देस बिराना 31 - 35

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इकतीस[edit]

गुड्डी का खत आया है। सिर्फ तीन लाइन का। समझ नहीं पा रहा हूं, जब उसके सामने खुल कर खत लिखने की आज़ादी नहीं है तो

उसने ये पत्र भी क्यों लिखा! बेशक पत्र तीन ही पंक्तियों का है लेकिन मैं उन बीस पच्चीस शब्दों के पीछे छुपी पीड़ा को साफ साफ

पढ़ पा रहा हूं। लिखा है उसने

वीरजी,


इस वैसाखी के दिन मेरी डोली विदा होने के साथ ही मेरी ज़िंदगी में कई नये रिश्ते जुड़ गये हैं। ये सारे रिश्ते ही अब मेरा वर्तमान

और भविष्य होंगे। मुझे अफ़सोस है कि मैं आपको दिये कई वचन पूरे न कर सकी। मैं अपने घर, नये माहौल और नये रिश्तों की

गहमागहमी में बहुत खुश हूं। मेरा दुर्भाग्य कि मैं आपको अपनी शादी में भी न बुला सकी। मेरे और उनके लिए भेजे गये गिफ्ट हमें

मिल गये थे और हमें बहुत पसंद आये हैं। मेरी तरफ से किसी भी किस्म की चिंता न करें। आपकी छोटी बहन, हरप्रीत कौर (अब नये घर में यही मेरा नया नाम है।) इस पत्र से तो यही लगता है कि गुड्डी ने खुद को हालात के सामने पूरी तरह सरंडर कर दिया है नहीं तो भला ऐसे कैसे हो सकता

था कि वह इतना फार्मल और शुष्क खबर देने वाला ऐसा खत लिखती और अपना पता भी न लिखती। मैं भी क्या करूं गुड्डी! एक बार फिर तुझसे भी माफी मांग लेता हूं कि मैं तेरे लिए इस जनम में कुछ भी नहीं कर पाया। वो जो तू

अपने बड़े भाई की कद काठी, पर्सनैलिटी और लाइफ स्टाइल देख कर मुग्ध हो गयी थी और लगे हाथों मुझे अपना आदर्श बना लिया

था, मैं तुझे कैसे बताऊं गुड्डी कि मैं एक बार फिर यहां अपनी लड़ाई हार चुका हूं। अब तो मेरी खुद की जीने की इच्छा ही मर गयी

है। तुझे मैं बता नहीं सकता कि मैं यहां अपने दिन कैसे काट रहा हूं। तेरे पास फिर भी सगे लोग तो हैं, बेशक उनसे अपनापन न

मिले, मैं तो कितना अकेला हूं यहां और खालीपन की ज़िंदगी किसी तरह जी रहा हूं। मैं ये बातें गुड्डी को लिख भी तो नहीं

सकता।  कल रात गौरी से तीखी नोंक झोंक हो गयी थी। बात वही थी। न मैं पैसे मांगूंगा और न उसे इस बात का ख्याल आयेगा। हम दोनों

को एक शादी में जाना था। गौरी ने मुझे सुबह बता दिया था कि शादी में जाना है। कोई अच्छा सा गिफ्ट ले कर रख लेना। मैं वहीं

तुम्हारे पास आ जाऊंगी। सीधे चले चलेंगे। जब गौरी ने यह बात कही थी तो उसे चाहिये था कि मेरे स्वभाव और मेरी जेब के

मिज़ाज को जानते हुए बता भी देती कि कितने तक का गिफ्ट खरीदना है और कहती - ये रहे पैसे। उसने दोनों ही काम नहीं किये

थे। अब मुझे क्या पड़ी थी कि उससे पैसे मांगता कि गिफ्ट के लिए पैसे दे दो। जब हांडा ग्रुप घर खर्च के सारे पैसे तुम्हें ही देता है

तो तुम्हीं संभालो ये सारे मामले। फिलहाल तो मैं ठनठन गोपाल हूं और मैं किसी को गिफ्ट देने के लिए गौरी से पैसे मांगने से रहा। शाप बंद हो जाने के बाद गौरी जब शादी के रिसेप्शन में जाने के लिए आयी तो कार में मेरे बैठने के साथ ही उसने पूछा - तुम्हारे

हाथ खाली हैं, गिफ्ट कहां है? - नहीं ले पाया। - क्यों, कहा तो था मैंने, उसने गाड़ी बीच में ही रोक दी है। - बताया न, नहीं ले पाया, बस। - लेकिन कोई वज़ह तो होगी, न लेने की। अब सारी शॉप्स बंद हो गयी हैं। क्या शादी में खाली हाथ जायेंगे। दीप,

तुम भी कई बार .. वह झल्ला रही है। - गौरी, इस तरह से नाराज़ होने की कोई ज़रूरत नहीं है। न चाहते हुए भी मेरा पारा गर्म होने लगा है। तुम्हें अच्छी

तरह से पता है, मेरे पास पैसों का कोई इंतज़ाम नहीं है। और तुम्हें यह भी पता है कि न मैं घर से बिना तुम्हारे कहे पैसे उठाता हूं

और न ही स्टोर्स में से अपने पर्सनल काम के लिए कैशियर से वाउचर ही बनवाता हूं। गिफ्ट के लिए कहते समय तुम्हें इस बात का

ख्याल रखना चाहिये था।

      - यू आर ए लिमिट! गौरी ज़ोर से चीखी है। मैं तो तंग आ गयी हूं तुम्हारे इन कानूनों से। मैं ये नहीं करूंगा और मैं वो नहीं 

करूंगा। आखिर तुम्हें हर बार ये जतलाने की ज़रूरत क्यों पड़ती है कि तुम्हारे पास पैसे नहीं हैं। क्यों बार-बार तुम यही टॉपिक छेड़

देते हो। आखिर मैं भी क्या करूं? क्रेडिट कार्ड तुम्हें चाहिये नहीं, कैश तुम उठाओगे नहीं और मांगोगे भी नहीं, बस, ताने मारने का

कोई मौका छोड़ोगे नहीं। - देखो गौरी, इस तरह से शोर मचाने की ज़रूरत नहीं है। मैं फिर भी खुद को शांत रखे हुए हूं - जहां तक पैसों या

किसी भी चीज को लेकर मेरे प्रिंसिपल्स की बात है, तुम कई बार मेरे मुंह से सुन चुकी हो कि मैं अपने आप कहीं से भी पैसे नहीं

उठाऊंगा। काम होता है या नहीं होता, मेरी जिम्मेवारी नहीं है। - मैं तुमसे कितनी बार कह चुकी हूं, डीयर कि हमें जो पैसे दिये जाते हैं वे हम दोनों के लिए हैं और सांझे हैं। हम

दोनों के कॉमन पूल में रखे रहते हैं। तुम उसमें से लेते क्यों नहीं हो। अब तो तुम नये नहीं हो। न हमारे रिश्ते इतने फार्मल हैं कि

आपस में एक दूसरे से पूछना पड़े कि ये करना है और वो करना हैं। अब तुम्हारी ज़रा सी जिद की वज़ह से गिफ्ट रह गया न.. अब

जा कर अपनी शॉप से कोई बुके ही ले जाना पड़ेगा। - हमारे आपसी रिश्तों की बात रहने दो, बाकी, जहां तक पैसों की बात है तो मैं अभी भी अपनी बात पर टिका हुआ

हूं कि मैं आज तक हांडा ग्रुप का सिस्टम समझ नहीं पाया कि मेरी हैसियत क्या है इस घर में !! - अब फिर लगे कोसने तुम हांडा ग्रुप को। इसी ग्रुप की वजह से तुम...। - डोंट क्रॉस यूअर लिमिट गौरी। मुझे भी गुस्सा आ गया है - पहली बात तो यह कि मैं वहां सड़क पर नहीं बैठा था कि मेरे पास

यहां रहने खाने को नहीं है, कोई मुझे शरण दे दे और दूसरी बात कि बंबई में पहली ही मुलाकात में ही तुम्हारे सामने ही मुझसे दस

तरह के झूठ बोले गये थे। मुझे पता होता कि यहां आ कर मुझे मुफ्त की सैल्समैनी ही करनी है तो मैं दस बार सोचता। - दीप, तुम ये सारी बातें मुझसे क्यों कर रहे हो। आखिर क्या कमी है तुम्हें यहां.. मजे से रह रहे हो और शानदार

स्टोर्स के अकेले कर्त्ताधर्त्ता हो। अब तुम्हीं पैसे न लेना चाहो तो कोई क्या करे!! - पैसे देने का कोई तरीका भी होता है। अब मैं रहूं यहां और पैसे इंडिया में अपने घर से मंगाऊं, ये तो नहीं हो

सकता। - तुम्हें किसने मना किया है पैसे लेने से। सारे दामाद कॉमन पूल से ले ही रहे हैं और क्रेडिट कार्ड से भी खूब खर्च

करते रहते हैं। कैश भी उठाते रहते हैं। कभी कोई उनसे पूछता भी नहीं कि कहां खर्च किये और क्यों किये। किसी को खराब नहीं

लगता। तुम्हारी समझ में ही यह बात नहीं आती। तुम्हें किसने मना किया है पैसे लेने से। - मेरे अपने कुछ उसूल हैं।

- तो उन्हीं उसूलों का ड्रिंक बना कर दिन रात पीते रहो। सारा मूड ही चौपट कर दिया। गौरी झल्लाई है। 

- कभी मेरे मूड की भी परवाह कर लिया करो। मैंने भी कह ही दिया है। - तुमसे तो बात करना भी मुश्किल है।  कार में हुई इस नोंक-झोंक का असर पूरे रास्ते में और बाद में पार्टी में भी रहा है। शिशिर ने एक किनारे ले जा कर पूछा है - आज

तो दोनों तरफ ही फुटबाल फूले हुए हैं। लगता है, काफी लम्बा मैच खेला गया है। मैं भरा पड़ा हूं। हालांकि मुझे अफसोस भी हो रहा है कि मैं पहली बार गौरी से इतने ज़ोर से बोला और उससे ऐसी बातें कीं जो मुझे

ही छोटा बनाती हैं। लेकिन मैं जानता हूं, मेरी ये झल्लाहट सिर्फ पैसों के लिए या गिफ्ट के लिए नहीं है। इसके पीछे मुझसे बोले गये

सारे झूठ ही काम कर रहे हैं। जब से शिशिर ने मुझे गौरी के अबॉर्शन के बारे में बताया है, मैं तब से भरा पड़ा था। आज गुस्सा

निकला भी तो कितनी मामूली बात पर। हालांकि मैं शिशिर के सामने मैं खुद को खोलना नहीं चाहता लेकिन उसके सामने कुछ भी

छुपाना मेरे लिए बहुत मुश्किल हो जाता है। मैंने उसे पूरा किस्सा सुना दिया है। शिशिर ने फिर मुझे ही डांटा है - तुम्हें मैं कितनी बार समझा चुका हूं कि अब तो तुम्हें यहां रहते इतना अरसा हो गया है। अब तक तो तुम्हें हांडा ग्रुप से अपने

लायक एक आध लाख पाउंड अलग कर ही लेने चाहिये थे। इतना बड़ा स्टोर्स संभालते हो और तुम्हारी जेब में दस पेंस का सिक्का

भी खोजे नहीं मिलेगा। मेरी मानो, इन बातों की वजह से गौरी से लड़ने झगड़ने की ज़रूरत नहीं है। थोड़ी डिप्लोमेसी भी सीखो। चोट

कहीं और करनी चाहिये तुम्हें और एनर्जी यहां वेस्ट कर रहे हो। खैर, ये भी ठीक हुआ कि तुमने गौरी से ही सही, अपने मन की

बात कही तो सही। अब देखें, ये बातें कितनी दूर तक जाती हैं।  इस बीच मेरी छटपटाहट बहुत बढ़ चुकी है। गौरी से अबोला चल रहा है। न वह अपने किये के लिए शर्मिंदा है, न मैं यह मानने के

लिए तैयार हूं कि मैं गलत हूं। अब तो वह भी बिना सैक्स के सो रही है और मैं भी, जो भी मिलता है, खा लेता हूं। दोनों ही एक

दूसरे से काफी दूर होते जा रहे हैं। मैं भी अब चाहने लगा हूं, ये सब यहीं खत्म हो जाये तो पिंड छूटे। किसी तरह वापिस लौटा जा

सकता तो ठीक रहता। काम की तरफ ध्यान देना मैंने कब से छोड़ दिया है। भाड़ में जायें सब। मैं ही हांडा परिवार की दौलत बढ़ाने

के लिए क्यों दिन रात खटता रहूं। मेरी सेहत भी आजकल खराब चल रही है। मैं बेशक इस बाबत किसी से बात नहीं करता और

किसी से कोई शिकायत भी नहीं करता लेकिन बात अब हांडा परिवार के मुखिया तक पहुंच ही गयी है।  उन तक बात पहुंचाने के पीछे गौरी का नहीं, शिशिर का ही हाथ लगता है। शिशिर ने शिल्पा से कहा होगा और शिल्पा ने अपने पापा तक बात पहुंचायी होगी कि ज़रा ज़रा सी बात पर गौरी दीप से लड़ पड़ती

है और बार बार उस बेचारे का अपमान करती रहती है। उसी ने पापा से कहा होगा कि आप लोग बीच में पड़ कर मामले को

सुलझायें वरना अच्छा खासा दामाद अपना दिमाग खराब कर बैठेगा। शायद उसने उन्हें पैसे न लेने के बारे में मेरी ज़िद के बारे में

भी कहा हो। बताया होगा - अगर यही हाल रहा तो आप लोग एक अच्छे भले आदमी को इस तरह से मार डालेंगे। इसमें नुक्सान

आपका और गौरी का ही है। पता नहीं, उन्हें ये बात क्लिक कर गयी होगी, इसीलिए गौरी के शॉप पर जाने के बाद पापा मुझसे

मिलने आये हैं। 

बत्‍तीस[edit]

यह इन दो ढाई साल में पहली बार हो रहा है कि मैं और मेरे ससुर इस तरह अकेले और इन्फार्मली बात कर रहे हैं। उन्होंने मेरी

सेहत के बारे में पूछा है। मेरी दिनचर्या के बारे में पूछा है और मेरी उदासी का कारण जानना चाहा है। पहले तो मैं टालता हूं। उनसे

आंखें मिलाने से भी बचता हूं लेकिन जब उन्होंने बहुत ज़ोर दिया है तो मैं फट पड़ा हूं। इतने अरसे से मैं घुट रहा था। कितना कुछ

है जो मैं किसी से कहना चाह रहा था लेकिन आज तक कह नहीं पाया हूं और न ही किसी ने मेरे कंधे पर हाथ ही रखा है। पहले

तो वे चुपचाप मेरी बातें ध्यान से सुनते रहे। मैंने उन्हें विस्तार से सारी बातें बतायी हैं। बंबई में हुई पहली मुलाकात से लेकर आज

तक कि किस तरह मेरे साथ एक के बाद एक झूठ बोले गये और एक तरह से झांसा दे कर मुझे यहां लाया गया है। मैंने उन्हें गौरी

की पढ़ाई के बारे में बोले गये झूठ के बारे में भी बताया लेकिन उसके एबार्शन वाली बात गोल कर गया। यह एक पिता के साथ

ज्यादती होती। जब उन्होंने देखा कि मैं जो कुछ कहना चाहता था, कह चुका हूं तो वे धीरे से बोले हैं - तुम्हारे साथ बहुत जुल्म हुआ है बेटे। मुझे नहीं मालूम था कि तुम अपने सीने पर इतने दिनों से इतना बोझ लिये लिये घूम रहे

हो। तुम अगर मेरे पास पहले ही आ जाते तो यहां तक नौबत ही न आती। इस तरह तो तुम्हारी सेहत खराब हो जायेगी। तुम चिंता

मत करो। हमें एक मौका और दो। तुम्हें अब किसी भी बात की शिकायत नहीं रहेगी। गौरी ने भी कभी ज़िक्र नहीं किया और न ही

चमन वगैरह ने ही बताया कि तुम्हारी क्या बातें हुई थीं। बल्कि हम तो शॉप में और हांडा ग्रुप में तुम्हारी दिलचस्पी देख कर बहुत

खुश थे। आज तक किसी भी दामाद ने हमारे ऐस्टैब्लिशमेंट में इतनी दिलचस्पी नहीं ली थी। बेहतर यही होगा कि तुम अब इस

हादसे को भूल जाओ और हमें एक मौका और दो। मैं गौरी को समझा दूंगा। तुम्हारे लिए एक अच्छी खबर है कि तुम्हारी शॉप के

प्रॉफिट भी इस दौरान बहुत बढ़े हैं। सब तुम्हारी मेहनत का नतीजा है। तुम्हें इसका ईनाम मिलना ही चाहिये। एक काम करते हैं,

गौरी और तुम्हारे लिए पूरे योरोप की ट्रिप एरेंज करते हैं। थोड़ा घूम फिर आओ। थकान भी दूर हो जायेगी और तुम दोनों में पैचअप

भी हो जायेगा। जाओ, एंजाय करो और एक महीने से पहले अपनी शक्ल हमें मत दिखाना। जाने का सारा इंतजाम हो जायेगा। गौरी

भी खुश हो जायेगी कि तुम्हारे बहाने उसे भी घूमने फिरने का मौका मिल रहा है। जाते जाते वे मेरे हाथ में फिर एक बड़ा सा

लिफाफा दे गये हैं - अपने लिए शॉपिंग कर लेना। उन्होंने मेरा कंधा दबाया है - देखो इनकार मत करना। मुझे खराब लगेगा। और

सुनो, ये पैसे गौरी को दिये जाने वाले पैसों से अलग हैं इसलिए इनके बारे में गौरी को बताने की जरूरत नहीं है। मैं समझ रहा हूं कि ये रिश्वत है मुझे शांत करने की, लेकिन अब वे खुद पैच अप का प्रस्ताव ले कर आये हैं तो एक

दम इनकार करना भी ठीक नहीं है। मुझे हनीमून के बाद आज पहली बार एक साथ इतने पैसे दिये जा रहे हैं। जब शिशिर को इस बारे में मैंने बताया तो वह खुशी से उछल पड़ा - अब आया न ऊंट पहाड़ के नीचे। ये सब मेरी ही शरारत का

नतीजा है कि तुमने इतना बड़ा हाथ मारा है। अब बीच बीच में इस तरह के नाटक करते रहोगे तो सुखी रहोगे। और इस तरह मेरे सामने ये चुग्गा डाल दिया गया है। हालांकि गौरी ने सौरी कह दिया है लेकिन मलाल की बारीक सी रेखा भी

उसके चेहरे पर नहीं है। जिस तरह की बातें उसने की थीं, उससे मेरी मानसिक अशांति इतनी जल्दी दूर नहीं होगी। वैसे भी जब भी

मेरे सामने पड़ती है, मुझे उसके अतीत का भूत सताने लगता है और मैं बेचैन होने लगता हूं। उसके प्रति मेरे स्नेह की बेलें सूखती

चली जा रही हैं।  लेकिन मेरी ये खुशी भी कितनी अल्पजीवी है। हांडा ग्रुप से पैसे मिलने के अगले दिन ही नंदू का पत्र आ गया है। पत्र वाकई परेशानी

में डालने वाला है। उसने लिखा है कि गुड्डी की ससुराल में उसे दहेज के लिए परेशान किया जा रहा है। दारजी उसके पास बहुत

परेशानी में आये थे और उसे बता रहे थे कि गुड्डी की ससुराल वालों ने न तो उसे इम्तिहान देने दिये और न ही वे उसे मायके ही

आने देते हैं। ऊपर से दहेज के लिए सता रहे हैं कि तुम्हारे लंदन वाले भाई का क्या फायदा हुआ। एक लाख की मांग रखी है

उन्होंने। नंदू ने लिखा है - ये पैसे तो मैं भी दे दूं लेकिन संकट ये है कि उनका मुंह एक बार खुल गया तो वे अक्सर मांग करते रहेंगे और

न मिलने पर गुड्डी को सतायेंगे। बोलो, क्या करूं। हो सके तो फोन कर देना। हमारे दारजी ने तो जैसे पूरे परिवार को ही तबाह करने की कसम खा रखी है। मुझे बेघर करके भी उन्हें चैन नहीं था, अब उस

मासूम की जान ले कर ही छोड़ेंगे। उन्हें लाख कहा कि गुड्डी की शादी के मामले में जल्दीबाजी मत करो लेकिन दारजी अगर किसी

की बात मान लें तो फिर बात ही क्या !! अब पैसे दे भी दें तो इस बात की क्या गारंटी कि वे लोग अब गुड्डी को सताना बंद कर

देंगे। अब तो उनकी निगाह लंदन वाले भाई पर है। इतनी आसानी से थोड़े ही छोड़ेंगे। नंदू से फोन पर बात करके देखता हूं। नंदू ने तसल्ली दी है कि वैसे घबराने की कोई जरूरत नहीं है। दारजी ने कुछ ज्यादा ही बढ़ा- चढ़ा कर बात कही थी। वैसे वे लोग

गुड्डी पर दबाव बनाये हुए हैं कि कुछ तो लाओ, लेकिन दारजी के पास कुछ हो तो दें। मैं उन्हें बता दूंगा कि तुझसे बात हो गयी है।

तू घबरा मत। मैं सब संभाल लूंगा। नंदू ने बेशक तसल्ली दे दी है लेकिन मैं ही जानता हूं कि इस वक्त गुड्डी बेचारी पर क्या गुज़र रही होगी। उसने तो मुझे पत्र लिखना

भी बंद कर दिया है ताकि उसकी तकलीफों की तत्ती हवा भी मुझ तक न पहुंचे। इस बारे में शिशिर से बात करके देखनी चाहिये,

वही कोई राह सुझायेगा। मेरा तो दिमाग काम नहीं कर रहा है। शिशिर ने पूरी बात सुनी है। उसका कहना है कि वैसे तो यहां से इस तरह के नाज़ुक संबंधों का निर्वाह कर पाना बहुत मुश्किल है,

क्योंकि यहां से तुम कुछ भी करो, तुम्हारे दारजी सारे कामों पर पानी फेरने के लिए वहां बैठे हुए हैं। दूसरे, तुम्हें फीडबैक आधा

अधूरा और इतनी देर से मिलेगा कि तब तक वहां कोई और डेवलेपमेंट हो चुका होगा और तुम्हें पता भी नहीं चल पायेगा। फिर भी,

यह बहन की ससुराल का मामला है। ज़रा संभल कर काम करना होगा और फिर गुड्डी का भी देखना होगा। उसे भी इस तरह से उन

जंगलियों के बीच अकेला भी नहीं छोड़ा जा सकता। उसकी सुख शांति में तुम्हारा भी योगदान होगा ही। वैसे, थोड़ा इंतज़ार कर लेने

में कोई हर्ज़ नहीं है। उसी की सलाह पर मैं नंदू को फिर फोन करता हूं और बताता हूं कि मैं पचास हजार रुपये के बराबर पाउंड भिजवा

रहा हूं। कैश कराके दारजी तक पहुंचा देना। बस दारजी ये देख लें कि वे लोग ये पैसे देख कर बार बार मांग न करने लगें और कहीं

इसके लिए गुड्डी को सतायें नहीं। नंदू को यह भी बता दिया है मैंने कि मैं महीने भर की ट्रिप पर रहूंगा। वैसे मैं उससे कांटैक्ट

करता रहूंगा फिर भी कोई अर्जेंट मैसेज हो तो इस नम्बर पर शिशिर को दिया जा सकता है। मुझ तक बात पहुंच जायेगी। नंदू को बेशक मैंने तसल्ली दे दी है लेकिन मेरे ही मन को तसल्ली नहीं है, फिर भी ड्राफ्ट भेज दिया है। शायद ये पैसे ही गुड्डी की

ज़िंदगी में कुछ रौनक ला पायें। 


तैंतीस[edit]

हमारी ट्रिप अच्छी रही है लेकिन मेरे दिमाग में लगातार गुड्डी ही छायी रही है। इस ट्रिप में वैसे तो हम दोनों की ही लगातार

कोशिश रही कि पैच अप हो जाये और हमारे संबंधों में जो खटास आ गयी है उसे कम किया जा सके। मैं अपनी ओर से इस ट्रिप

को दुखद नहीं बनाना चाहता। मैं भरसक नार्मल बना हुआ हूं। दिमाग में हर तरह की परेशानियां होते हुए भी उसके सुख और आराम

का पूरा ख्याल रख रहा हूं। गौरी ने फिर जिद की है कि मैं भी क्रेडिट कार्ड बनवा लूं या उसी के कार्ड में ऐड ऑन ले लूं लेकिन इस बार भी मैंने मना कर दिया

है।  हम लौट आये हैं। हम दोनों ने हालांकि आपसी संबंध नार्मल बनाये रखे हैं लेकिन मुझे नहीं लगता, जो दरार हम दोनों के बीच एक

बार आ चुकी है, उसे कोई भी सीमेंट ठीक से जोड़ पायेगा। लौटने के बाद भी स्थितियों में कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ है। सिर्फ बोलचाल हो रही है और हम जाहिर तौर पर किसी को भनक

नहीं लगने देते कि हममें डिफरेंसेस चल रहे हैं। जो पैसे मुझे दिये गये थे, उसमें से जो बचे हैं वे मेरे ही पास हैं। वे भी इतने हैं कि

मेरे जैसे कंजूस आदमी के लिए तो महीनों काफी रहेंगे।  मेरी गैरहाजरी में सिर्फ अलका दीदी और देवेन्‍द्र जी का ही पत्र आया हुआ है। एक तरह से तसल्ली भी हुई है कि घर से कोई पत्र

नहीं आया है, इसलिए मैं मान कर चल रहा हूं कि वहां सब ठीक ही होगा। फिर भी शिशिर से पूछ लेता हूं कि नंदू का कोई फोन

वगैरह तो नहीं आया था। वह इनकार करता है - नहीं, कोई संदेश नहीं आया तो सब ठीक ही होना चाहिये। वैसे तुम भी एक बार

नंदू को फोन करके हाल चाल ले ही लो। मैं भी यही सोच कर नंदू से ही बात करता हूं। वह जो कुछ बताता है वह मुझे परेशान करने के लिए काफी है। नंदू ने जब ये बताया

कि उसे तो आज ही मेरा भेजा एक हज़ार पाउंड का दूसरा ड्राफ्ट भी मिल गया है तो मैं हैरान हो गया हूं। ज़रूर दूसरा ड्राफ्ट शिशिर

ने ही भेजा होगा जबकि मुझे मना कर रहा था कि नंदू का कोई फोन नहीं आया। मैं नंदू से ही पूछता हूं - तूने शिशिर को फोन किया था क्या ? बताता है वह - हां, किया तो था लेकिन पैसों के लिए नहीं बल्कि यह बताने के लिए कि तुझ तक यह संदेश पहुंचा दे कि ड्राफ्ट

मिल गया है और कि गुड्डी की परेशानी में कोई कमी नहीं आयी है। बेशक वह ससुराल की कोई शिकायत नहीं करती और उनके

संदेशे हम तक पहुंचाती भी नहीं, लेकिन कुल मिला कर वह तकलीफ में है। बता रहा है कि दारजी आये थे और रो रहे थे कि किन भुक्खे लोगों के घर अपनी लड़की दे दी है। बेचारी को घर भी नहीं आने देते।

वही बता रहे थे किसी तरह पचास हज़ार का इंतज़ाम हो जाता तो उनका मुंह बंद कर देते। बहुत सोचने विचारने के बाद मैंने तेरे

भेजे ड्राफ्ट में से दारजी को पचास हज़ार रुपये दिये थे ताकि उनका मुंह बंद कर सकें। मैंने तो खाली शिशिर को यही कहा था कि

तुझे खबर कर दे कि पैसों को ले कर परेशान होने की जरूरत नहीं है। पूछता हूं मैं - और पैसे भेजूं क्या? - नहीं ज़रूरत नहीं है। ये दो हज़ार पाउंड भी तो एक लाख रुपये से ऊपर ही होते हैं। तू फिकर मत कर.. मैं हूं न....। मैं दोहरी चिंता में पड़ गया हूं। उधर गुड्डी की परेशानी और इधर अपने आप आगे बढ़ कर शिशिर ने इतनी बड़ी रकम भेज दी है।

पचास हजार की रकम कोई मामूली रकम नहीं होती और जब मैंने पूछा तो साफ मुकर गया कि कोई फोन ही नहीं आया था। उससे

इन पैसों के बारे में कुछ कह कर उसे छोटा बना सकता हूं और न ही चुप ही रह सकता हूं। उसने इधर उधर से इंतज़ाम किया

होगा। शायद अपने घर भेजे जाने वाले पैसों में ही कुछ कमी कटौती की हो उसने। उधर नंदू अपने आप मेरी जगह मेरे घर की सारी

जिम्मेवारी उठा रहा है और बिना एक भी शब्द बोले दारजी को पचास हजार थमा आता है कि उनकी लड़की को ससुराल में कोई

परेशानी न हो। ये वही दारजी है जिन्होंने गुड्डी की सिफारिश लाने पर उससे कह दिया था कि ये हमारा घरेलू मामला है, और मैं

यहां अपने घर से सात समंदर पार सारी जिम्मेवारियों से मुक्त बैठा हुआ हूं। उनके लिए न कुछ कर पा रहा हूं और न उनके सुख

दुख में शामिल हो पा रहा हूं।  दारजी, नंदू, गुड्डी और अलका दीदी को लम्बे लम्बे पत्र लिखता हूं। मन पर इतना बोझ है कि जीने ही नहीं दे रहा है। गौरी अपनी

दुनिया में मस्त है और मै अपने संसार में। द बिजी कार्नर ठीक ठाक चल रहा है और अब उसमें ऐसा कुछ भी नहीं बचा जिसे

चैलेंज की तरह लिया जा सके। सब कुछ रूटीन हो चला है। अब तो दिल करता है, यहां से भी भाग जाऊं। कहीं भी दूर चला जाऊं।

जहां कुछ करने के लिए नया हो, कुछ चुनौतीपूर्ण हो और जिसे करने में मज़ा आये। अलबत्ता कम्प्यूटर से ही नाता बना हुआ है और

मैं कुछ न कुछ नया करता रहता हूं। शिशिर के लिए तो पैकेज बना कर दिये ही हैं, सुशांत की बुक शॉप्स के लिए भी प्रोग्रामिंग करके कुछ नये पैकेज बना दिये हैं

जिससे उसका काम आसान हो गया है। अब वह भी शिशिर की तरह मेरे काफी नज़दीक आ गया है और हम सुख दुख की बातें

करने लगे हैं। 


चौंतीस[edit]

नंदू का फोन आया है। उसने जो खबर सुनाई है उससे मैं एकदम अवाक् रह गया हूं। नंदू ने यह क्या बता दिया है मुझे! गुड्डी की

मौत की खबर सुनने से पहले मैं मर क्यों नहीं गया! मैंने उससे दो तीन बार पूछा - क्या वह गुड्डी की ही बात कर रहा है ना ? तो

नंदू ने जवाब दिया है - हां, दीप, मैं अभागा नंदू तुझे गुड्डी की ही मौत की खबर दे रहा हूं। उन लुटेरों ने हमारी प्यारी बहन को

हमसे छीन लिया है। उसे दहेज का दानव खा गया और हम कुछ भी नहीं कर सके। यह समाचार देते समय नंदू ज़ार ज़ार रो रहा

था। मैं हक्का बक्का बैठा रह गया हूं। यह क्या हो गया मेरी बेबे !! मेरे दारजी !! आपने तो उसके लिए रजेया कजेया घर देखा था और

ये क्या हो गया। इतना दहेज देने के बाद भी स्टोव उसी के लिए क्यों फटा ओ मेरे रब्बा !! लिखा भी तो था गुड्डी ने कि अगर

पैसों का इंतजाम न हो पाया तो स्टोव तो उसी के लिए फटेगा। दारजी ने तो ठोक बजा कर दामाद खोजा था, वह कसाई कैसे

निकल गया। गुड्डी के बारे में सोच सोच कर दिमाग की नसें फटने लगी हैं। नंदू बताते समय हिचकियां ले ले कर रो रहा था - मुझे माफ कर

देना दीप, मैं तेरी बहन को उन राक्षसों के हाथ से नहीं बचा पाया मेरे दोस्त, बेशक गुड्डी की ससुराल वालों को पुलिस ने पकड़

लिया है लेकिन उनकी गिरफ्तारी से गुड्डी तो वापिस नहीं आ जायेगी। तू धीरज धर। नंदू मेरे यार, मैं तुझे तो माफ कर दूं, लेकिन मुझे कौन माफ करेगा। तू मेरी जगह मेरे घर की सारी जिम्मेवारियां निभाता रहा और

मैं सिर्फ अपने स्वार्थ की खातिर यहां परदेस मैं बैठा अपने घर के ही सपने देखता रहा। न मैं अपना घर बना पाया, न गुड्डी का घर

बसता देख पाया। अब तो वही नहीं रही, मैं माफी भी किससे मांगूं। वह कितना कहती थी कि मैं आगे पढ़ना चाहती हूं, कुछ बन के

दिखाना चाहती हूं, और मिला क्या उस बेचारी को!! आखिर दारजी की जिद ने उस मासूम की जान ले ही ली। मेरा जाना तो नहीं

हो पायेगा। जा कर होगा भी क्या। मैं किस की सुनूंगा और किसको जवाब दूंगा। दोनों ही काम मुझसे नहीं हो पायेंगे। दारजी, बेबे, नंदू और अलका दीदी को भी लम्बे पत्र लिखता हूं ताकि सीने पर जमी यह शिला कुछ तो खिसके। गौरी भी इस खबर

से भौंचकी रह गयी है। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा है कि मात्र एक दो लाख रुपये के दहेज के लिए किसी जीते जाने इंसान को यूं

जलाया भी जा सकता है। बताता हूं उसे - गुड्डी बेचारी दहेज की आग में जलने वाली अकेली लड़की नहीं है। वहां तो घर-घर में यह आग सुलगती रहती है

और हर दिन वहां दहेज कम लाने वाली या न लाने वाली मासूम लड़कियों को यूं ही जलाया जाता है। पूछ रही है वह - इंडिया में हवस और लालच इतने ज्यादा बढ़ गये हैं और आपका कानून कुछ नहीं करता? - अब कैसा कानून और किसका कानून, मैं उसे भरे मन से बताता हूं - जहां देश का राजकाज चलाने वाले आइएएस अधिकारी का

दहेज के मार्केट में सबसे ज्यादा रेट चलता हो, वहां का कानून कितना लचर होगा, तुम कल्पना कर सकती हो। बेशक गौरी ने गुड्डी

की सिर्फ तस्वीर ही देखी है फिर भी वह डिस्टर्ब हो गयी है। दुख की इस घड़ी में वह मेरा पूरा साथ दे रही है। शिशिर भी इस हादसे से सन्न रह गया है। वह बराबर मेरे साथ ही बना हुआ है। उसी ने सबसे पहले हमारी ससुराल में खबर दी थी।

मेरे ससुर और दूसरे कई लोग तुरंत अफसोस करने आये थे। हांडा साहब ने पूछा भी था - अगर जाना चाहो इंडिया, तो इंतज़ाम कर

देते हैं, लेकिन मैंने ही मना कर दिया था। अब जा कर भी क्या करूंगा। गौरी और शिशिर के लगातार मेरे साथ बने रहने और मेरा हौसला बढ़ाये रखने के बावजूद मैं खुद को एकदम अकेला महसूस कर

रहा हूं। अब तो स्टोर्स में जाने की भी इच्छा नहीं होती। थोड़ी देर के लिए चला जाता हूं। सारा दिन गुड्डी के लिए मेरा दिल रोता

रहता है। कभी किसी के लिए इतना अफसोस नहीं मनाया। अपने दुख किसी के सामने आने नहीं दिये लेकिन गुड्डी का यूं चले

जाना मुझे बुरी तरह तोड़ गया है, बार बार उसका आंखें बड़ी बड़ी करके मेरी बात सुनना, वीरजी ये और वीरजी वो कहना, बार बार

याद आते हैं। कितने कम समय के लिए मिली थी और कितना कुछ दे गयी थी मुझे और कितनी जल्दी मुझे छोड़ कर चली भी

गयी। जब से गुड्डी का यह दुखद समाचार मिला है, मैं महसूस कर रहा हूं कि मेरा सिर फिर से दर्द करने लगा है। ये दर्द भी वैसा ही है

जैसा बचपन में हुआ करता था। मैं इसे वहम मान कर भूल जाना चाहता हूं लेकिन सिर दर्द है कि दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा

है। पता नहीं, उस दर्द के अंश बाकी कैसे रह गये हैं। हालांकि इलाज तो तब भी नहीं हुआ था लेकिन दर्द तो ठीक हो ही गया था।

गौरी को मैं बता भी नहीं सकता, मेरा क्या छिन गया है। 

पैंतीस[edit]

अस्पताल में दस दिन काटने के बाद आज ही घर वापिस आया हूं। इनमें से तीन दिन तो आइसीयू में ही रहा। बाद में पचास तरह

के टेस्ट चलते रहे और बीसियों तरह की रिपोर्टें तैयार की गयीं, निष्कर्ष निकाले गये लेकिन नतीजा ज़ीरो रहा। डॉक्टर मेरे सिर दर्द

का कारण तलाशने में असमर्थ रहे और मैं जिस दर्द के साथ आधी रात को अस्पताल ले जाया गया था उसी दर्द के साथ दस दिन

बाद लौट आया हूं। गौरी बता रही थी, एक रात मैं सिर दर्द से बुरी तरह से छटपटाने लगा था। वह मेरी हालत देख कर एकदम

घबरा गयी थी। उसने तुरंत डॉक्टर को फोन किया था। उसने मुझे कभी एक दिन के लिए भी बीमार पड़ते नहीं देखा था और उसे

मेरी इस या किसी भी बीमारी के बारे में कुछ भी पता नहीं था इसलिए वह डॉक्टर को इस बारे में कुछ भी नहीं बता पायी थी।

डॉक्टर ने बेशक दर्द दूर करने का इंजेक्शन दे दिया था लेकिन जब वह कुछ भी डायग्नोस नहीं कर पाया तो उसने अस्पताल ले

जाने की सलाह दी थी। गौरी ने तब अपने घर पापा वगैरह को फोन किया और मेरी हालत के बारे में बताया था। सभी लपके हुए

आये थे और इस तरह मैं अस्पताल में पहुंचा दिया गया था। अब बिस्तर पर लेटे हुए और इस समय भी दर्द से कराहते हुए मुझे हॅसी आ रही है - क्या पता चला होगा डॉक्टरों को मेरे दर्द के

बारे में। कोई शारीरिक वज़ह हो भी तो वे पता लगा सकते। रिपोर्टें इस बारे में बिलकुल मौन हैं। इस बीच कई बार पूछ चुकी है गौरी - अचानक ये तुम्हें क्या हो गया था दीप? क्या पहले भी कभी.. .. ..? - नहीं गौरी, ऐसा तो कभी नहीं हुआ था। तुमने तो देखा ही है कि मुझे कभी जुकाम भी नहीं होता। मैं उसे आश्वस्त

करता हूं। बचपन के बारे में मैं थोड़ा-सा झूठ बोल गया हूं। वैसे भी वह मेरे केसों के मामले और दर्द के संबंध और अब गुड्डी की

मौत के लिंक तो क्या ही जोड़ पायेगी। कुछ बताऊं भी तो पूरी बात बतानी पड़ेगी और वह दस तरह के सवाल पूछेगी। यही सवाल

उसके घर के सभी लोग अलग-अलग तरीके ये पूछ चुके हैं। मेरा जवाब सबके लिए वही रहा है। शिशिर भी पूछ रहा था। मैं क्या जवाब देता। मुझे पता होता तो क्या ससुराल के इतने अहसान लेता कि इतना महंगा इलाज

कराता!! वैसे दवाएं अभी भी खा रहा हूं और डॉक्टर के बताये अनुसार कम्पलीट रेस्ट भी कर ही रहा हूं, लेकिन सारा दिन बिस्तर

पर लेटे-लेटे रह-रह के गुड्डी की यादें परेशान करने लगती हैं। आखिर उस मासूम का कुसूर क्या था। जो दहेज हमने गुड्डी को

देना था या दिया था वो हमारी जिम्मेवारी थी। हम पूरी कर ही रहे थे। ज़िंदगी भर करते ही रहते। सारा दिन बिस्तर पर लेटा रहता हूं और ऐसे ही उलटे-सीधे ख्याल आते रहते हैं। अपनी याद में यह पहली बार हो रहा है कि मैं

बीमार होने की वज़ह से इतने दिनों से बिस्तर पर लेटा हूं और कोई काम नहीं कर रहा हूं। बीच-बीच में सबके फोन भी आते रहते

हैं। गौरी दिन में कई बार फोन कर लेती है। लेटे लेटे संगीत सुनता रहता हूं। इधर शास्‍त्रीय संगीत की तरफ रुझान शुरू हुआ है। गौरी ने एक नया डिस्कमैन दिया है और शिशिर

इंडियन क्लासिकल संगीत की कई सीडी दे गया है। शिल्पा भी कुछ किताबें छोड़ गयी थी। और भी सब कुछ न कुछ दे गये हैं ताकि

मैं लेटे लेटे बोर न होऊं।  लगभग छः महीने हो गये हैं सिरदर्द को झेलते हुए। इस बीच ज्यादातर अरसा आराम ही करता रहा या तरह तरह के टैस्ट ही कराता

रहा। नतीजा तो क्या ही निकलना था। वैसे सिरदर्द के साथ मैं अब स्टोर्स में पूरा पूरा दिन भी बिताने लगा हूं लेकिन मैं ही जानता

हूं कि मैं कितनी तकलीफ से गुज़र रहा हूं। बचपन में भी तो ऐसे ही दर्द होता था और मैं किसी से भी कुछ नहीं कह पाता था।

सारा सारा दिन दर्द से छटपटाता रहता था जैसे कोई सिर में तेज छुरियां चला रहा हो। तब तो केस कटवा कर दर्द से मुक्ति पा ली

थी लेकिन अब तो केस भी नहीं हैं। समझ में नहीं आता, अब इससे कैसे मुक्ति मिलेगी। यहां के अंग्रेज़ डॉक्टरों को मैंने जानबूझ कर

बचपन के सिर दर्द और उसके दूर होने के उपाय के बारे में नहीं बताया है। मैं जानता हूं ये अंग्रेज तो मेरे इस अनोखे दर्द और

उसके और भी अनोखे इलाज के बारे में सुन कर तो मेरा मज़ाक उड़ायेंगे ही, गौरी और उसके घर वालों की निगाह में भी मैं

दकियानूसी और अंधविश्वासी ही कहलाऊंगा। मैं ऐसे ही भला। बेचारी बेबे भी नहीं है जो मेरे सिर में गर्म तेल चुपड़ दे और अपनी

हथेलियों से मेरे सिर में थपकियां दे कर सुला ही दे।  अभी सो ही रहा हूं कि फोन की घंटी से नींद उचटी है। घड़ी देखता हूं, अभी सुबह के छः ही बजे हैं। गौरी बाथरूम में है। मुझे ही

उठाना पड़ेगा। - हैलो, - नमस्ते दीप जी, सो रहे थे क्या? एकदम परिचित सी आवाज, फिर भी लोकेट नहीं कर पा रहा हूं, कौन हैं जो इतनी बेतकल्लुफी से बात कर रही हैं। - नमस्ते, मैं ठीक हूं लेकिन माफ कीजिये मैं पहचान नहीं पा रहा हूं आपकी आवाज.... - कोशिश कीजिये! - पहले हमारी फोन पर बात हुई है क्या? - हुई तो नहीं है। - मुलाकात हुई है क्या? - दो तीन बार तो हुई ही है। - आप ही बता दीजिये, मैं पहचान नहीं पर रहा हूं। - मैं मालविका हूं। मालविका ओबेराय। - ओ हो मालविका जी। नमस्ते. आयम सौरी, मैं सचमुच ही पहचान नहीं पा रहा था, गौरी अकसर आपका ज़िक्र करती रहती है। कई

बार सोचा भी कि आपकी तरफ आयें। इतने अरसे बाद भी उसका दिपदिपाता सौन्दर्य मेरी आंखों के आगे झिलमिलाने लगा है। - लेकिन मैं शर्त लगा कर कह सकती हूं कि आपको हमारी कभी याद नहीं आयी होगी। शक्ल तो मेरी क्या ही याद होगी। - नहीं, ऐसी बात तो नहीं है। दरअसल मुझे आपकी शक्ल बहुत अच्छी तरह से याद है, बस उस तरफ आना ही नहीं हो पाया।

फिलहाल कहिये कैसे याद किया.. कैसे कहूं कि जो उन्हें एक बार देख ले, ज़िदंगी भर नहीं भूल सकता। - आपका सिरदर्द कैसा है अब? - अरे, आपको तो सारी खबरें मिलती रहती हैं। - कम से कम आपकी खबर तो है मुझे, मैं आ नहीं पायी लेकिन मुझे पता चला, आप खासे परेशान हैं आजकल इस दर्द की वज़ह

से।

  - हां हूं तो सही, समझ में नहीं आ रहा, क्या हो गया है मुझे। 
  - गौरी से इतना भी न हुआ कि तुम्हें मेरे पास ही ले आती। अगर आपको योगाभ्यास में विश्वास हो तो आप हमारे यहां क्यों नहीं 

आते एक बार। वैसे तो आपको आराम आ जाना चाहिये, अगर न भी आये तो भी कुछ ऐसी यौगिक क्रियाएं आपको बता दूंगी कि

बेहतर महसूस करेंगे। योगाभ्यास के अलावा एक्यूप्रेशर है, नेचूरोपैथी है और दूसरी भारतीय पद्धतियां हैं। जिसे भी आजमाना चाहें। - ज़रूर आऊंगा मैं। वैसे भी पचास तरह के टेस्ट कराके और ये दवाएं खा खा कर दुखी हो गया हूं। - अच्छा एक काम कीजिये, मैं गौरी से खुद ही बात कर लेती हूं, आपको इस संडे लेती आयेगी। गौरी से बात करायेंगे क्या? - गौरी अभी बाथरूम में है और अभी थोड़ी देर पहले ही गयी है। उसे कम से कम आधा घंटा और लगेगा। - खैर उसे बता दीजिये कि मैंने फोन किया था। चलो इस बहाने आप से भी बात हो गयी। आपका इंतज़ार रहेगा। - जरूर आयेंगे। गौरी के साथ ही आऊंगा। - ओके, थैंक्स।  मालविका से मुलाकात अब याद आ रही है। गौरी के साथ ही गया था उनके सेन्टर में। नार्थ वेम्बले की तरफ़ था कहीं। गौरी के

साथ एक-आध बार ही वहां जा पाया था। जब हम वहां पहली बार गये थे तब मालविका एक लूज़ सा ट्रैक सूट पहने अपने स्टूडेंट्स को लैसन दे रही थी। उन्हें देखते ही मेरी आंखें चुंधियां गयी थीं। मैं ज़िंदगी में पहली बार इतना सारा सौंदर्य एक साथ देख रहा था। भरी भरी आंखें,

लम्बी लहराती केशराशि। मैं संकोचवश उनकी तरफ देख भी नहीं पा रहा था। वे बेहद खूबसूरत थीं और उन्हें कहीं भी, कभी भी

इग्नोर नहीं किया जा सकता था। मैं हैरान भी हुआ था कि शादी के रिसेप्शन में मैं उनकी तरफ ध्यान कैसे नहीं दे पाया था। गौरी ने उबारा था मुझे - कहां खो गये दीप, मालविका कब से आपको हैलो कर रही है। मैं झेंप गया था।


देस बिराना

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