जनोका स्वभाव
ठाढ़ो द्वार न दै सकैं तुलसी जे नर नीच ।
निंदहि बलिल हरिचंद को का कियो करन दधीच ॥
नीचकी निन्दासे उत्तम पुरुषोंका कुछ नहीं घटता
ईस सीस बिलसत बिमल तुलसी तरल तरंग ।
स्वान सरावग के कहें लघुता लहै न गंग ॥
तुलसी देवल देव को लागे लाख करोरि ।
काक अभागें हगि भर्यो महिमा भई कि थोरि ॥
गुणोंका ही मूल्य है,दूसरोंके आदर\-अनादरका नहीं
निज गुन घटत न नाग नग परखि परिहरत कोल ।
तुलसी प्रभु भूषन किए गुंजा बढ़े न मोल ॥
श्रेष्ठ पुरुषोंकी महिमाको कोई नहीं पा सकता
राकापति षोड़स उअहिं तारा गन समुदाइ ।
सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ ॥
दुष्ट पुरुषोंद्वारा की हुई निन्दा\-स्तुतिका कोई मूल्य नहीं है
भलो कहहिं बिनु जानेहूँ बिनु जानें अपबाद ।
ते नर गादुर जानि जियँ करिय न हरष बिषाद ॥
डाह करनेवालोंका कभी कल्याण नहीं होता
पर सुख संपति देखि सुनि जरहिं जे जड़ बिनु आगि ।
तुलसी तिन के भागते चलै भलाई भागि ॥
दूसरोंकी निन्दा करनेवालोंका मुहँ काला होता है
तुलसी जे कीरति चहहिं पर की कीरति खोइ ।
तिनके मुहँ मसि लागिहैं मिटहि न मरिहै धोइ ॥
मिथ्या अभिमानका दुष्परिणाम
तन गुन धन महिमा धरम तेहि बिनु जेहि अभिमान ।
तुलसी जिअत बिडंबना परिनामहु गत जान ॥
नीचा बनकर रहना ही श्रेष्ठ है
सासु ससुर गुरु मातु पितु प्रभु भयो चहै सब कोइ ।
होनी दूजी ओर को सुजन सराहिअ सोइ ॥
सज्जन स्वाभाविक ही पूजनीय होते है
सठ सहि साँसति पति लहत सुजन कलेस न कायँ ।
गढ़ि गुढ़ि पाहन पूजिऐ गंडकि सिला सुभायँ ॥
भूप-दरबारकी निन्दा
बड़े बिबुध दरबार तें भूमि भूप दरबार ।
जापक पूजत पेखिअत सहत निरादर भार ॥
छल-कपट सर्वत्र वर्जित है
बिनु प्रपंच छल भीख भलि लहिअ न दिएँ कलेस ।
बावन बलि सों छल कियो दियो उचित उपदेस ॥
भलो भले सों छल किएँ जनम कनौड़ो होइ ।
श्रीपति सिर तुलसी लसति बलि बावन गति सोइ ॥
बिबुध काज बावन बलिहि छलो भलो जिय जानि ।
प्रभुता तजि बस भे तदपि मन की गइ न गलानि ॥
जगत में सब सीधोंको तंग करते है
सरल बक्र गति पंच ग्रह चपरि न चितवत काहु ।
तुलसी सूधे सूर ससि समय बिडंबित राहु ॥
दुष्ट\-निन्दा
खल उपकार बिकार फल तुलसी जान जहान ।
मेढुक मर्कट बनिक बक्र कथा सत्य उपखान ॥
तुलसी खल बानी मधुर सुनि समुझिअ हियँ हेरि ।
राम राज बाधक भई मूढ़ मंथरा चेरि ॥
जोंक सूधि मन कुटिल गति खल बिपरीत बिचारु ।
अनहित सोनित सोष सो सो हित सोषनिहारु ॥
नीच गुड़ि ज्यों जानिबो सुनि लखि तुलसीदास ।
ढीलि दिएँ गिरि परत महि खैंचत चढ़त अकास ॥
भरदर बरसत कोस सत बचै जे बूँद बराइ ।
तुलसी तेउ खल बचन कर हए गए न पराइ ॥
पेरत कोल्हू मेलि तिल तिली सनेही जानि ।
देखि प्रीति की रीति यह अब देखिबी रिसानि ॥
सहबासी काचो गिलहिं पुरजन पाक प्रबीन ।
कालछेप केहि मिलि करहिं तुलसी खग मृग मीन ॥
जासु भरोसें सोइऐ राखि गोद में सीस ।
तुलसी तासु कुचाल तें रखवारो जगदीस ॥
मार खोज लै सौंह करि करि मत लाज न त्रास ।
मुए नीच ते मीच बिनु जे इन कें बिस्वास ॥
परद्रोही परदार रत परधन पर अपबाद ।
ते नर पावँर पापमय देह धरें मनुजाद ॥
कपटीको पहचानना बड़ा कठिन है
बचन बेष क्यों जानिए मन मलीन नर नारि ।
सूपनखा मृग पूतना दसमुख प्रमुख बिचारि ॥
कपटी से सदा डरना चाहिये
हँसनि मिलनि बोलनि मधुर कटु करतब मन माँह ।
छुवत जो सकुचइ सुमति सो तुलसी तिन्ह कि छाहँ ॥
कपट ही दुष्टताका स्वरूप है
कपट सार सूची सहस बाँधि बचन परबास ।
कियो दुराउ चहौ चातुरीं सो सठ तुलसीदास ॥
कपटी कभी सुख नहीं पाता
बचन बिचार अचार तन मन करतब छल छूति ।
तुलसी क्यों सुख पाइऐ अंतरजामिहि धूति ॥
सारदूल को स्वाँग करि कूकर की करतूति ।
तुलसी तापर चाहिऐ कीरति बिजय बिभूति ॥
पाप ही दुःखका मूल है
बड़े पाप बाढ़े किए छोटे किए लजात ।
तुलसी ता पर सुख चहत बिधि सों बहुत रिसात ॥
अविवेक ही दुःखका मूल है
देस काल करता करम बचन बिचार बिहीन ।
ते सुरतरु तर दारिदी सुरसरि तीर मलीन ॥
साहस ही कै कोप बस किएँ कठिन परिपाक ।
सठ संकट भाजन भए हठि कुजाति कपि काक ॥
राज करत बिनु काजहीं करहिं कुचालि कुसाजि ।
तुलसी ते दसकंध ज्यों जइहैं सहित समाज ॥
राज करत बिनु काजहीं ठटहिं जे कूर कुठाट ।
तुलसी ते कुरुराज ज्यों जइहै बारह बाट ॥
विपरीत बुद्धि बिनाशका लक्षण है
सभा सुयोधन की सकुनि सुमति सराहन जोग ।
द्रोन बिदुर भीषम हरिहि कहहिं प्रपंची लोग ॥
पांडु सुअन की सदसि ते नीको रिपु हित जानि ।
हरि हर सम सब मानिअत मोह ग्यान की बानि ॥
हित पर बढ़इ बिरोध जब अनहित पर अनुराग ।
राम बिमुख बिधि बाम गति सगुन अघाइ अभाग ॥
सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि ।
सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि ॥
जोशमें आकर अनधिकार कार्य करनेवाला पछताता है
भरुहाए नट भाँट के चपरि चढ़े संग्राम ।
कै वै भाजे आइहै के बाँधे परिनाम ॥
समयपर कष्ट सह लेना हितकर होता है
लोक रीति फूटी सहहिं आँजी सहइ न कोइ ।
तुलसी जो आँजी सहइ सो आँधरो न होइ ॥
भगवान सबके रक्षक है
भागें भल ओड़ेहुँ भलो भलो न घालें घाउ ।
तुलसी सब के सीस पर रखवारो रघुराउ ॥
लड़ना सर्वथा त्याज्य है
सुमति बिचारहिं परिहरहिं दल सुमनहुँ संग्राम ।
सकुल गए तनु बिनु भए साखी जादौ काम ॥
ऊलह न जानब छोट करि कलह कठिन परिनाम ।
लगति अगिनि लघु नीच गृह जरत धनिक धन धाम ॥
क्षमाका महत्व
छमा रोष के दोष गुन सुनि मनु मानहिं सीख ।
अबिचल श्रीपति हरि भए भूसुर लहै न भीख ॥
कौरव पांडव जानिऐ क्रोध छमा के सीम ।
पाँचहि मारि न सौ सके सयौ सँघारे भीम ॥
क्रोधकी अपेक्षा प्रेमके द्वारा वश करना ही जीत है
बोल न मोटे मारिऐ मोटी रोटी मारु ।
जीति सहस सम हारिबो जीतें हारि निहारु ॥
जो परि पायँ मनाइए तासों रूठि बिचारि ।
तुलसी तहाँ न जीतिऐ जहँ जीतेहूँ हारि ॥
जूझे ते भल बूझिबो भली जीति तें हार ।
डहकें तें डहकाइबो भलो जो करिअ बिचार ॥
जा रिपु सों हारेहुँ हँसी जिते पाप परितापु ।
तासों रारि निवारिऐ समयँ सँभारिअ आपु ॥
जो मधु मरै न मारिऐ माहुर देइ सो काउ ।
जग जिति हारे परसुधर हारि जिते रघुराउ ॥
बैर मूल हर हित बचन प्रेम मूल उपकार ।
दो हा सुभ संदोह सो तुलसी किएँ बिचार ॥
रोष न रसना खोलिऐ बरु खोलिअ तरवारि ।
सुनत मधुर परिनाम हित बोलिअ बचन बिचारि ॥
मधुर बचन कटु बोलिबो बिनु श्रम भाग अभाग ।
कुहू कुहू कलकंठ रव का का कररत काग ॥
पेट न फूलत बिनु कहें कहत न लागइ ढेर ।
सुमति बिचारें बोलिऐ समुझि कुफेर सुफेर ॥
वीतराग पुरुषोंकी शरण ही जगत के जंजालसे बचनेका उपाय है
छिद्यो न तरुनि कटाच्छ सर करेउ न कठिन सनेहु ।
तुलसी तिन की देह को जगत कवच करि लेहु ॥
शूरवीर करनी करते है,कहते नहीं
सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु ।
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु ॥
अभिमान के बचन कहना अच्छा नहीं
बचन कहे अभिमान के पारथ पेखत सेतु ।
प्रभु तिय लूटत नीच भर जय न मीचु तेहिं हेतु ॥
दीनोंकी रक्षा करनेवाला सदा बिजयी होता है
राम लखन बिजई भए बनहुँ गरीब निवाज ।
मुखर बालि रावन गए घरहीं सहित समाज ॥
नीतिका पालन करनेवालेके सभी सहायक बन जाते हैं
खग मृग मीत पुनीत किय बनहुँ राम नयपाल ।
कुमति बालि दसकंठ घर सुहद बंधु कियो काल ॥
सराहनेयोग्य कौन है
लखइ अघानो भूख ज्यों लखइ जीतिमें हारि ।
तुलसी सुमति सराहिऐ मग पग धरइ बिचारि ॥
अवसर चूक जानेसे बड़ी हानि होती है
लाभ समय को पालिबो हानि समय की चूक ।
सदा बिचारहिं चारुमति सुदिन कुदिन दिन दूक ॥
समयका महत्व
सिंधु तरन कपि गिरि हरन काज साइँ हित दोउ ।
तुलसी समयहिं सब बड़ो बूझत कहुँ कोउ कोउ ॥
तुलसी मीठी अमी तें मागी मिलै जो मीच ।
सुधा सुधाकर समय बिनु काललकूट तें नीच ॥
विपत्तिकालके मित्र कौन है ?
तुलसी असमय के सखा धीरज धरम बिबेक ।
साहित साहस सत्यब्रत राम भरोसो एक ॥
समरथ कोउ न राम सों तीय हरन अपराधु ।
समयहिं साधे काज सब समय सराहहिं साधु ॥
तुलसी तीरहु के चलें समय पाइबी थाह ।
धाइज न जाइ थहाइबी सर सरिता अवगाह ॥
होनहारकी प्रबलता
तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ ।
आपुनु आवइ ताहि पै ताहि तहाँ लै जाइ ॥
परमार्थप्राप्तिके चार उपाय
कै जूझीबो कै बूझिबो दान कि काय कलेस ।
चारि चारु परलोक पथ जथा जोग उपदेस ॥
विवेककी आवश्यकता
पात पात को सींचिबो न करु सरग तरु हेत ।
कुटिल कटुक फर फरैगो तुलसी करत अचेत ॥
विश्वासकी महिमा
गठिबँध ते परतीति बड़ि जेहिं सबको सब काज ।
कहब थोर समुझब बहुत गाड़े बढ़त अनाज ॥
अपनो ऐपन निज हथा तिय पूजहिं निज भीति ।
फरइ सकल मन कामना तुलसी प्रीति प्रतीति ॥
बरषत करषत आपु जल हरषत अरघनि भानु ।
तुलसी चाहत साधु सुर सब सनेह सनमानु ॥
बारह नक्षत्र व्यापारके लिये अच्छे हैं
श्रुति गुन कर गुन पु जुग मृग हर रेवती सखाउ ।
देहि लेहि धन धरनि धरु गएहुँ न जाइहि काउ ॥
चौदह नक्षत्रोंमें हाथसे गया हुआ धन वापस नहीं मिलता
ऊगुन पूगुन बि अज कृ म आ भ अ मू गुनु साथ ।
हरो धरो गाड़ो दियो धन फिरि चढ़इ न हाथ ॥
कौन\-सी तिथियाँ कब हानिकारक होती हैं ?
रबि हर दिसि गुन रस नयन मुनि प्रथमादिक बार ।
तिथि सब काज नसावनी होइ कुजोग बिचार ॥
कौन\-सा चन्द्रमा घातक समझना चाहिये ?
ससि सर नव दुइ छ दस गुन मुनि फल बसु हर भानु ।
मेषादिक क्रम तें गनहिं घात चंद्र जियँ जानु ॥
किन\-किन वस्तुओंका दर्शन शुभ है ?
नकुल सुदरसनु दरसनी छेमकरी चक चाष ।
दस दिसि देखत सगुन सुभ पूजहिं मन अभिलाष ॥
सात वस्तुएँ सदा मङ्गलकारी हैं
सुधा साधु सुरतरु सुमन सुफल सुहावनि बात ।
तुलसी सीतापति भगति सगुन सुमंगल सात ॥
श्रीरघुनाथजीका स्मरण सारे मङ्गलोंकी जड़ है
भरत सत्रुसूदन लखन सहित सुमिरि रघुनाथ ।
करहु काज सुभ साज सब मिलिहि सुमंगल साथ ॥
यात्राके समयका शुभ स्मरण
राम लखन कौसिक सहित सुमिरहु करहु पयान ।
लच्छि लाभ लै जगत जसु मंगल सगुन प्रमान ॥
वेदकी अपार महिमा
अतुलित महिमा बेद की तुलसी किएँ बिचार ।
जो निंदत निंदित भयो बिदित बुद्ध अवतार ॥
बुध किसान सर बेद निज मतें खेत सब सींच ।
तुलसी कृषि लखि जानिबो उत्तम मध्यम नीच ॥
धर्मका परित्याग किसी भी हालतमें नही करना चाहिये
सहि कुबोल साँसति सकल अँगइ अनट अपमान ।
तुलसी धरम न परिहरिअ कहि करि गए सुजान ॥
दूसरेका हित ही करना चाहिये, अहित नहीं
अनहित भय परहित किएँ पर अनहित हित हानि ।
तुलसी चारु बिचारु भल करिअ काज सुनि जानि ॥
प्रत्येक कार्यकी सिद्धिमें तीन सहायक होते हैं
पुरुषारथ पूरब करम परमेस्वर परधान ।
तुलसी पैरत सरित ज्यों सबहिं काज अनुमान ॥
नीतिका अवलम्बन और श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम ही श्रेष्ठ है
चलब नीति मग राम पग नेह निबाहब नीक ।
तुलसी पहिरिअ सो बसन जो न पखारें फीक ॥
दोहा चारु बिचारु चलु परिहरि बाद बिबाद ।
सुकृत सीवँ स्वारथ अवधि परमारथ मरजाद ॥
विवेकपूर्वक व्यवहार ही उत्तम है
तुलसी सो समरथ सुमति सुकृती साधु सयान ।
जो बिचारि ब्यवहरइ जग खरच लाभ अनुमान ॥
जाय जोग जग छेम बिनु तुलसी के हित राखि ।
बिनुऽपराध भृगुपति नहुष बेनु बृकासुर साखि ॥
नेमसे प्रेम बड़ा है
बड़ि प्रतीति गठिबंध तें बड़ो जोग तें छेम ।
बड़ो सुसेवक साइँ तें बड़ो नेम तें प्रेम ॥
किस\-किसका परित्याग कर देना चाहिये
सिष्य सखा सेवक सचिव सुतिय सिखावन साँच ।
सुनि समुझिअ पुनि परिहरिअ पर मन रंजन पाँच ॥
सात वस्तुओंको रस बिगड़नेके पहले ही छोड़ देना चाहिये
नगर नारि भोजन सचिव सेवक सखा अगार ।
सरस परिहरें रंग रस निरस बिषाद बिकार ॥
मनके चार कण्टक हैं
तूठहिं निज रुचि काज करि रूठहिं काज बिगारि ।
तीय तनय सेवक सखा मन के कंटक चारि ॥
कौन निरादर पाते हैं ?
दीरघ रोगी दारिदी कटुबच लोलुप लोग ।
तुलसी प्रान समान तउ होहिं निरादर जोग ॥
पाँच दुःखदायी होते है
पाही खेती लगन बट रिन कुब्याज मग खेत ।
बैर बड़े सों आपने किए पाँच दुख हेत ॥
समर्थ पापीके वैर करना उचित नहीं
धाइ लगै लोहा ललकि खैंचि लेइ नइ नीचु ।
समरथ पापी सों बयर जानि बिसाही मीचु ॥
शोचनीय कौन है
सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग ।
सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग ॥
परमार्थसे विमुख ही अंधा है
तुलसी स्वारथ सामुहो परमारथ तन पीठि ।
अंध कहें दुख पाइहै डिठिआरो केहि डीठि ॥
मनुष्य आँख होते हुए भी मृत्युको नहीं देखते
बिन आँखिन की पानहीं पहिचानत लखि पाय ।
चारि नयन के नारि नर सूझत मीचु न माय ॥
मूढ़ उपदेश नहीं सुनते
जौ पै मूढ़ उपदेस के होते जोग जहान ।
क्यों न सुजोधन बोध कै आए स्याम सुजान ॥
सोरठा
फुलइ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद ।
मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम ॥
दोहा
रीझि आपनी बूझि पर खीझि बिचार बिहीन ।
ते उपदेस न मानहीं मोह महोदधि मीन ॥
बार\-बार सोचनेकी आवश्यकता
अनसमुझें अनुसोचनो अवसि समुझिऐ आपु ।
तुलसी आपु न समुझिऐ पल पल पर परितापु ॥
मूर्खशिरोमणि कौन हैं ?
कूप खनत मंदिर जरत आएँ धारि बबूर ।
बवहिं नवहिं निज काज सिर कुमति सिरोमनि कूर ॥
ईश्वरविमुखकी दुर्गति ही होती है
निडर ईस तें बीस कै बीस बाहु सो होइ ।
गयो गयो कहैं सुमति सब भयो कुमति कह कोइ ॥
जान\-बूझकर अनीति करनेवालेको उपदेश देना व्यर्थ हैं
जो सुनि समुझि अनीति रत जागत रहे जु सोइ ।
उपदेसिबो जगाइबो तुलसी उचित न होइ ॥
बहु सुत बहु रुचि बहु बचन बहु अचार ब्यवहार ।
इनको भलो मनाइबो यह अग्यान अपार ॥
जगत के लोगोंको रिझानेवाला मूर्ख हैं
लोगनि भलो मनाव जो भलो होन की आस ।
करत गगन को गेंडुँआ सो सठ तुलसीदास ॥
अपजस जोग कि जानकी मनि चोरी की कान्ह ।
तुलसी लोग रिझाइबो करषि कातिबो नान्ह ॥
तुलसी जु पै गुमान को होतो कछू उपाउ ।
तौ कि जानकिहि जानि जियँ परिहरते रघुराउ ॥
प्रतिष्ठा दुःखका मूल है
मागि मधुकरी खात ते सोवत गोड़ पसारि ।
पाप प्रतिष्ठा बढ़ि परी ताते बाढ़ी रारि ॥
तुलसी भेड़ी की धँसनि जड़ जनता सनमान ।
उपजत ही अभिमान भो खोवत मूढ़ अपान ॥
भेड़ियाधँसानका उदाहरण
लही आँखि कब आँधरे बाँझ पूत कब ल्याइ ।
कब कोढ़ी काया लही जग बहराइच जाइ ॥
ऐश्वर्य पाकर मनुष्य अपनेको निडर मान बैठते हैं
तुलसी निरभय होत नर सुनिअत सुरपुर जाइ ।
सो गति लखि ब्रत अछत तनु सुख संपति गति पाइ ॥
तुलसी तोरत तीर तरु बक हित हंस बिडारि ।
बिगत नलिन अलि मलिन जल सुरसरिहू बढ़िआरि ॥
अधिकरी बस औसरा भलेउ जानिबे मंद ।
सुधा सदन बसु बारहें चउथें चउथिउ चंद ॥
नौकर स्वामीकी अपेक्षा अधिक अत्याचारी होते है
त्रिबिध एक बिधि प्रभु अनुग अवसर करहिं कुठाट ।
सूधे टेढ़े सम बिषम सब महँ बारहबाट ॥
प्रभु तें प्रभु गन दुखद लखि प्रजहिं सँभारै राउ ।
कर तें होत कृपानको कठिन घोर घन घाउ ॥
ब्यालहु तें बिकराल बड़ ब्यालफेन जियँ जानु ।
वहि के खाए मरत है वहि खाए बिनु प्रानु ॥
कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहिं मोर ।
कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर ॥
काल बिलोकत ईस रुख भानु काल अनुहारि ॥
रबिहि राउ राजहिं प्रजा बुध ब्यवहरहिं बिचारि ॥
जथा अमल पावन पवन पाइ कुसंग सुसंग ।
कहिअ कुबास सुबास तिमि काल महीस प्रसंग ॥
भलेहु चलत पथ पोच भय नृप नियोग नय नेम ।
सुतिय सुभूपति भूषिअत लोह सँवारित हेम ॥
राजाको कैसा होना चाहिये ?
माली भानु किसान सम नीति निपुन नरपाल ।
प्रजा भाग बस होहिंगे कबहुँ कबहुँ कलिकाल ॥
बरषत हरषत लोग सब करषत लखै न कोइ ।
तुलसी प्रजा सुभाग ते भूप भानु सो होइ ॥
राजनीति
सुधा सुजान कुजान फल आम असन सम जानि ।
सुप्रभु प्रजा हित लेहिं कर सामादिक अनुमानि ॥
पाके पकए बिटप दल उत्तम मध्यम नीच ।
फल नर लहैं नरेस त्यों करि बिचारि मन बीच ॥
रीझि खीझि गुरु देत सिख सखा सुसाहिब साधु ।
तोरि खाइ फल होइ भल तरु काटें अपराधु ॥
धरनि धेनु चारितु चरत प्रजा सुबच्छ पेन्हाइ ।
हाथ कछू नहिं लागिहै किएँ गोड़ कि गाइ ॥
चढ़े बधूरें चंग ज्यों ग्यान ज्यों सोक समाज ।
करम धरम सुख संपदा त्यों जानिबे कुराज ॥
कंटक करि करि परत गिरि साखा सहस खजूरि ।
मरहिं कृनृप करि करि कुनय सों कुचालि भव भूरि ॥
काल तोपची तुपक महि दारू अनय कराल ।
पाप पलीता कठिन गुरु गोला पुहुमी पाल ॥
किसका राज्य अचल हो जाता है ?
भूमि रुचिर रावन सभा अंगद पद महिपाल ।
धरम राम नय सीय बल अचल होत सुभ काल ॥
प्रीति राम पद नीति रति धरम प्रतीति सुभायँ ।
प्रभुहि न प्रभुता परिहरै कबहुँ बचन मन कायँ ॥
कर के कर मन के मनहिं बचन बचन गुन जानि ।
भूपहि भूलि न परिहरै बिजय बिभूति सयानि ॥
गोली बान सुमंत्र सर समुझि उलटि मन देखु ।
उत्तम मध्यम नीच प्रभु बचन बिचारि बिसेषु ॥
सत्रु सयानो सलिल ज्यों राख सीस रिपु नाव ।
बूड़त लखि पग डगत लखि चपरि चहूँ दिसि घाव ॥
रैअत राज समाज घर तन धन धरम सुबाहु ।
सांत सुसचिवन सौंपि सुख बिलसइ नित नरनाहु ॥
मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक ।
पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक ॥
सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ ।
तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ ॥
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस ।
राज धर्म तन तीनी कर होइ बेगिहीं नास ॥
रसना मन्त्री दसन जन तोष पोष निज काज ।
प्रभु कर सेन पदादिका बालक राज समाज ॥
लकड़ी डौआ करछुली सरस काज अनुहारि ।
सुप्रभु संग्रहहिं परिहरहिं सेवक सखा बिचारि ॥
प्रभु समीप छोटे बड़े रहत निबल बलवान ।
तुलसी प्रगट बिलोकिऐ कर अँगुली अनुमान ॥
आज्ञाकारी सेवक स्वामी से बड़ा होता है
साहब तें सेवक बड़ो जो निज धरम सुजान ।
राम बाँधि उतरे उदधि लाँघि गए हनुमान ॥
मूलके अनुसार बढ़नेवाला और बिना अभिमान किये
सबको सुख देनेवाला पुरुष ही श्रेष्ठ है
तुलसी भल बरतरु बढ़त निज मूलहिं अनुकुल ।
सबहि भाँति सब कहँ सुखद दलनि फलनि बिनु फूल ॥
त्रिभुवनके दीप कौन है ?
सघन सगुन सधरम सगन सबल सुसाइँ महीप ।
तुलसी जे अभिमान बिनु ते तिभुवन के दीप ॥
कीर्ति करतूतिसे ही होती है
तुलसी निज करतूति बिनु मुकुत जात जब कोइ ।
गयो अजामिल लोक हरि नाम सक्यो नहिं धोइ ॥
बड़ो का आश्रय भी मनुष्यको बड़ा बना देता है
बड़ो गहे ते होत बड़ ज्यों बावन कर दंड ।
श्रीप्रभु के सँग सों बढ़ो गयो अखिल ब्रह्मंड ॥
कपटी दानीकी दुर्गति
तुलसी दान जो देत हैं जल में हाथ उठाइ ।
प्रतिग्राही जीवै नहीं दाता नरकै जाइ ॥
अपने लोगोंके छोड़ देनेपर सभी वैरी हो जाते है
आपन छोड़ो साथ जब ता दिन हितू न कोइ ।
तुलसी अंबुज अंबु बिनु तरनि तासु रिपु होइ ॥
साधनसे मनुष्य ऊपर उठता है और साधन बिना गिर जाता है
उरबी परि कलहीन होइ ऊपर कलाप्रधान ।
तुलसी देखु कलाप गति साधन घन पहिचान ॥
सज्जनोको दुष्टोंका संग भी मङ्गलदायक होता है
तुलसी संगति पोच की सुजनहि होति म\-दानि ।
ज्यों हरि रूप सुताहि तें कीनि गोहारि आनि ॥
कलियुगमें कुटिलताकी वृद्धि
कलि कुचालि सुभ मति हरनि सरलै दंडै चक्र ।
तुलसी यह निहचय भई बाढ़ि लेति नव बक्र ॥
आपसमें मेल रखना उत्तम है
गो खग खे खग बारि खग तीनों माहिं बिसेक ।
तुलसी पीवैं फिरि चलैं रहैं फिरै सँग एक ॥
सब समय समतामे स्थित रहनेवाले पुरुष ही श्रेष्ठ हैं
साधन समय सुसिद्धि लहि उभय मूल अनुकूल ।
तुलसी तीनिउ समय सम ते महि मंगल मूल ॥
जीवन किनका सफल है ?
मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहिं सुभायँ ।
लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ ॥
पिताकी आज्ञाका पालन सुखका मूल है
अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन ।
ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन ॥
स्त्रीके लिये पतिसेवा ही कल्याणदायिनी है
सोरठा
सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ ।
जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय ॥
शरणागतका त्याग पापका मूल है
दोहा
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि ।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहिं बिलोकत हानि ॥
तुलसी तृन जलकूल को निरबल निपट निकाज ।
कै राखे कै सँग चलै बाँह गहे की लाज ॥
कलियुगका वर्णन
रामायन अनुहरत सिख जग भयो भारत रीति ।
तुलसी सठ की को सुनै कलि कुचालि पर प्रीति ॥
पात पात कै सींचिबो बरी बरी कै लोन ।
तुलसी खोटें चतुरपन कलि डहके कहु को न ॥
प्रीति सगाई सकल बिधि बनिज उपायँ अनेक ।
कल बल छल कलि मल मलिन डहकत एकहि एक ॥
दंभ सहित कलि धरम सब छल समेत ब्यवहार ।
स्वारथ सहित सनेह सब रूचि अनुहरत अचार ॥
चोर चतुर बटमार नट प्रभु प्रिय भँडुआ भंड ।
सब भच्छक परमारथी कलि सुपंथ पाषंड ॥
असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहीं ।
तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं ॥
सोरठा
जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ ।
मन क्रम बचन लबार ते बकता कलिकाल महुँ ॥
दोहा
ब्रह्मग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात ।
कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात ॥
बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि ।
जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि ॥
साखी सबदी दोहरा कहि कहनी उपखान ।
भगति निरूपहिं भगत कलि निंदहिं बेद पुरान ॥
श्रुति संमत हरिभगति पथ संजुत बिरति बिबेक ।
तेहि परिहरिहिं बिमोह बस कल्पहिं पंथ अनेक ॥
सकल धरम बिपरीत कलि कल्पित कोटि कुपंथ ।
पुन्य पराय पहार बन दुरे पुरान सुग्रन्थ ॥
धातुबाद निरुपाधि बर सद्गुरू लाभ सुमीत ।
देव दरस कलिकाल में पोथिन दुरे सभीत ॥
सुर सदननि तीरथ पुरिन निपट कुचालि कुसाज ।
मनहुँ मवा से मारि कलि राजत सहित समाज ॥
गोंड़ गवाँर नृपाल महि जमन महा महिपाल ।
साम न दान न भेद कलि केवल दंड कराल ॥
फोरहिं सिल लोढ़ा सदन लागें अढुक पहार ।
कायर कूर कुपूत कलि घष घर सहस डहार ॥
प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान ।
जेन केन बिधि दीन्हे दान करइ कल्यान ॥
कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास ।
गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास ॥
और चाहे जो भी घट जाय,
भगवान से प्रेम नहीं घटना चाहिये
श्रवन घटहुँ पुनि दृग घटहुँ घटउ सकल बल देह ।
इते घटें घटिहै कहा जौं न घटै हरिनेह ॥
कुसमयका प्रभाव
तुलसी पावस के समय धरी कोकिलन मौन ।
अब तो दादुर बोलिहैं हमें पूछिहै कौन ॥
श्रीरामजीके गुणोंकी महिमा
कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड ।
दहन राम गुन ग्राम जिमि ईंधन अनल प्रचंड ॥
कलियुगमें दो ही आधार है
सोरठा
कलि पाषंड प्रचार प्रबल पाप पावँर पतित ।
तुलसी उभय अधार राम नाम सुरसरि सलिल ॥
भगवत्प्रेम ही सब मङ्गलोंकी खान है
दोहा
रामचंद्र मुख चंद्रमा चित चकोर जब होइ ।
राम राज सब काज सुभ समय सुहावन सोइ ॥
बीज राम गुन गन नयन जल अंकुर पुलकालि ।
सुकृती सुतन सुखेत बर बिलसत तुलसी सालि ॥
तुलसी सहित सनेह नित सुमिरहु सीता राम ।
सगुन सुमंगल सुभ सदा आदि मध्य परिनाम ॥
पुरुषारथ स्वारथ सकल परमारथ परिनाम ।
सुलभ सिद्धि सब साहिबी सुमिरत सीता राम ॥
दोहावलीके दोहोंकी महिमा
मनिमय दोहा दीप जहँ उर घर प्रगट प्रकास ।
तहँ न मोह तम भय तमी कलि कज्जली बिलास ॥
का भाषा का संसकृत प्रेम चाहिऐ साँच ।
काम जु आवै कामरी का लै करिअ कुमाच ॥
रामकी दीनबन्धुता
मनि मानिक महँगे किए सहँगे तृन जल नाज ।
तुलसी एते जानिऐ राम गरीब नेवाज ॥
॥ इति ॥