कवितावली 6
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१५१ संकर-सहर सर, नरनारि बारिचर बिकल, सकल, महामारी माजा भई है।
उछरत उतरात हहरात मरि जात, भभरि भगात जल-थल मीचुमई है॥
देव न दयाल, महिपाल न कृपालचित, बारानसीं बाढति अनीति नित नई है।
पाहि रघुराज! पाहि कपिराज रामदूत! रामहूकी बिगरी तुहीं सुधारि लई है॥
एक तै कराल कलिकाल सूल-मूल, तामें कोढ़मेंकी खाजु-सी सनीचरी है मीनकी।
बेद -धर्म दूरि गए, भूमि चोर भूप भए, साधु सीद्यमान जानि रीति पाप पीनकी॥
दूबरेको दूसरो न द्वार, राम दयाधाम! रावरीऐ गति बल-बिभव बिहीन की।
लागैगी पै लाज वा बिराजमान बिरुदहि, महाराज! आजु जौं न देत दादि दीनकी॥
विविध
१५२ रामनाम मातु-पितु, स्वामि समरथ, हितु, आस रामनामकी, भरोसो रामनामको।
प्रेम रामनामहीसों, नेम रामनामहीको, जानौं नाम मरम पद दाहिनो न बामको॥
स्वारथ सकल परमारथको रामनाम, रामनाम हीन तुलसी न काहू कामको।
रामकी सपथ, सरबस मेरें रामनाम, कामधेनु-कामतरु मोसे छीन छामको॥
मारग मारि, महीसुर मारि, कुमारग कोटिककै धन लीयो।
संकरकोपसों पापको दाम परिच्छित जाहिगो जारि कै हीयो॥
कासीमें कंटक जेते भये ते गे पाइ अघाइ कै आपनो कीयो।
आजु कि कालि परों कि नरों जड जाहिंगे चाटि दिवारीको दीयो॥
१५३ कुंकुम -रंग सुअंग जितो, मुखचंदसो चंदसों होड़ परी है।
बोलत बोल समृध्दि चुवै, अवलोकत सोच-बिषाद हरी है॥
गौरी कि गंग बिहंगिनिबेष, कि मंजुल मूरति मोदभरी है।
पेखि सप्रेम पयान समै सब सोच-बिमोचन छेमकरी है॥
१५४ मंगलकी रासि, परमारथकी खानि जानि बिरचि बनाई बिधि, केसव बसाई है।
प्रलयहूँ काल राखी सूलपानि सूलपर, मीचुबस नीच सोऊ चाहत खसाई है॥
छाडि छितिपाल जो परीछित भए कृपाल, भलो कियो खलको, निकाई सो नसाई है।
पाहि हनुमान! करुनानिधान राम पाहि! कासी-कामधेनु कलि कुहत कसाई है॥
बिरची बिरंचकी, बसति बीस्वनातकी जो, प्रानहू तें प्यारी पुरी केसव कृपालकी।
जोतिरूप लिंगमई अगनित लिंगमयी मोच्छ बितरनि, बिदरनि जगजालकी॥
देबी-देव-देवसरि-सिध्द-मुनिबर-बास लोपति-बिलोकत कुलिपि भोंडे भालकी।
हा हा करे तुलसी, दयानिधान राम! ऐसी कासीकी कदर्थना कराल कलिकालकी॥
१५५ आश्रम-बरन कलि बिबस बिकल भए निज-निज मरजाद मोटरी-सी डार दी।
संकर सरोष महामारिहीतें जानियत, साहिब सरोष दुनी-दिन-दिन दारदी॥
नारि-नर आरत पुकारत, सुनै न कोऊ, काहूँ देवतनि मिलि मोटी मूठि मारि दी।
तुलसी सभीतपाल सुमिरें कृपालराम समय सुकरुना सराहि सनकार दी॥
(इति उत्तरकाण्ड)
[edit] संबंधित कड़ियाँ
- कवितावली
- कवितावली 1 (१-३०)
- कवितावली 2 (३१-६०)
- कवितावली 3 (६१-९०)
- कवितावली 4 (९१-१२०)
- कवितावली 5 (१२१-१५०)
- कवितावली 6 (१५१-१५५)
- कवितावली (हिन्दी विकीपीडिया पर)
- दोहावली
- विनयपत्रिका
- श्री राम चरित मानस (हिन्दी विकीपीडिया पर)
- तुलसीदास (हिन्दी विकीपीडिया पर)