गोकरुणानिधि
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| गोकरुणानिधि भूमिका by स्वामी दयानंद सरस्वती |
समीक्षा-प्रकरणम् १ |
[edit] भूमिका
इन्द्रो॒ विश्व॑स्य राजति। शन्नो अस्तु द्वि॒पदे॒ शं च॑तुष्पदे॥
तनोतु सर्वेश्वर उत्तम्बलं गवादिरक्षं विविधं दयेरितः।
अशेषवघ्नानि निहत्य नः प्रभूः सहायकारी विदधातु गोहितम् ॥ १॥
ये गोसुखं सम्यगुशन्ति धीरास्ते धर्म्मजं सौख्यमथाददन्ते।
क्रूरा नराः पापरता न यन्ति प्रज्ञाविहीनाः पशुहिंसकास्तत् ॥ २ ॥
वे धर्मात्मा लोग धन्य हैं, जो ईश्वर के गुण, कर्म्म, स्वभाव, अभिप्राय, सृष्टि क्रम, प्रत्यक्षादि प्रमाण और आप्तों के आचार से अविरुद्ध चलके सब संसार को सुख पहुंचाते हैं। और शोक है उन पर जो कि इनसे विरुद्ध चलके स्वार्थी दयाहीन होकर जगत् में हानि करने के लिए वर्त्तमान हैं। पूजनीय जन वे हैं कि जो अपनी हानि होती तो भी सब के हित के करने में अपना तन, मन, धन लगाते हैं। और तिरस्करणीय वे हैं जो अपने ही लाभ में संतुष्ट रहकर सबके सुखों का नाश करते हैं।
ऐसा सृष्टि में कौन सा मनुष्य होगा जो सुख और दुःख को स्वयं न मानता हो? क्या ऐसा कोई भी मनुष्य है कि जिसके गले को काटे वा रक्षा करे, वह दुःख और सुख किसी प्राणी का प्राणवियोग करके अपना पोषण करना यह सत्पुरुषों के सामने निन्दित कर्म क्यों न होवे? सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर इस सृष्टि में मनुष्यों के आत्माओं में अपनी दया और न्याय को प्रकाशित करे कि जससे ये सब दया और न्याययुक्त होकर सर्वदा सर्वोपकारक काम करें और स्वार्थपन से पक्षपातयुक्त होकर कृपापात्र गाय आदि पशुओं का विनाश न करें कि जिससे दुग्ध आदि पदार्थों और खेती आदि क्रियाओं की सिद्धि से युक्त होकर सब मनुष्य आनंद में रहें।
इस ग्रंथ में जो कुछ अधिक, न्यून वा अयुक्त लेख हुआ हो उसको बुद्धिमान् लोग इस ग्रन्थ के तात्पर्य के अनुकूल कर लेवें। धार्मिक विद्वानों की यही योग्यता है कि वक्ता के वचन और ग्रन्थकर्ता के अभिप्राय के अनुसार ही समझ लेते हैं। यह ग्रन्थ इसी अभिप्राय से रचा गया है कि जिससे गो आदि पशु जहां तक सामर्थ्य हो बचाये जावें और उनके बचाने से दूध घी और खेती के बढ़ने से सब को सुख बढ़ता रहे। परमात्मा कृपा करे कि यह अभीष्ट शीघ्र सिद्ध हो।
इस ग्रन्थ में तीन प्रकरण हैं - एक समीक्षा, दूसरा नियम और तीसरा उपनियम। इन को ध्यान दें पक्षपात छोड़ विचार के राजा तथा प्रजा यथावत् उपयोग में लावें, जिससे दोनों के लिये सुख बढ़ता ही रहे।
॥ इति भूमिका ॥