आखिर जीत हमारी/भाग 6 - विपत्ति में
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एक प्रातः जब सूर्य आसमान में ऊँचा चढ़ आया था, महाबाहु घोड़ा दौड़ाता हुआ एक गांव में पाठशाला के पास से गुजरा जहाँ धूप में बैठे कुछ विद्यार्थी पढ़ रहे थे । एक गोरा और मोटा सा ब्राह्मण अपने आसन पर बैठा किसी की जन्म-पत्री बना रहा था । जाते जाते मजाक में महाबाहु ने पूछा, "क्यों महाराज, मेरा भाग्य कैसा रहेगा ?"
सहसा चौंककर ब्राह्मण ने न जाने मजाक में अथवा गणित से देखकर ऊँचे स्वर में कहा, "इस प्रकार घोड़ा दौड़ाते हुए प्रश्न करने वाले के मार्ग में भारी संकट की सम्भावना है जिससे भगवान् ही बचाये तो बचाये ....।"
ब्राह्मण की आवाज पीछे ही रह गई और महाबाहु बड़बड़ाता हुआ आगे निकल गया ।
शायद ब्राह्मण के मुख में से भाग्य-विधाता ने अपने आप ही भाग्य की बात कह दी थी । वह संकट जिसके विषय में उसने कहा था, मार्ग में महाबाहु की ही प्रतीक्षा कर रहा था ।
शीतऋतु की सुहावनी धूप में निश्चिन्त महाबाहु अपने घोड़े को सरपट दौड़ाये लिए जा रहा था । उसके हृदय की धड़कनें और घोड़े की टापों की आवाज मिलकर एक अद्भुत सिहरन भर रही थीं । दूर-दूर तक वृक्षों की पत्तियों और खिलते फूलों की सुरभि से सारा वन प्रान्तर उल्लसित हो रहा था ।
सुनसान जंगल के वृक्षों के मध्य में से गुजरती एक निर्जन सी पगडंडी पर तीन घुड़सवार दिखाई दिए । पहले उन्होंने अपने घोड़े रोककर दूर जाते महाबाहु को पहचानने का प्रयत्न किया, फिर एक जयकारा लगाते हुए अपने घोड़ों को उसके पीछे लगा दिया ।
महाबाहु अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए निश्चिन्त सा चला जा रहा था । वह अपने गन्तव्य स्थान पर शीघ्र ही पहुंच जाना चाहता था इसलिए मार्ग की किसी बाधा में उलझकर समय गंवाना नहीं चाहता था । उसने उनकी ओर साधारण दृष्टि डालकर तथा यह सोचकर कि ये लुटेरे हैं, घोड़े को और भी तेज कर दिया । उसे इस बात की स्वप्न में भी आशा नहीं थी कि ये घुड़सवार केवल लुटेरे नहीं हैं अपितु उसी का पीछा कर रहे हैं । उसने अपने घोड़े को और भी तेज कर दिया । अब भी वह यही समझ रहा था कि ये एक यात्री का पीछा कर उसका घोड़ा छीनने के अभिप्राय से ही पीछे-पीछे चले आ रहे हैं । साथ ही उसका यह भी विचार था कि मेरा घोड़ा उनके कहीं उत्तम नस्ल का है । थोड़ी देर बाद इन्हें पीछे छोड़ जायेगा और ये अपने आप वापस चले जायेंगे । इसलिए उसने घोड़े को जोर की एक और एड़ लगाई ।
परन्तु ऐसा लगा जैसे इनके घोड़े भी कम दौड़ने वाले नहीं थे । वे आंधी के वेग से दौड़ते चले आ रहे थे । वह अपने से आगे भागते हुए सवार को पकड़ने का निश्चय करके पीछा कर रहे थे । हूण सवार चाहते थे कि वे लम्बी लम्बी छलांगें लगाकर महाबाहु के घोड़े पर जा गिरें । दोनों के बीच का अन्तर कम होता चला जा रहा था । इस दौड़-धूप में कई बार वे एक दूसरे के समीप आए और दूसरे ही क्षण फिर दूर हो गए । हर बार महाबाहु का घोड़ा बिजली की सी गति से उन्हें पछाड़ देता था । किसी भी प्रकार उसे हाथ आता न देख एक हूण ने, जो सबसे आगे था और उनका सरदार प्रतीत होता था, कमर से कटार निकाली, परन्तु पीछे आने वालों के पास धनुष बाण भी थे । महाबाहु को हाथ आते न देखकर उन दोनों हूणों ने अपने कंधों से धुनुष बाण उतारकर उस पर अंधाधुंध बाणों की वर्षा करनी आरम्भ कर दी ।
"दुष्टो" घोड़े को भगाते हुए महाबाहु बड़बड़ाया । तभी दो बाण सनसनाते हुए उसके कानों के पास से गुजर गए । "काश मेरे पास भी धनुष होता ।" जिसे शीघ्रता से वह झोंपड़ी में ही भूल आया था । फिर भी तनिक चिन्ता किये बिना वह भागा चला जा रहा था और हर बार बाणों की मार से बाल-बाल बच जाता था । तभी एक हूण घुड़सवार ने अपना लक्ष्य साधने के लिए घोड़े को रोका । किन्तु इतने में ही दोनों का अन्तर इतना अधिक हो गया कि बाण की मार इस तक पहुंचनी असम्भव हो गई ।
महाबाहु ने गर्दन पीछे मोड़कर देखा । उसने एकदम पहचान लिया कि आगे यह स्वस्थ तथा बलिष्ठ शरीर वाला व्यक्ति हूणों का गुप्तचर चौकी का छोटा कोतवाल था और पीछे दो सिपाही थे । वह समझ गया यह लुटेरे नहीं हैं । यह तो मुझे पकड़ने के लिए ही पीछे आ रहे हैं और बहुत सम्भव है कि मार्ग में इनकी सहायता के लिए और भी घुड़सवार हों । एक सवार जो पीछे से बार-बार उस पर बाणों की वर्षा कर रहा था, उसके बाण अवश्य ही पीछे रह जाते थे परन्तु दूसरा व्यक्ति अपने साथी के साथ भागता हुआ बाणों की वर्षा करता आ रहा था । इस समय कोई अदृश्य शक्ति ही महाबाहु की रक्षा करती चली आ रही थी । आखिर एक बाण महाबाहु की भुजा में आकर लगा । एक सनसनाहट शरीर में फैल गई । क्रोध में आकर उसने अपनी भुजा में गड़ा बाण खींचकर निकाला और एक ओर फेंक दिया । महाबाहु ने दाएं हाथ में लगाम पकड़ी और बाएं हाथ में कटि में बंधी अपनी कटार निकाली और ठीक लक्ष्य करके उस बढ़े आते धनुर्धारी घुड़सवार पर पूरी शक्ति से फेंक मारी ।
महाबाहु का लक्ष्य अचूक था । वह अब भी अपने लक्ष्य स्थान पर ठीक लगा और कटार धनुर्धारी हूण की छाती में पूरी तरह घुस गई । हूण एक चीख मार कर घोड़े से नीचे गिर गया । हूण सरदार ने अपने सैनिक के गिरने की तनिक भी चिन्ता न की और महाबाहु के पीछे अपना घोड़ा दौड़ाता चला गया । तीसरा सैनिक अपने सरदार के साथ मिलना चाहता था परन्तु उसे अपने गिरे साथी को देखने और उसकी छाती में गड़ी कटार को निकालने के लिए उतरना पड़ा । तब तक दोनों सवार घने जंगल में अदृश्य हो गए थे ।
महाबाहु एक दो मोड़ घूमकर झाड़ियों से घिरे ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर हो लिया जहाँ वृक्षों के पीछे एक नदी बह रही थी ।
"ओ मर्दये !" हूण सरदार बिगड़ी हुई टूटी-फूटी हिन्दुस्तानी में चिल्लाया, "यह लोमड़ियों की चालाकी मेरे सामने नहीं चल सकेगी । तुम लोग उस रात पता नहीं किस प्रकार निकल गए परन्तु आज मैं तुम्हें जीता नहीं छोड़ूंगा और तेरी गर्दन पर अपनी तलवार की नोंक गड़ाकर पूछूंगा, बता तूने बड़े कोतवाल और हूण जासूस का क्या किया ?"
जंगल से डरे हुए दो गीदड़ निकलकर भागे, झाड़ी में से तीतरों का एक जोड़ा फुर्र करके उड़ गया । वन अत्यधिक घना होता गया था, सरकण्डे के झुण्ड उनका मार्ग रोकने लगे परन्तु दोनों घोड़ों की दौड़ में किसी प्रकार की कमी न आई । वह फैली हुई टहनियों को चीरते हुए वन में घुसते चले गए ।
इस अंधाधुंध दौड़ में बाईं ओर के वन में एक शोर सा सुनाई दिया । कहीं से बीस-तीस व्यक्तियों का कण्ठ स्वर जयजयकारा लगा रहा था । बहुत दूर से शब्द आने के कारण महाबाहु यह अनुमान तो नहीं लगा सका कि कौन लोग हैं परन्तु किसी अज्ञात संकट की कल्पना से वह भी एक बार काँप उठा । सम्भव था कि यह शोर शिकार की टोह में आए शिकारियों का हो या किसानों का हो अथवा हूण लुटेरों का हो जो अचानक कहीं वन में से निकल आयें और अपने सरदार की सहायता को आन पहुँचें तथा प्रथम बार की तरह एक नया संकट उत्पन्न कर दें । क्योंकि उस दिन इसी प्रकार अचानक वन में से निकल कर हूण सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया था । वह इस बात पर पछता रहा था कि उस समय जबकि घायल होकर हूण सैनिक गिर पड़ा था तथा दूसरा उसकी देख-रेख के लिए पीछे रह गया था, वह पलट कर क्यों नहीं हूण सरदार पर टूट पड़ा । उसने अपने घोड़े का मुंह नदी की तरफ कर दिया जो थोड़ी दूर पर बह रही थी ।
महाबाहु का घोड़ा पसीने से भीगा हुआ था और उसके मुंह से सफेद झाग निकल रही थी । उसकी सांस बुरी तरह फूल रही थी, लम्बी दौड़ तथा एक पल का भी विश्राम न मिलने से वह काफी थक चुका था परन्तु फिर भी कमजोरी और थकान की परवाह किये बिना भागता चला जा रहा था । पीछे से शत्रु के घोड़े की टापें उसी वेग से निकटतर होती चली आ रही थीं । कहीं शत्रु उससे आगे न निकल जाये, इस आशंका से वह अपने घोड़े को और अधिक तेज करता जा रहा था ।
नदी तट पर उगी एक हरी झाड़ी पर महाबाहु की दृष्टि पड़ी, जिस पर मच्छर मंडरा रहे थे और दूसरी तरफ नदी का पाट दिखाई दे रहा था । उसने प्रयत्न किया कि वृक्षों की दीवार को पार कर देखे कि नदी कितनी चौड़ी है ताकि वह घोड़े पर बैठा ही बैठा नदी को फांद जाए । तभी एक मच्छर उसकी आंख में आकर गिर पड़ा और उसकी आंखें बन्द हो गयीं ।
"कैसा दुर्भाग्य है ।" दर्द से कराह कर उसने अपनी आंख को मला परन्तु तभी आवेश में भागते आते हुए घोड़े ने सरकण्डों के झुंड को चीरते हुए नदी में छलांग लगा दी । महाबाहु के चेहरे पर वृक्षों की पत्तियां टकराईं और उनमें से एक पत्ती की नोंक उसकी आंख में जा लगी । दोनों आंखों में इस अप्रत्याशित चोट से तिलमिलाते हुए उसने अपने एक हाथ में खड़ग और दूसरे में घोड़े की रास जोर से पकड़ ली और काठी पर जमे रहने का प्रयत्न किया । छलांग लगाते समय उसने उत्साह से घोड़े की पीठ पर प्यार की थपकी दी और घोड़े की पीठ के साथ लग गया ।
शायद कुछ दिन पूर्व वहां अत्यधिक वर्षा होने से नदी का जल चढ़ा हुआ था और स्थान-स्थान पर भंवर बन रहे थे । इसका पाट भी इतना चौड़ा हो गया था कि कोई भी घोड़ा कितनी लम्बी छलांग लगाने वाला क्यों न हो, नदी को पार नहीं कर सकता था । एक ऊंची छपाक के साथ दोनों पानी में गिर पड़े । महाबाहु ने पानी की ठंड का अनुभव किया और उसे लगा जैसे नदी की वेगवती लहरें उसे बहाये लिए जा रही हैं । उसने पानी के छीटों से भीगी आँखों को मला और उन्हें खोलने का प्रयत्न करने लगा परन्तु तब तक पीछा करने वाले हूण सरदार का घोड़ा भी पानी में कूद पड़ा था । सवार तथा उसका घोड़ा दोनों ही महाबाहु के पास आ गिरे थे जिससे बहुत सा पानी उछलकर महाबाहु पर आ पड़ा जिससे वह और उसका घोड़ा पूरी तरह डूब गए । महाबाहु ने पानी की उस दीवार को जो लहरों के भंवर में फंसने से उत्पन्न हो गयी थी, ढकेल कर हटाया ।
जरा होश आते ही दोनों शत्रुओं ने अपनी-अपनी तलवारें म्यान में से निकाल लीं और पानी में ही एक दूसरे पर प्रहार करने के लिए अपने घोड़ों का सहारा लेकर उछल पड़े । हूण सरदार ने अपनी तलवार पहले निकाल ली थी परन्तु महाबाहु ने उसे वार करने का अवसर नहीं दिया और उससे पूर्व ही उस पर वार कर दिया परन्तु पानी में अपना सन्तुलन न रखने के कारण उसका निशाना चूक गया जिससे हूण की गर्दन बच गई परन्तु खड़ग वाला हाथ कलाई समेत कटकर पानी में जा गिरा । सारा पानी थोड़ी देर के लिए लाल हो उठा ।
संभलने का अवसर न देते हुए, सर्दी से ठिठुरते हुए हाथ से उसने दूसरा प्रहार किया परन्तु इस बार उसके अपने हाथ से तलवार छिटक कर दूर जा गिरी । नदी का बर्फ के समान ठण्डा पानी हाथ पांव को सुन्न कर रहा था ।
हूण सरदार किसी दानव के समान लम्बा और हाथी के समान बलवान् था । महाबाहु और उसके साथी कोतवाल हूण गुप्तचर को उठा लाए थे । इसी पर क्रोध आने से उसने उसका पीछा किया था और इतनी दौड़-धूप करने पर भी जब वह हाथ न आया अपितु उसके एक साथी को भी उसने मार दिया, इससे उसका क्रोध और भी प्रज्वलित हो गया था । इस पर, महाबाहु ने तलवार से उसकी कलाई उड़ा दी थी जिससे वह बिल्कुल पागल हो उठा था । प्रतिशोध के लिए वह और भी अधिक प्रयत्न कर रहा था कि महाबाहु के पास पहुंचकर उसे अपने भारी-भरकम शरीर के दबाव से पानी में डुबो दे ।
इधर महाबाहु भी इसी घात में था कि किस प्रकार इस शत्रु का काम समाप्त किया जाए । अपने से बलवान् और दुर्धर्ष शत्रुओं के साथ अपने जीवन में अनेक बार जीवन और मरण के खेल खेल चुका था । परन्तु इस समय उसके घोड़े निढ़ाल हो चुके थे । बर्फ जैसे ठण्डे जल ने उनके शरीर को सुन्न कर दिया था । हूण सरदार ने यह सोचकर कि इस ठंड में किसी समय भी घोड़ा भंवर में फंसकर उसका साथ छोड़ जाएगा, अपने घाव की तनिक भी परवाह किये बिना अपने घोड़े को जोर से झटका दिया ताकि वह महाबाहु के पास पहुंच सके । घोड़े ने भी अन्तिम जोर लगाया और महाबाहु के पास तक जा पहुंचा । हूण सरदार घोड़े को छोड़कर महाबाहु पर कूद पड़ा ।
महाबाहु ने पहले तो अपने बलिष्ठ हाथों से हूण सरदार को रोकने का प्रयत्न किया । फिर वह भी अपने घोड़े को छोड़कर उसी से उलझ पड़ा । दोनों अच्छे तैराक तथा लम्बी डुबकी लगाने वाले थे । इस प्रकार नदी में ही लड़ते-लड़ते वह तेज धारा के साथ बहते हुए नदी का मोड़ मुड़ गए । हूण इस प्रयत्न में था कि किसी प्रकार महाबाहु का सिर उसके हाथ में आ जाए और उसे डुबोकर मार दे । आखिर इस संघर्ष में उसका हाथ एक बार उसके सिर पर जा ही पड़ा । लोहे के शिकंजे के समान उसने उसके सिर को दबा दिया और अपने भारी-भरकम शरीर का बोझ उस पर डाल दिया । महाबाहु ने डूबने से पहले एक लम्बा साँस अपनी छाती में भर लिया और अन्दाज से उसने अपने लोहे के समान कठोर हाथों से उसके गले को दबा दिया । उसकी पकड़ इतनी मजबूत होती जा रही थी कि हूण सरदार का शरीर मछली के समान तड़फने लगा । कुछ देर तक दोनों इसी प्रकार युद्ध करते रहे और एक दूसरे की जीवन लीला समाप्त करने का प्रयत्न करते रहे । आखिर हूण का दम टूटता सा नजर आया और महाबाहु के सिर को छोड़कर अपनी गर्दन छुड़ाने का प्रयत्न करने लगा ।
हूण पहले पानी से बाहर आया और तभी महाबाहु पानी से ऊपर निकल अया । उसके ऊपर आते ही हूण सरदार ने अपने बाएं हाथ का भरपूर मुक्का महाबाहु के मुंह पर दे मारा । अपने को संभालते हुए महाबाहु ने गुस्से में भरकर दोनों हाथों से ताबड़तोड़ मुक्के मारने शुरू कर दिये और एक बार उसके कटे हाथ को पकड़कर जोर से मरोड़ा और फिर दोनों गुत्थम-गुत्था हो गए ।
जिस समय यह दोनों एक दूसरे को परास्त करने में लगे हुए थे, उन्हें इस बात का तनिक भी ज्ञान नहीं था कि नदी की बालू पर धूप सेंकता हुआ एक मगरमच्छ अपना शिकार देखकर बिना शब्द किए पानी में सरक आया और उसकी तरफ आने लगा । मगरमच्छ बीस हाथ के करीब बढ़ा चला आ रहा था । दूर होने पर अचानक हूण की दृष्टि उस पर जा पड़ी । उसके मुंह से एक दबी हुई चीख निकल गई । इस विपत्ति के समय भी उसने साहस को तिलांजलि न दी और पानी में ही एक चक्कर काटकर पूरे जोर से महाबाहु को मगरमच्छ की ओर धकेल दिया । परन्तु गुत्थे हुए महाबाहु को वह अपने से अलग न कर सका । महाबाहु ने भी मगरमच्छ को देखा और आने वाले नये संकट का मुकाबला करने के लिए अपनी कमर में हाथ डाला जहां उसकी कटार नहीं थी । वह पहले ही हूण सैनिक को मारने के लिए प्रयोग की जा चुकी थी । उसने अपने शत्रु की कमर को टटोला और उसका खंजर निकालकर अपनी भुजाओं को पानी से बाहर निकाल लिया ।
मगरमच्छ अपनी पूंछ से पानी को हिलाता हुआ उनके सिर पर आ पहुंचा था । दोनों ने अपनी-अपनी रक्षा करने के लिए पानी में डुबकी लगाई और भिन्न दिशाओं में निकल गए । परन्तु घड़ियाल उसी दिशा में बढ़ रहा था जिधर महाबाहु जा रहा था । सिर बाहर निकालते ही महाबाहु ने मगरमच्छ को अपने सिर पर पाया । महाबाहु ने भी एकदम चक्कर काटकर मगरमच्छ पर पूरे जोर से आक्रमण कर दिया । उसने खंजर उठा कर पूरे जोर से उसकी आंख में घुसेड़ दिया और खंजर को उसकी आंख में गड़ा हुआ छोड़कर विपरीत दिशा में तेज हाथ मारता हुआ तट पर जाने का प्रयत्न करने लगा ।
अचानक चोट खाकर मगरमच्छ एकदम उछला और दर्द से चीख मारकर पानी में उलट गया । थोड़ी देर में क्रोध में भर कर सामने जाते हुए हूण सरदार की ओर लपका । जान बचाने के लिए सरदार ने गोता लगाने का प्रयत्न किया परन्तु मगरमच्छ के मुँह में उसका पैर आ गया । तट पर उगी झाड़ियों की ओर हाथ बढ़ाते हुए महाबाहु ने हूण सरदार की चीख सुनी, दुखभरी, हृदय को चीरने वाली । और फिर दोनों ही उस जल से अदृश्य हो गए ।
तट की झाड़ियों तक महाबाहु का हाथ नहीं पहुँच सका । उसने दुबारा प्रयत्न किया, तीसरी बार एक जड़ में हाथ डाला परन्तु बह भी उसके भार को न सम्भाल सकी और टूट गई । थकावट से चूर महाबाहु ने फिर एक बार प्रयत्न करने के लिए हाथ बढ़ाया । उसने लटकी एक टहनी पर हाथ मारा । वस्तुतः वह टहनी न होकर एक साँप था जो महाबाहु के हाथ का स्पर्श पाते ही ऊपर चढ़ने लगा । महाबाहु भी चौंक कर पीछे हट गया ।
तट पर जाती हुई स्त्री ने चीख मारी और चिल्लाई, "मुझे नाग ने खा लिया" और वह एक ओर भाग खड़ी हुई ।
स्त्री की आवाज सुनकर मछेरे जो पास ही धूप में अपने जाल सुखा रहे थे, दौड़े आए । उन्होंने एक आदमी को पानी चीरकर किनारे आते हुए देखा । एक ने अपने सिर की पगड़ी उसकी तरफ फेंकी जिसका किनारा महाबाहु ने पकड़ लिया ।
हल्की-सी फटकार के तौर पर एक वृद्ध मछेरा बड़बड़ाया, "स्नान करने के घाट को छोड़कर इधर नहाने क्यों निकल आए थे ? यदि डूब जाते तो क्या होता ?"
"होनहार तो टाली नहीं जा सकती थी" किनारे पर चढ़ते महाबाहु ने कहा, "अब कृपा करके मेरे लिए सूखे कपड़ों का प्रबन्ध कर दो तथा जल्दी से आग जला दो ताकि मैं अपने शरीर को गर्म कर सकूं । अगर यहाँ गर्म दूध मिल जाय तो बहुत ही कृपा होगी ।" उसने अपने गीले कपड़े की जेब में हाथ डालकर दो तीन सिक्के निकाले और मछेरों को दे दिये ।
"लो, यह तुम्हारा पुरस्कार है, जल्दी करो, मैं ठंड से मरा जा रहा हूँ ।" उसके दाँत बज रहे थे .... दूर किसी बड़े गाँव के घर दिखाई दे रहे थे ।
मछेरे महाबाहु को लेकर अपनी झोंपड़ियों को चल पड़े । तभी एक दृष्टि नदी में बहती किसी चीज पर पड़ी । "संभवतः कोई आदमी डूब रहा है", उसका शब्द पूरा होने से पहले ही सब ने उधर देखा । महाबाहु ने समझा शायद हूण सरदार मगरमच्छ के मुंह से बचकर निकल आया है । परन्तु ध्यान से देखने पर महाबाहु पहचान गया । वहां तो उन दोनों के घोड़े थे जो थकावट से चूर होने पर भी अपने प्राणों की रक्षा के लिए हाथ पांव मार रहे थे ।
अपने घोड़े से दृष्टि मिलते ही महाबाहु उसकी इस अवस्था से द्रवित हो उठा, जिस प्राणी ने अपने स्वामी के लिए इतना किया था । महाबाहु चिल्लाया, "तुम सबको और भी इनाम दूंगा, इन घोड़ों को बचाओ....।"
दो नवयुवक मांझी पानी में कूद गए और घोड़ों की रासें थाम कर उन्हें तट तक घसीट लाये ।
"बहुत अच्छा ।"
थके हुए घोड़े बड़ी कठिनता से पानी के बाहर निकले परन्तु वे खड़े न हो सके । वहीं जमीन पर गिर पड़े ।
"इनके शरीर को पोंछो और इनके चारों ओर आग जला दो ताकि यह उष्णता अनुभव कर सकें । मैं तुम्हें कुछ दवाएं लिख देता हूँ, वह भी ले आना और इनकी मालिश करना । तुम में से कोई एक व्यक्ति इनके पास ठहरे और शेष मेरे साथ चलें ।"
स्त्रियां एक ओर चली गईं । मैले-कुचैले सूखे कपड़े पहने आग के पास महाबाहु बैठ गया और मछेरों द्वारा लाया गर्म-गर्म दूध पीने लगा । उसने आराम के लिए झोंपड़ी की दीवार से अपनी पीठ लगा ली ।
आग की उष्णता तथा गर्म दूध की गरमी से उसके शरीर में जान आई । वह अपने आपको हल्का सा अनुभव करने लगा । उसने आपस में बातें करते मछेरों से पूछा, "यह गांव किस के राज्य में है ?"
"मालवा राज्य है महाराज ।"
"अच्छा ! तो तुम में से एक आदमी गाँव के मुखिया के पास जाकर कहे कि एक राजकर्मचारी एक आवश्यक कार्य के लिए तुम्हें बुला रहा है ।"
"मुखिया का मिलना कठोर होगा महाराज ! क्योंकि महाराज स्वयं अपने अनुचरों के साथ इसी गाँव में ठहरे हुए हैं । वह तथा गाँव के सभ्रांत व्यक्ति उनकी सेवा में लगे हुए हैं ।"
"क्या सचमुच महाराज यहाँ पधारे हुए हैं ?" महाबाहु ने आश्चर्य से पूछा ।
"हाँ महाराज ! यह देखिये तीन सवार सामने चले आ रहे हैं । हो सकता है हमें ताजा मछली पकड़ने के लिए कहने आ रहे हों ।"
घुड़सवारों के समीप आने पर महाबाहु ने आवाज दी, "चन्द्रसेन !"
गरीब मछेरों के मध्य में मैले-कुचैले कपड़े पहने किस परिचित ने उसे आवाज दी ? वह हतप्रभ सा होकर उधर देखने लगा और आवाज देने वाले को पहचानने का प्रयत्न करने लगा ।
"ओह ! महाबाहु आप ? और इस वेष में ?" वह अपने घोड़े से कूदा और महाबाहु के गले से लिपट गया । आश्चर्य से उसके साथी सैनिक भी घोड़ों से नीचे उतरकर खड़े हो गए ।
"महाराज यहीं पर हैं क्या ?"
"हाँ ! यहीं हैं ।"
"मैं उन्हें मिलना चाहता हूँ ।"
"तो आइये ।"
"परन्तु इससे पहले तुम मेरे लिए साफ-सुथरे कपड़े मंगवा दो । मेरे कपड़े उधर झोंपड़ियों पर पड़े सूख रहे हैं । यदि यह लोग मेरी सहायता न करते तो मैं इस नदी में डूबकर मर जाता ।"
"परन्तु तुम इस नदी में आए कैसे ?"
"मैं महाराज से मिलने के लिए आ रहा था । रास्ते में हूण लुटेरों से मेरी मुठभेड़ हो गई । मेरा घोड़ा नदी में गिर पड़ा । हूण सरदार और मैं दोनों ही पिछले दो घंटे से नदी में युद्ध करते बहते चले आ रहे थे कि एक मगरमच्छ ने हम पर आक्रमण कर दिया । भाग्य से मैं तो बच गया परन्तु वह हूण उसके उदर में समा गया और थकावट से चूर मैं नदी के वेग के साथ बहता यहाँ आ गया हूँ ।"
"हे मेरे भगवान् ! तुम किन संकटों में जा फंसे ?" उसने मुड़कर कर्मचारी को आदेश दिया कि मेरे यहाँ से इनके लिए कपड़ों का जोड़ा ले आये ।
"इसे यह भी कह दो" महाबाहु ने कहा, "कि राज्य के पशु चिकित्सक को बुलाता लाये । मेरे रोगग्रस्त घोड़े नदी के तट पर गिरे पड़े हैं, वह इनकी सचमुच चिकित्सा आदि करेगा ।"
चन्द्रसेन ने सैनिक को पशुचिकित्सक को सूचित करने का आदेश भी दिया ।
घुड़सवार गाँव की तरफ घोड़े को दौड़ाता हुआ चला गया ।
"हूण से कहाँ मुठभेड़ हो गई थी आपकी ?" चन्द्रसेन ने पूछा ।
"क्या ऐसा होना असम्भव था ? आज जब सारा देश इनके अत्याचार से त्राहि-त्राहि कर रहा है, किसी भी हिन्दू के साथ इनकी टक्कर हो जाना साधारण सी बात है । देश का कोई भी प्रदेश ऐसा नहीं है जहाँ इन लोगों ने लूटमार न मचा रखी हो ।"
"परन्तु मालवा में ऐसी घटनायें नहीं हो रही हैं ।"
"क्यों ? क्या हूणों को मालवा में पराजित होना पड़ा है ? अथवा उन लोगों को यहाँ से भगा दिया गया ?"
"हार-जीत और युद्ध का तो अवसर ही नहीं आया, इससे पूर्व ही महाराज ने उनसे सन्धि कर ली है ।"
"सन्धि ! क्या कहा चन्द्र ! महाराज ने हूणों से सन्धि कर ली है ? ऐसे महाराज ने जो सच्चा, कर्त्तव्यनिष्ठ तथा प्रजापालक है, उसने इन बर्बरों से सन्धि की है जो हमारे देश को, हमारे पूज्य स्थानों को हमारी मान्यताओं को नष्ट-भ्रष्ट करने में लगे हुए हैं, जिन्होंने न जाने कितनी स्त्रियों के सतीत्व भंग किए, कितनी गौओं और बछड़ों को अपने उदर में डाल लिया है - जिन्होंने यहाँ के देव-स्थानों को अपवित्र किया, हमारे शान्ति से रहने वाले किसानों की हरी-भरी खेती को जला डाला है ? उनसे महाराज ने .... क्या तुम उपहास तो नहीं कर रहे चन्द्र ?"
सब लोग इस बात को सुनकर हतप्रभ से हो गए । कुछ व्यक्तियों के चेहरों पर क्रोध की लालिमा व्याप्त हो गई । उन्हें इस सन्धि में अपने अपमान की गन्ध अनुभव हुई ।
उनके आत्मसम्मान को उभारते हुए महाबाहु ने कहा, "यदि सचमुच महाराज इस अपमानकारक सन्धि के लिए तैयार हो गए थे, तो क्या तुम लोगों का कुछ भी कर्त्तव्य नहीं था ? क्या देश और जाति का अपमान तुम लोगों का नहीं है ! क्या यह कायरता नहीं कि हमारा देश हाहाकार कर रहा हो और तुम आनन्द की बंसी बजाओ ?"
"क्या तुम अपनी उन प्रतिज्ञाओं को भूल गए हो जो तुमने राष्ट्र के प्रति कीं थीं ?"
"हमें सब कुछ स्मरण है महाबाहु ! परन्तु जब सारा राजदरबार ही इसका इच्छुक हो तो हम थोड़े से व्यक्ति भला क्या कर सकते थे ?"
"तुम लोग इस प्रकार की अपमानित स्थिति से त्यागपत्र देकर सेवाओं से मुक्त हो सकते थे । तुम्हें समझ लेना चाहिए था कि प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्त्तव्य है कि इस प्रकार के राष्ट्रद्रोही पग उठाने वालों को या तो विवश कर दें अथवा उस राज्य को जिसमें इस प्रकार की कुचेष्टायें की जा रही हों, छोड़कर चला जाय अथवा अपने जागरण मन्त्र से समूचे राष्ट्र में जागृति की ज्योति जगा दे ।"
"तुम बड़ी कठोर बातें कह रहे हो महाबाहु ।"
"इसका कारण यही है चन्द्र ! कि आज तुम पदलोलुपता के मद में सत्य वचनों को कठोर कहने का साहस कर रहे हो, तुम भी उन दरबारियों की तरह चाटुकारिता की भाषा को ही सब कुछ समझने लगे हो । परन्तु मैं इस प्रकार के किसी वातावरण में नहीं पला । अतः मेरी सत्य बातें आज तुम्हें अजीब सी लग रहीं हैं ।"
अपने अधिकारी को किसी अपरिचित से इस प्रकार बातें करते हुए देखकर साथ वाला सिपाही दूर चला गया । उसने दोनों घोड़ों को एक वृक्ष के साथ बांध दिया और आप मछेरों की झोंपड़ियों की तरफ जाकर घूमने लगा ।
मछेरे नदी की ओर चले गए थे और उनकी स्त्रियाँ घरों को चली गईं थीं ।
महाबाहु के कठोर वचनों के प्रसंग को बदलने के लिए चन्द्रसेन ने पूछा, "जो हो चुका उसको छोड़ो, अब तुम ही बताओ क्या करना चाहिए ?"
"पहले यह बताओ कि यह सन्धि कब हुई है ?"
"कल रात हूण सम्राट् का दूत सन्धि की शर्तें मनवाकर आज प्रातः वापस चला गया है ।"
"हूँ !" महाबाहु ने एक गहरा साँस लिया, "क्या तुम्हें मालूम है कि सन्धि की शर्तें क्या थीं ?"
"सर्वप्रमुख तथा अपमानजनक शर्त यह कि महाराज की दस कुमारी कन्यायें मेहरगुल के रनिवास में भेजी जायें ।"
महाबाहु के माथे की त्योरियाँ चढ़ गईं, उसने क्रोध में अपने दाँतों से निचला होंठ काट लिया । चन्द्रसेन कहता गया, "धूर्त और कामी सेनापति ने महाराज को सम्मति दी कि सारी प्रजा में से दस सुन्दर लड़कियों को चुन लिया जाय और उन्हें राज-पुत्रियों के रूप में उनकी भेंट कर दिया जाये ।"
"धूर्त ! अपने अपमान को दूसरे पाप से दूर करना चाहता है ! प्रजा की पुत्रियाँ भेजने से क्या अच्छा यह नहीं है कि सेनापति को भूखे सिंह के पिंजरे में डाल दिया जाय ?"
"जब सेना के अन्य अधिकारी और प्रतिष्ठित व्यक्तियों को इस बात का पता लगा तो उन्होंने शोक के तौर पर घरों की बत्तियाँ बुझा दीं और कुछ लोगों ने तो उस रास्ते में गड्ढ़े कर दिये जिस पर हूण दूत का रथ जाना था ताकि वह उलट जाए ।"
"क्या तुम जानते हो कि हूण दूत के जाने के बाद महाराज की क्या हालत हुई ?"
"मुझे तो यूं लगा जैसे वे बहुत परेशान थे । यद्यपि उन्होंने कोई बात कही तो नहीं जिससे उन्हें अपने कृत्य पर पश्चाताप हो रहा हो, परन्तु अब दुखित होने से क्या बनता है ? जो होना था वह तो हो चुका है ।"
"बनेगा क्यों नहीं चन्द्रसेन ! जो तीर कमान से निकल चुका है उसके पीछे एक और तीर छोड़ा जाएगा । पहला तीर तुम्हारे सेनापति, मंत्री आदि जैसे कायरों के धनुष से निकला है परन्तु दूसरा तीर देश के उन वीरों के धनुष से निकलेगा जो उसे मार्ग में ही काट डालेगा । चलो, तुम्हारा आदमी वस्त्र ले आया है । मैं इन्हें बदल लूँ फिर महाराज के पास चलते हैं ।"
"मेरे लिए क्या आज्ञा है ?" घुड़सवार ने चन्द्रसेन से पूछा ।
"मेरा और अपना घोड़ा लेकर सामने खड़े रहो, हम दोनों इन पर चढकर जायेंगे, तुम पीछे से पैदल आ जाना । अपितु नदी तट पर दूसरे सैनिक से पता करना कि छावनी तक घोड़ों को पहुंचाने में उसे तुम्हारी आवश्यकता तो नहीं ।"
कपड़े बदलकर महाबाहु झोंपड़ी से बाहर निकला । वह स्वस्थ और सुन्दर दिखाई देता था । चलने से पहले उसने मछेरों को पास बुलाया । दस पन्द्रह युवक और वृद्ध उसे घेरकर खड़े हो गए ।
महाबाहु स्वर में नम्रता और अपनाव का भाव भरकर बोला, "आपने मेरे जीवन की रक्षा की है इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ । यदि आपको किसी प्रकार का कष्ट या असुविधा हो तो मुझे बताओ । मैं महाराज से कहकर उसे दूर कराने की चेष्टा करूंगा ।"
उनमें से एक वृद्ध बोला, "धन्यवाद कैसा महाराज ! यह तो हमारे बड़े भाग्य थे जो आपने हमारी झोंपड़ी को पवित्र किया । इस राज्य में जहाँ सिंह और बकरी एक घाट पानी पीते हों, चारों तरफ सुख शान्ति का बोलबाला हो, वहाँ किसी को क्या कष्ट हो सकता है महाराज !"
"तुम में से यदि कोई राज्य में नौकरी करने का इच्छुक हो तो मैं वह दिलवाने का प्रयत्न करूँ ?"
"नहीं ! नहीं महाराज !! हम नौकरी के इच्छुक नहीं हैं । भले ही नौकरी अच्छी हो परन्तु हमें अपने काम में अधिक आनन्द आता है । यह नदी है हमारा राजदरबार, जाल पकड़े नौकाओं पर भागते हुए सोने चाँदी सी चमकने वाली मछलियाँ पकड़ना ही हमारी नौकरी है । चाँदनी रातों में नदी के चमकते जल पर अठखेलियां करने से अधिक सुखद और आनन्ददायक जीवन क्या हो सकता ?"
"बहुत अच्छा !" महाबाहु मुस्कराया और उनका अभिवादन स्वीकार करता हुआ चन्द्रसेन के साथ घोड़े की ओर चल पड़ा जहाँ मछेरों के नंगे और मैले-कुचैले बच्चे खेल रहे थे, चाँदी के समान चमकने वाली नन्हीं-नन्हीं शंख की मालाएं गले में पहने हुए । कुछ बच्चों की कटियों में मूंगे, सीप और लोह के छल्लों से बनी तागड़ियां बंधी हुईं थीं । इन दोनों को पास से जाते हुए देख कुछ बड़ी आयु के बच्चों ने नमस्कार किया ।
"प्यारे बच्चो, हम तुम्हारे लिए मिठाई और फल भेजेंगे ।"
बच्चे प्रसन्नता से किलकारियाँ मारने और कूदने लगे । इसी कोलाहल में एक नन्हीं बच्ची चिल्लाई, "हम तुम्हें मछलियाँ भेजेंगे, हम आप ही पकड़ लेते हैं ।"
एक और बच्चा तालियाँ पीटता हुआ बोला, "हम तुम्हें गाने वाले मेंढ़क भेजेंगे ।"
तीसरा बच्चा बोला, "यदि तुम मुझे घोड़ा दो तो मैं तुम्हें अपनी सारी सीपियाँ दे दूंगा ।"
घोड़े पर जाते चन्द्रसेन और महाबाहु ने गर्दन मोड़कर प्यार भरे लहजे में कहा, "अच्छा मेरे खिलौनो, मैं तुम्हारे लिए अवश्य ..... भेजूंगा ।"
बाईं ओर मैदान में सैनिकों के खेमों की पंक्तियाँ दूर-दूर तक चली गई थीं । घुड़सवार सेना की गाड़ियाँ और घोड़ों के खाने के लिए दाने और चारे से भरी गाड़ियाँ अनाज मण्डी के गोदामों के समान दूर-दूर भरी खड़ी दिखाई देती थीं । सैनिक अपने-अपने घोड़ों की मालिश कर रहे थे । दूसरी ओर हस्तिसेना के हाथियों की पंक्तियां विकराल काले दैत्यों के समान खड़ीं थीं । हाथी आनन्द में झूमते हुए गन्ने खा रहे थे, उनके पैरों की लोहश्रंखलाएं रह-रहकर बज उठतीं थीं । यद्यपि भोजन का समय समाप्त हो चुका था फिर भी भोजनालय से धुएं की रेखाएं निकल-निकलकर आकाश में अदृश्य हो रहीं थीं ।
चलते-चलते वे दोनों राज भोजनालय के पास से गुजरे जिस में से सुस्वादु पकवानों की सुगन्धि आ रही थी । भोजनशाला की बाईं ओर सुनहरे जड़ाऊ चौबों वाले मखमल और अतलस के राजसी तम्बू दिखाई दिये जो बहुत ही सुन्दर तथा कलात्मक ढ़ंग से बने हुए थे । इन तम्बुओं के सामने सुन्दर रंग-बिरंगे फूलों के गमले रखे हुए थे और इनके द्वारों पर सशस्त्र सैनिक खड़े थे । श्वेत बजरी वाले मार्गों में सबसे ऊंचा महाराजा का तम्बू अपनी निराली शान से खड़ा था जिस पर पताका फहरा रही थी ।
"मेरे विचार से" महाराज की छौलदारी की तरफ बढ़ते हुए महाबाहु ने कहा, "चन्द्रसेन, तुम मुझे महाराज के खेमे के पास छोड़कर चले जाना और जब तक मैं उनसे मिलकर नहीं आता, तब तक तुम अपने मित्रों तथा एक जैसी विचार प्रणाली में बंधे युवकों की सभा बुला रखना ताकि आने के बाद जैसी भी स्थिति हो, उसके अनुरूप अगला कार्यक्रम निश्चित कर सकें ।"
"तुम्हें सन्देह है कि मैं अपने कार्य में सिद्ध नहीं हो सकूंगा चन्द्र !"
"नहीं, ऐसी बात नहीं महाबाहु ! परन्तु समय, स्थान और परिस्थिति मनुष्य से अधिक बलवान होते हैं । तब तक क्या कहा जा सकता है जब तक कि तुम मिलकर नहीं आते ।"
"तुम चिन्ता मत करो चन्द्र ! अगर दुर्भाग्यवश वह स्थिति न आ सकी तो महाराज से महान् जो हमारा राष्ट्र है उसकी कीर्ति को अक्षय बनाने के लिए हर सम्भव उपाय किया जायेगा ।"
"अच्छा, जैसी तुम्हारी इच्छा ।"
राजा के खेमे पर पहुंच कर चन्द्रसेन और महाबाहु घोड़े से नीचे उतर गये । अंगरक्षक अपनी तलवारें पकड़े पहरा दे रहे थे, अपने घोड़े उनके हाथों में थमाकर दोनों महाराज के निवास स्थान की ओर चल पड़े ।
आंगन में खड़े पहरेदार से चन्द्रसेन ने महाबाहु का परिचय कराते हुए कहा, "आप महाराज के तक्षशिला के सहपाठी हैं । अत्यावश्यक कार्य से उनके दर्शन करने आये हैं ।" नमस्कार करते हुए अंगरक्षक महाराज को महाबाहु के आगमन की सूचना देने चला गया ।
महाबाहु वहीं एक आसन पर बैठ गया और चन्द्रसेन अपने अगले कार्य की पूर्ति के लिए वापस चला गया ।
तभी महाबाहु ने देखा कि एक सुन्दर, सुडौल और बड़े आकर्षक व्यक्तित्व का युवक उनके पास आ रहा था । वह महाराज का गुप्तचर था । यद्यपि नाम से दोनों एक दूसरे से परिचित थे परन्तु कभी मिले न होने के कारण वे एक दूसरे को पहचानते न थे ।
"आइये श्रीमान्" उसके पास आने पर महाबाहु ने कहा ।
और वह अपने स्थान से उठने लगा । बड़े ही उदार भाव से युवक ने महाबाहु को बैठे रहने का आग्रह करते हुए कहा, "बैठिये श्रीमान्, मुझे आपके दर्शन कर अजीब प्रसन्नता अनुभव हो रही है । यद्यपि अभी तक आप से परिचित नहीं हो सका परन्तु फिर भी .....।"
महाराज का यह गुप्तचर श्रीकान्त न्यायशास्त्री का पुत्र था । छोटी अवस्था से ही उसे राजमहलों में आने-जाने का अवसर मिलता रहा था, अतः वह यहाँ के नियमों से भली-भाँति परिचित था । इसीलिए उसकी वाणी और बोलने के ढ़ंग में अत्यधिक शिष्टाचार का समन्वय था । इसके अतिरिक्त उसमें ऐसी ईश्वरदत्त प्रतिभा भी थी जिसके कारण वह हर परिस्थिति और वातावरण के अनुरूप अपने को बना लेता था ।
यही कारण था कि महाराज ने उसे अपना विशेष गुप्तचर नियुक्त किया था, विद्वानों के मध्य अपनी विद्वत्ता, अहंकारियों के मध्य में खुशामद और मूर्खों के मध्य में महाज्ञानी ब्नकर उनके अन्दर के भेदों का पता लगा लिया करता था । परन्तु महाबाहु जो एक राज्य को दूसरे राज्य में मिला देने, सारे भारतखंड की राजनीति को अपने इशारों पर चलाने के लिए प्रयत्नशील था, जिसने सारे देश को एकता के सूत्र में बाँधकर आततायी हूण जाति को भारत से खदेड़ने का बीड़ा उठाया था, उसकी दृष्टि में इसका कोई भी अस्तित्व नहीं था । वह जानता था कि श्रीकान्त उसे अपने वाग्जाल में फंसाकर जानना चाहता है कि वह किस उद्देश्य से आया है । वह मन ही मन हँसा । उसे इस युवक पर तरस आया । महाबाहु ने सोचा क्यों न मैं इसे बातचीत के ऐसे स्थान पर खड़ा करूं जहां यह स्वयमेव अपने मन की बात उगलनी आरम्भ कर दे, अन्यथा अपना पीछा छुड़ाने पर बाध्य हो जाय । परन्तु इस प्रकार के विवाद के लिए उसके पास समय नहीं था और वह यह भी नहीं चाहता था कि जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह वहां आया है उसे गुप्त रखे । वह चाहता था उसकी विचारधारा से जितने भी लोग परिचित होंगे उससे देश का ही कल्याण है । वह इस बात से परिचित था कि न्यायशास्त्री और उसका बेटा दोनों ही राष्ट्र की इस हीन स्थिति को देखना नहीं चाहते परन्तु फिर भी मालवा का सारा राजनैतिक सूत्र जिन प्रधानमन्त्री, कोषाध्यक्ष तथा सेनापति के हाथ में है वे बीच में ही कहीं बाधा उत्पन्न न कर दें, वह श्रीकान्त के सामने बिल्कुल अनजान ही बना रहा ।
श्रीकान्त महाबाहु के सामने की चौकी पर बैठ गया और निःसंकोच बोला, "मेरा विचार है कि आप महाराजाधिराज से मिलने आए हैं । यदि आपने सूचना न भेजी हो तो मुझे आज्ञा दें, मैं अन्दर समाचार भेज दूं ।"
"नहीं-नहीं, समाचार देने के लिए आदमी अन्दर गया हुआ है । मैं और महाराज तक्षशिला में इकट्ठे पढ़ा करते थे, आज किसी कार्यवश यहाँ आने का सौभाग्य मिला । सोचा, चलो महाराज से ही मिलता चलूं ।"
"ओह ! तो आप हमारे महाराज के सहपाठी हैं ! कई बार अपने अध्ययन के समय की बातें सुनाते हुए कहा करते थे, धूमकेतु और महाबाहु मेरे बहुत अभिन्न मित्र थे । आज इस अवस्था में आपका यहाँ आना अवश्य महाराज को प्रसन्न्ता देगा ।"
श्रीकान्त की तरफ आश्चर्य से देखते हुए महाबाहु ने कहा, "क्यों, महाराज किसी चिन्ता में ग्रस्त हैं ?"
श्रीकान्त ने चारों तरफ दृष्टि घुमाकर देखा और फिर बड़े रहस्यात्मक ढ़ंग से बोला, "कल रात हूण सम्राट् मेहरगुल का दूत स्यालकोट से सन्धि का सन्देश लेकर आया था । भारतीय राष्ट्रीयता के पोषक महाराज इस सन्धि के पूर्णतः विरोधी थे । वे नहीं चाहते थे कि कोई विदेशी हमारे देश को परतन्त्रता की बेड़ियों में जकड़े । और फिर सन्धि की शर्तें भी इतनी हीन स्तर की तथा आत्म-सम्मान को चोट पहुंचाने वाली थीं जिन्हें स्वीकार करना अपना गला घोंटना था ।"
"परन्तु सुनते हैं फिर भी उन्हें स्वीकार करना पड़ा ।"
"हां ! शायद आपको इसका पता चल चुका है परन्तु उसके लिए महाराज को दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि राज्य के कुछ व्यक्तियों ने, जिनके हाथ में आजकल राज्य की नीति का सूत्र है, महाराज को ऐसा करने पर बाध्य कर दिया था ।"
"परन्तु इस सबका दायित्व तो उन्हीं का ही समझा जाएगा ।"
"यह ठीक है कि वे इस दयित्व से मुक्त नहीं हो सकते, यही दुःख तो उन्हें साल रहा है । इस दुःख ने ही तो उनकी रात की नींद और दिन का चैन छीन लिया है ।"
कुछ क्षण महाबाहु मौन बैठा सोचता रहा । शीघ्र ही उसके चेहरे का रंग बदलना शुरू हो गया । विपत्ति के बादलों की एक टुकड़ी तीव्र सूर्योदय के प्रकाश से म्लान होती दिखाई दी । उसकी आंखों में चमक पैदा हो गई । उसने घूरते हुए श्रीकान्त की ओर देखा ।
इस पैनी दृष्टि से नजर बचाता हुआ श्रीकान्त इधर-उधर देखने लगा । आखिर उसने साहस कर पूछा, "क्यों, क्या बात है .....?"
महाबाहु ने श्रीकान्त के प्रश्न पर कोई ध्यान न देते हुए कहा, "न्यायशास्त्री के सुपुत्र ! तुम तो राजा के प्रमुख चर हो न ? तुम्हारे विचार देश के सम्मान के पोषक हैं न, देश के प्रति क्या तुम्हारा कोई कर्त्तव्य नहीं था ? क्या तुम्हें ऐसा प्रयत्न नहीं करना चाहिए था कि राजदरबार में इस प्रकार के व्यक्तियों को प्रश्रय न मिले जो अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के पीछे देश की स्वतन्त्रता नष्ट करने पर तुल जायें ?"
फटी-फटी आंखों से देखते हुए श्रीकान्त ने कहा, "क्या मैं आपका परिचय जान सकता हूँ ?"
"मेरा नाम महाबाहु है और मैं महाराज का सहपाठी हूँ । इससे अधिक मैं आपको कुछ नहीं बता सकता । देश के कल्याण की भावना जिस प्रकार तुम्हारे हृदय में है, उसी प्रकार मेरे हृदय में भी उसकी अग्नि प्रज्वलित है । मैं चाहता हूँ इस यज्ञ में तुम भी हमारे साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलो । इसके अतिरिक्त मैं चाहता हूँ कि तुम इस बात से भी अनभिज्ञ न रहो कि भरतखंड के अनेक राजाओं के साथ मेरा परिचय है जिन्हें एक ध्वज के नीचे खड़ा करके उस आती हुई बाढ़ को पर्वत के समान आगे आकर रोकने का हमने बीड़ा उठाया है । "
श्रीकान्त ने अभिवादन करते हुए कहा, "आपकी कीर्ति और साहस के विषय में मैंने अभी तक सुना ही था परन्तु आज देखने का भी अवसर आया है । मैं इस बात को स्वीकार करता हूं कि इस प्रकार के देशद्रोहियों को नष्ट करने में मुझे सफलता नहीं मिली । मेरे प्रयत्न को सेनापति और प्रधानमन्त्री छिन्न-भिन्न करते रहे ।"
"कोई चिन्ता की बात नहीं है श्रीकान्त ! मैं महाराज के पास जा रहा हूँ । तुम देखना या तो विद्रोही लोग कारागार में होंगे अथवा मेरी लाश फांसी के तख्ते पर लटकती दिखाई देगी । परन्तु दूसरी परिस्थिति तभी सम्भव हो सकती है यदि महाराज कर्त्तव्य ज्ञान, धर्म और देशभक्ति की भावनाओं से बिल्कुल च्युत हो चुके होंगे ।"
"प्रभु न करे महाराज इतनी हीन स्थिति को पहुंचें ।"
थोड़ी देर में अंगरक्षक की पदचाप सुनाई पड़ी ।
महाबाहु ने श्रीकान्त से पूछा, "तुम भी चलोगे न ?"
"जी ! मैं भी आपके साथ चलूँगा ।"
तम्बू में प्रविष्ट होते हुए अंगरक्षक ने कहा, "आइये श्रीमान् ! यद्यपि प्रधानमंत्री और सेनापति महाराज से मंत्रणा कर रहे थे परन्तु फिर भी मैंने आपकी सूचना महाराज तक पहुँचा दी है । इसलिए महाराज ने आपको बुलाया है ।"
"किसी महत्वपूर्ण विषय पर तो मंत्रणा नहीं हो रही थी ?" श्रीकान्त ने पूछा ।
"मेरा विचार है शायद नहीं....। वास्तव में रात्रि को महाराज अच्छी तरह सो नहीं सके, अतः दोनों उनका कुशलक्षेम पूछने आए हैं ।"
महाबाहु उठकर खड़ा हो गया और उसने श्रीकान्त को चलने का संकेत किया ।
श्रीकान्त ने कहा, "चलिए ।"
स्वर्ण की कढ़ाई वाले रेशमी पर्दों से घिरे हरे रंग के कालीनों वाले मार्ग से चलते हुए वे महाराज के तम्बू में पहुंचे जहाँ दो चौकियों पर प्रधानमन्त्री और सेनापति विराजमान थे । सामने मालवा का युवक महाराज अपनी शाल ओढ़े पलंग पर लेटा हुआ था । उसके चेहरे की कान्ति मलिन हो रही थी । मालूम होता था जैसे किसी अन्तर्वेदना से दुःखित वह अपने आप से लड़ रहा है ।
तम्बू में प्रविष्ट होते ही महाबाहु ने महाराज को प्रणाम किया ।
"आओ, महाबाहु आओ !" अपने सहपाठी मित्र के साथ उठकर गले मिले । फिर अपने पलंग के पास पड़ी जड़ाऊ चौकी की तरफ संकेत करते हुए बोले, "बैठो !"
महाबाहु ने सेनापति और प्रधानमन्त्री को अभिवादन किया, तत्पश्चात् अपने आसन पर बैठ गया ।
महाराज बोले, "महाबाहु, किसे आशा थी कि आज तुम से भेंट होगी ।"
"हां महाराज ! संसार में बहुत सी बातें आशा के विपरीत ही हुआ करती हैं ।"
सेनापति और प्रधानमंत्री ने चौंककर इस युवक की तरफ देखा । उन्हें अनुभव हुआ जैसे इसके कथन में कटाक्ष का अंश हो ।
महाराज ने कहा, "क्यों महाबाहु, तुम तो दार्शनिकों के समान बातें करने लगे ?"
"नहीं महाराज ! ऐसी कोई बात नहीं । परन्तु परिस्थितियां और समय मनुष्य को सब कुछ बना देता है ।" महाबाहु के चेहरे पर उपेक्षा की लकीर उभर आई ।
"क्या मार्ग में कोई दुर्घटना हो गई है महाबाहु ?"
"दुर्घटनाएं तो आजकल प्रतिक्षण ही घट रही हैं कहीं व्यक्तियों के साथ, कहीं राष्ट्रों के साथ, कहीं मठों में और कहीं मन्दिरों में । भारत का कोई स्थान नहीं जहाँ इस प्रकार की दुर्घटनाओं का बोलबाला न हो ।"
"तुम्हारे इन रहस्यात्मक संकेतों को न समझने के कारण मुझे अपनी बुद्धि पर अविश्वास होता जा रहा है महाबाहु ! क्या तुम स्पष्टतः सब बातें नहीं कह सकते ?"
प्रधानमंत्री बीच में ही बोल उठा, "देखो महाबाहु, तुम हमारे अतिथि हो, फिर भी मेरी धृष्टता क्षमा करना । आजकल महाराज की अवस्था अच्छी नहीं है । इसलिए इस प्रकार की उलझन भरी बातों से उनको परेशान करने का प्रयत्न मत करो ।"
"नहीं ! नहीं !! महामंत्री जी, मेरा ऐसा कोई अभिप्राय नहीं है । मैंने तो स्वभाव से ही ऐसा कहा है । मुझे मालूम नहीं था कि महाराज भी किसी दुर्घटना का शिकार हुए हैं ।"
सारा वातावरण एकदम क्षुब्ध हो उठा । श्रीकान्त महाबाहु के कथन के ढ़ंग से प्रभावित हुए बिना न रहा । प्रधानमंत्री और सेनापति एक दूसरे का मुंह देखने लगे । थोड़ी सी देर में इस युवक ने सब के दिलों में हलचल मचा दी । किसी को कोई उत्तर न सूझा ।
नीरवता को भंग करते हुए महाबाहु ने पूछा, "क्या मैं जान सकता हूँ महाराज, कि आपके रोग का क्या कारण है ? यदि सम्भव हो सका तो मैं अपना सर्वस्व बलिदान करके भी आपकी प्रसन्नता को वापिस लाने का प्रयत्न करूंगा ।"
श्रीकान्त बीच में ही बोल उठा, "महाराज की अस्वस्थता का और कोई कारण नहीं श्रीमान् ! केवल अपनी स्थिति के विरुद्ध परिस्थितियों की विवशता के कारण, इन्हें हूण सम्राट मेहरगुल से सन्धि करनी पड़ी है ।"
"श्रीकान्त !" प्रधानमंत्री चीखा, "तुम्हें बात करने का शिष्टाचार भी नहीं आता ।"
सारा वातावरण उत्तेजित हो उठा । श्रीकान्त सहम कर ठिठक गया । प्रधानमंत्री और सेनापति की आँखें भूखे भेड़िये के समान स्फुलिंग छोड़ने लगीं ।
महाबाहु मुस्कराया और वातावरण में नरमी लाने का प्रयत्न करते हुए बोला, "मुझे सब मालूम है, महामन्त्री ! आप जैसे राजनीतिज्ञ और सम्राट् जैसे धर्मरक्षक लोगों ने, जिन पर इस आपत्ति के समय सारी जाति की आँखें लगी हैं, इस प्रकार शत्रुओं के साथ सन्धि कर ली है । और फिर उन शर्तों पर जिन के सुनने पर ही आत्मसम्मान रखने वाला व्यक्ति उन्हें मानने से पूर्व मर जाना श्रेयस्कर समझता है । कोई भी देशभक्त इसको सहन नहीं कर सकता ।"
प्रधानमंत्री क्रोधाभिभूत होकर बोला, "श्रीमान्, यह हमारी निज की बातें हैं । समय के अनुसार अपने राज्य की रक्षा के लिए क्या उचित या अनुचित है, उसे देखना आपका काम नहीं, हमारा है । मैं नहीं चाहता महाराज की इस अस्वस्थता के समय आप इस प्रसंग पर अधिक बातें करें ।"
"शायद आप नहीं जानते, इतना बड़ा निश्चय हमने बड़े सोच-विचार के बाद किया था और अब जब हमने आगे पग रख लिया है, मैं नहीं चाहता इसे उलझाकर अपनी प्रजा तथा देश को मुसीबत में डालूँ । फिर संधि करने के बाद वह हमारे मित्र बन गए हैं । उनका अनिष्ट सोचना उनके प्रति विश्वासघात करना है ।"
"मन्त्री महोदय ! मैं नहीं चाहता ऐसा कुछ कहूं जिनसे आप को कष्ट हो । फिर भी मैं इतना अवश्य कहूंगा कि ऐसी घृणित शर्तें रखने वाला हमारा मित्र नहीं हो सकता । जिसने हमारे सम्मान को ठुकरा दिया है उसके प्रति वफादार होना कायरता का द्योतक है । मैं नहीं चाहता उस राजा की कीर्ति को कलंक लगने दूं जिसके साथ मैंने जीवन के उन क्षणों को बिताया है जो हमारे लिए सर्वोत्कृष्ट थे । हाँ, यदि महाराज अपने आप को इतना हीन देखना चाहते हों तो मैं कुछ नहीं कहता ।"
"नहीं, नहीं महाबाहु !! तुम कहो । कल से जब से मैंने अपने आपको बेच दिया है, मैं बेचैन हूँ । मुझे कुछ नहीं सूझता । तुम अवश्य मुझे कहो महाबाहु, मुझे इस बात से शक्ति मिलती है ।"
"क्षमा करना महाराज" महामन्त्री बोला, "मैंने तो केवल इस उद्देश्य से यह कहा था कि महाराज आगे ही चिन्तित हैं । उस पर इस प्रकार अपमानकारक बातें कहकर आपका मित्र आपकी बेज्जती कर रहा है जिसको मैं कभी भी सहन नहीं कर सकता ।"
"मैं महाराज के मन पर किसी चिन्ता या संकट का बोझ लादने नहीं आया और न ही मेरी यह इच्छा है कि मैं महाराज को अपमानित करूं क्योंकि महाराज, महाराज होने से पूर्व मेरे मित्र हैं और ऐसे मित्र जिनके लिए मैं अपना तन, मन, धन बलिदान कर सकता हूँ । मैं तो केवल इस अभिप्राय से आया था कि महाराज को उस अपमान से बचा सकूँ जो परिस्थितियों की विवशता के नाम पर किया जा रहा है ।"
"तुम ठीक कहते हो महाबाहु ! तुम मुझे और अधिक कष्ट पहुंचाओगे, ऐसी मैं स्वप्न में भी आशा नहीं कर सकता । मैं जानता हूँ इतनी विवशताओं में फंसी मेरी स्थिति को हल करने का उपाय लेकर ही तुम आए होंगे । जब से मैंने सन्धि-पत्र पर हस्ताक्षर किये हैं, मेरा मन और शरीर जल रहा है । आज प्रातः जब हूण दूत और मेरा कर्मचारी उसके साथ चले गए तब से मुझे अनुभव हो रहा है जैसे मेरी आत्मा की शक्ति और आंखों की ज्योति कोई छीन ले गया है । आज अपने लोगों को मुँह दिखाने की शक्ति भी मुझमें नहीं है, जैसे मैंने कोई महान् पाप किया हो । बार-बार मेरा मन मुझे धिक्कार रहा है और इच्छा होती है कि इस जिन्दगी से अच्छा है कि मैं वैराग्य ले लूँ । सेनापति कहता था सन्धि कर लो, सन्धि ! सन्धि !! सन्धि !!! हर एक के मुँह में सन्धि ही सन्धि थी, मानो सबने कायरता का बाना पहन रखा है । कोई भी व्यक्ति यह कहने वाला नहीं था - महाराज ! आत्मसम्मान की रक्षा के लिए तलवारें निकालकर दासता की श्रृंखला तोड़ दो, इन आततायियों को मार-मार कर देश से बाहर निकाल दो, गौ ब्राह्मण और स्त्रियों की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व होम कर दो ।"
महाबाहु बोला, "नहीं महाराज ! यह आपकी भूल है । आपको इस प्रकार की सलाह देने वालों की यहां भी कमी नहीं । परन्तु कुछ व्यक्तियों ने उन लोगों को ऐसा करने नहीं दिया । और अपने स्वार्थ और देश को बचाने वाले द्रोही यहाँ भी उसी प्रकार उपस्थित थे जिस प्रकार सिकन्दर को आश्रय देने वाले उस समय उपस्थित थे ।"
सेनापति चमककर बोला, "श्रीमान् ! आपकी इस प्रकार की बातें हमारे सम्मान को ललकार रही हैं । आपने बिना समझे-बूझे इस प्रकार के शब्द कहे हैं । यदि आप कल की सभा में उपस्थित होते तो इस प्रकार का दोषारोपण करके हमें अपमानित करने का दुःसाहस न करते । उस समय प्रत्येक पदाधिकारी सन्धि की ही बात कह रहा था । उसे किस आधार पर झूठ कहा जा सकता है !"
"सेनापति जी !" महाबाहु दृढ़ तथा गम्भीर शब्दों में बोला, "यदि आप उस समय को सत्य कहते हैं तो मैं उसको झूठ सिद्ध करने की सामर्थ्य भी रखता हूँ । यहाँ आने से पूर्व मैं बहुत से लोगों से मिल चुका हूँ । उन लोगों के विचार मैंने आपके सामने स्पष्ट कर दिये हैं ।"
"अर्थात् ?"
"वह सन्धि के प्रस्ताव के समर्थक नहीं थे । उन्हें उसका विरोध करने का समय ही नहीं दिया गया ।"
सेनापति के चेहरे से अविश्वास टपक रहा था, उसने घृणा से अपना मुँह बिचकाया ।
तभी प्रधानमंत्री बोला, "मैं आप के साथ वृथा विवाद करना उचित नहीं समझता । महाराज और हम जिनका उनसे हर समय का सम्बंध है, आप से अधिक जानते हैं । आपको पधारे अभी एक पहर भी नहीं हुआ । इतने समय आप हूण सरदार के समय की स्थिति के विषय में कैसे कह सकते हैं । और उस समय आप उपस्थित भी नहीं थे जब वह सन्धि-पत्र लेकर लौटा था ।"
"यह सच है मन्त्री महोदय", महाबाहु बोला, "मैं आप लोगों से अधिक इस विषय में नहीं जानता । परन्तु मैं महाराज से प्रार्थना करूंगा कि इस बात की सत्यता के लिए वह अपने सब कर्मचारियों को आमन्त्रित करें और उन्हें निःसंकोच अपने विचार कहने का अधिकार दें । मैं आपका अतिथि हूं, मेरा निज का भी कुछ सम्मान है । यदि मेरी बातें असत्य हुईं तो मन्त्री महोदय और सेनापति के समक्ष ही क्यों, सब के सामने होने वाले अपमान का दंड भोगने को प्रस्तुत हूँ ।"
"आपका अभिप्राय ?"
"अभिप्राय केवल इतना ही है श्रीमान् कि यदि आप राजकीय क्षेत्रों से संबन्धित नहीं हैं तो आप को यह बता देना मेरा कर्त्तव्य है कि एक बार का राजदरबारों का निर्णय बदला नहीं जाया करता । इस प्रकार सब कर्मचारियों को पूर्व निश्चय पर पुनः निश्चय करने के लिए बुलाने से हमारे राज्य प्रबन्ध पर बुरा प्रभाव पड़ेगा और कई बार इस प्रकार के परिवर्तन से कई प्रकार की राजनैतिक उलझनें उत्पन्न हो जातीं हैं जिनका फल राज्य ही नहीं, अपितु राष्ट्रों को भी भुगतना पड़ता है ।"
महाबाहु बोला, "मन्त्रिवर, मैं सदा से ही सुनता आया हूँ कि आप बहुत योग्य राजनीतिज्ञ हैं । आपका तर्क वास्तव में कौटिल्य की नीति से कम महत्व का नहीं । यह ठीक है कि राजनैतिक क्षेत्रों में एक बार के किये गये निर्णय को बदला नहीं जा सकता, उससे होने वाले भयंकर परिणामों की बात भी नितान्त सत्य है । परन्तु इस संकट के समय जब सारी जाति और सारा राष्ट्र परतन्त्रता की बेड़ियों में बांधा जा रहा है, आने वाली उलझन की परवाह न करते हुए, देश की रक्षा के लिए हर प्रकार का खतरा मोल लिया जा सकता है ।"
प्रधानमंत्री बिना बोले महाबाहु को घूरता रहा । इस धृष्ट युवक को समझने में उससे कहीं भूल हो गई है, अथवा इसकी बुद्धि में कहीं अन्तर है, वह निश्चय न कर सका । उधर सेनापति, महाराज के चेहरे का अध्ययन कर रहा था ताकि वह उनके ऊपर पड़ते हुए प्रभाव को भाँप सके । परन्तु महाराज बिल्कुल निर्विकार भाव से बैठे उन लोगों की बातें सुन रहे थे ।
श्रीकान्त महाबाहु के वाक्चातुर्य से अत्यधिक प्रभावित था परन्तु उसने भी अपने चेहरे पर किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होने दिया । अपितु इसके विपरीत उसने यही दिखाने का प्रयत्न किया जैसे वह दोनों के विचारों का समर्थक है ।
महाराज बोले, "तो हम सब सरदारों को बुलवा लेते हैं ।"
"जैसी महाराज की आज्ञा, परन्तु फिर भी मैं तो यही कहूंगा कि यह सुझाव लाभप्रद नहीं रहेगा", सेनापति ने कहा ।
"ओह प्रधानमंत्री !" महाराज उठते हुए बोले, "सब सरदारों को बुलाने में तुम संकट का अनुभव क्यों करते हो, वे सब तो अपने हैं ।"
"जैसी आपकी आज्ञा" कहकर क्रोध को दबाये हुए प्रधानमंत्री अपने स्थान से उठा और अपने चोबदारों के सरदार को जो तम्बू के बाहर खड़ा था, बुलाकर आज्ञा दी कि सब सरदारों को मन्त्रणा स्थान पर एकत्र करो । एक अत्यन्त आवश्यक बात पर विचार करना है ।
अपने स्थान पर वापस आकर प्रचार मन्त्री ने चाहा कि इस आज्ञा को रोकने के लिए उसी विषय पर चर्चा चलाई जाय और महाराज को होने वाली सन्धि को तोड़ने से उत्पन्न संकट से अवगत कराया जाय तथा महाबाहु के प्रभाव को कम करने का प्रयत्न किया जाय । परन्तु महाबाहु ने प्रसंग बदलते हुए पूछा - "हूण राजदूत किस समय यहाँ से गया था ?"
"दो बजे दिन चढ़ने के बाद वह यहां से चला गया था । रात्रि को ही सन्धि-पत्र पर हस्ताक्षर हो गए थे, अतः सवेरे मैंने उस से मिलना उचित न समझा । न जाने क्यों मुझे उसके चेहरे से घृणा हो गई थी और भविष्य में भी मैं उनका मुंह देखना नहीं चाहता था", महाराज बोले ।
"उसका कारण यही था महाराज कि अन्तःकरण से आप उस सन्धि के विरुद्ध थे ।"
"तुम ठीक कहते हो महाबाहु ।"
सेनापति ने प्रसंग बदलने का प्रयत्न करते हुए कहा, "महाराज के अस्वस्थ होने का एक कारण यह भी था ।"
"बिल्कुल ठीक कहा, आपने सेनापति ।" महाबाहु ने उसकी बात का समर्थन करते हुए कहा, "महाराज ने सन्धि की शर्तों में अपने कर्त्तव्य, आत्मसम्मान और राष्ट्र का अहित देखा था । एक विवशता ने उन्हें हस्ताक्षर करने पर विवश कर दिया था जिसके फलस्वरूप उनकी आत्मा उन्हें धिक्कार रही थी और वे अशान्ति का अनुभव कर रहे थे ।"
कार्यदक्ष चोबदारों की टुकड़ी बड़ी शीघ्रता से सब सरदारों को एकत्रित कर लाई । उनके बैठने के लिए चौकियाँ लगा दीं गईं और शीघ्र ही सरदार आकर अपने-अपने स्थानों पर बैठने लगे ।
न जाने क्यों सेनापति और प्रधानमंत्री के हृदय किसी अज्ञात आशंका से धड़कने लगे । प्रधानमंत्री ने अपने आप को संयत रखते हुए सारी स्थिति को संभालने के लिए अपने आप को तैयार किया । उसने निश्चय किया कि कर्मचारियों के आने पर वह किसी को कुछ कहने का अवसर न देगा और सरदारों को अपने पूर्व निर्णय पर दृढ़ रहने के लिए प्रेरित करेगा । परन्तु महाबाहु ने इस बार उसे अवसर न दिया । अभी कुछ लोग आ रहे थे कि उसने पूर्ण उपस्थिति की चिन्ता किये बिना खड़े होकर अपना भाषण आरम्भ कर दिया ।
"मालव वीरो ! राष्ट्र और देश के रक्षको, एक राह पर चलते पथिक को महाराज की कृपा से आपके दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ है । आप में से कुछ लोग मुझे जानते हैं परन्तु कुछ लोगों के लिए मैं अब भी अपरिचित हूँ । यह मेरा सौभाग्य है कि आज मुझे आप से भी परिचित होने का स्वर्ण अवसर मिल रहा है ।
"महाराज मेरे तक्षशिला के सहपाठी हैं । उसी समय से हम आपस में घनिष्ठ मित्रों के समान एक दूसरे से व्यवहार करते आ रहे हैं । इस समय हूण आक्रान्ताओं ने भारत को पददलित कर रखा है, हमारी सभ्यता संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करने में यह लगे हुए हैं । हमारे देश की माताओं, बहनों को अपमानित किया जा रहा है । देश के आप्त पुरुषों के तपस्यारत शीश मस्तक से उड़ा दिये जाते हैं । सारा देश त्राहि-त्राहि मचा रहा है । मैं आप लोगों से उस पवित्र भूमि की रक्षा के लिए एक सूत्र में आबद्ध होकर युद्ध करने का प्रस्ताव लेकर आया हूं जिसके विषय में मैं समय मिलने पर अपने विचार प्रकट करूंगा ।"
सेनापति अब तक अपमान और झुंझलाहट को दबाये बैठा था परन्तु अब इस स्थिति को संभालना उसकी शक्ति से बाहर होता चला जा रहा था । उसके जोशीले सैनिक स्वभाव ने राजनीति, दूरदर्शिता, स्थान और अवसर की उपेक्षा कर दी । वह दरबारी अनुशासन को एक ओर रखते हुए महाबाहु के भाषण में हस्तक्षेप करता हुआ बोला –
"क्या मैं पूछ सकता हूं, अब जबकि मालव महाराज के साथ हूण सम्राट् की सन्धि हो चुकी है और तीर हाथ से निकल चुका है, हूण आक्रमणकारियों से युद्ध करके उन्हें पराजित करने के विषय में आपकी उच्च योजना क्या महत्व रखती है ? सन्धि होने के पश्चात् दोनों पक्ष आपस में मित्रता के सूत्र में बंध जाते हैं । हूण सम्राट् मेहरगुल अब हमारे राजराजेश्वर के राजनैतिक मित्र बन गए हैं । आपको अथवा किसी और को यह शोभा नहीं देता कि मालव महाराज के दरबार में उनके किसी सम्राट् मित्र के विरुद्ध घृणा अथवा युद्ध के विचार फैलाने का प्रयत्न करे । मैं महाराज से भी विनम्र प्रार्थना करूंगा कि परिस्थिति की नजाकत को समझें और केवल इस कारण कि वह ऐसा करके अपने एक अतिथि मित्र को प्रसन्न कर रहे हैं, दरबारी और राजनैतिक उलझनें उत्पन्न न होने दें ।"
भारी आवाज के साथ उसने अपना कथन समाप्त किया और आशा भरी दृष्टि से महाराज की ओर देखा ताकि सभा समाप्ति की घोषणा की जाय परन्तु सम्राट् की दृष्टि महाबाहु पर जा टिकी । महाबाहु खड़ा होकर बोला, "सेनापति महोदय ! हिन्दू-हूण मित्रता की वास्तविकता हमसे छुपी नहीं है । यदि सन्धि और मित्रता का पत्र हूणों को हिन्दुओं की ओर से मिलता तो वह अवश्य हमारे मित्र होते । आज हमारे मन पश्चाताप की आग में न जल रहे होते । इस बात को स्वप्न में भी नहीं सोचा जा सकता कि एक सच्चा भारतीय एक ऐसी जाति से मित्रता के लिए तैयार हो जायेगा जिसने हमारे देश को पराधीन करने का बीड़ा उठाया है, जिसने हमारे पवित्र स्थानों का अपमान किया है, हमारे भोले कृषकों को मौत के घाट उतारा है, हमारे मकान और फसलों को आग में जला डाला है । इस पर भी जब कि सन्धि पत्र पर हम हस्ताक्षर कर चुके हैं तथा तीर कमान से निकल चुका है, इस विषय में मैं आपको एक ऐसी योजना बताऊँगा जो कमान से निकले तीर को वापिस ला सकती है । मैं अपनी योजनाओं को आपके सम्मुख रखूंगा ताकि आपके हृदयों में जो निराशा की भावना घर कर गई है, उससे आप मुक्त हो सकें । परन्तु इससे पूर्व मैं महामंत्री जी से पूछना चाहता हूं कि वह कौन सी ऐसी विवशता थी जिससे बाधित होकर इस प्रकार की घृणास्पद तथा अपमानकारक शर्तों को माना गया ?"
"श्री महाबाहु !" प्रधानमंत्री, जिसके अंग क्रोध से फड़क रहे थे, आवेश से उत्तेजित होता हुआ बोला, "मैं अभी तक यही समझता था कि आप केवल महाराज के सहपाठी हैं और राह जाते इनसे मिलने चले आए हैं, इसीलिए आप की बातों को मैंने विशेष महत्व नहीं दिया क्योंकि मैं समझता था आप भी आम लोगों के समान अपना महत्त्व प्रदर्शित करने के लिए ऐसी बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं । परन्तु अब मैं अनुभव कर रहा हूं कि आप की बातों के पीछे कोई राजनैतिक षड्यन्त्र काम कर रहा है । आपको मालूम होना चाहिए कि इस राज्य का प्रधानमंत्री होने की स्थिति में मेरा कर्त्तव्य है कि ऐसा कोई कार्य न होने दूं जिससे मेरे राज्य में अशान्ति और अराजकता फैलने का डर हो । इसलिए मैं ऐसे किसी भी व्यक्ति के सामने जिस के आने का उद्देश्य हमारे सामने रहस्यमय है, उस समय की दरबार की स्थिति या राज्य की वास्तविक स्थिति का रहस्योद्घाटन करने को तैयार नहीं हूं । अपने राज्य की कोई भी कमजोरी अथवा मजबूरी एक अपरिचित को नहीं बताई जा सकती जिसके कारण हमें इन शर्तों को मानना पड़ा है ।"
महाबाहु बोला, "आपको यह सब कुछ कहने का अधिकार है परन्तु मैं इतना आप को विश्वास दिलाता हूँ कि मेरा उद्देश्य महान् है । उसको बताने के लिए मैं यहाँ आया था परन्तु अब तक न बताने का कारण केवल यही था ताकि मैं अपने उद्देश्य की सफलता के विषय में निर्णय कर सकूँ और जान सकूँ कि कोई ऐसी बाधा तो नहीं है जिसको मैं पार करने में असमर्थ रहूंगा । आप इस राज्य के सर्वोच्च पदाधिकारी हैं और सबसे अधिक राजनीतिज्ञ माने जाते हैं । परन्तु मैं भी थोड़ा-बहुत राजाओं के सम्पर्क में रहा हूँ और दरबारी शिष्टाचार और कूटनीति का अनुभव रखता हूँ । आपने सन्धि करने की विवशता को बताने से इन्कार कर दिया परन्तु मुझे पूर्ण विश्वास है कि थोड़ी देर बाद आप इस भेद को बताने के लिए विवश हो जायेंगे ।"
प्रधानमंत्री और सेनापति का यह प्रयत्न था कि महाबाहु के सम्मान को चोट पहुंचाई जाये परन्तु महाबाहु अपनी बातों में उन्हें इस तरह उलझा रहा था ताकि वह इस सन्धि के वास्तविक रहस्य को सब के सन्मुख प्रकट करने में समर्थ हो सके ।
मालवा राज्य के यह दोनों व्यक्ति अपनी कूटनीति और भाषण देने की कला में बहुत प्रसिद्ध माने जाते थे । इधर महाबाहु भी देश विदेश के भ्रमण के कारण बहुत ही चतुर हो गया था, विशेषकर मनोविज्ञान में उसकी पहुँच थी । इसलिए वह अपनी योग्यता की धाक सारे दरबार पर जमा रहा था और यह दोनों महापुरुष हतप्रभ होते दिखाई दे रहे थे । महाराज इसकी बातों को सुनने में इतने तल्लीन थे कि इन्हें राज्य के अपमान की बात भी याद नहीं रही । दरबार का वातावरण भी इस योग्य बन गया था कि महाराज को हर कोई स्वतन्त्र होकर अपनी बात कह सकता था ।
"माननीय अधिकारियो", महाबाहु बोला, "किन कारणों से सन्धि करने पर कोई राज्य विवश होता है यह जानना भी कोई कठिन नहीं परन्तु उस विवशता को दूर करने के उपाय भी हो सकते हैं । अपनी बुद्धि से जो कुछ मैं जान पाया हूँ उनमें मुख्यतः यही कारण हो सकते हैं । प्रथम कारण तो आप स्वयमेव सोच सकते हैं कि वहाँ का राजा या कर्मचारी कायर तथा युद्ध का नाम सुनकर घबराने वाले हों । परन्तु मैं इस बात पर विश्वास नहीं करता क्योंकि मालव अपनी वीरता और साहस के लिए प्रसिद्ध हैं, उनका इतिहास युद्धों से भरा पड़ा है । दूसरा कारण है कि हमें स्वाधीनता और पराधीनता के अन्तर का पता न हो, हम इस बात से अनभिज्ञ हों कि विजित जाति पराजित जाति पर कितने अमानुषिक, नारकीय अत्याचार करती है । परन्तु आप लोगों के समान बुद्धिमान्, कर्मशील तथा संसार के इतिहास का ज्ञान रखने वालों से ऐसी आशा नहीं की जा सकती । तीसरा कारण तभी संभव हो सकता है जब शत्रु के समक्ष युद्ध करने के लिए हमारे पास सेना की कमी हो और हमें विश्वास हो जाए कि मुट्ठी भर सैनिक शत्रुओं की बाढ़ को रोकने में असमर्थ होंगे । इसको दूर करने का उपाय तो मैं अभी आप लोगों को बताऊंगा परन्तु इसके न होते हुए भी इतना तो सब जानते हैं कि इसके लिए अधिक सेना भर्ती की जा सकती है । चौथा कारण यह भी हो सकता है कि राज्य के पास धन की कमी हो परन्तु उसके लिए देश के सेठों से धन लिया जा सकता है । युद्ध कर लगाये जा सकते हैं जिसे लोग अपनी स्वतन्त्रता, सम्मान और रक्षा के लिए सहर्ष दे सकते हैं । राजकुमारियों, रनिवास की रानियों तथा प्रजाजनों की स्त्रियों से उनके आभूषण मांगकर युद्ध व्यय को पूरा किया जा सकता है । जहाँ अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए हमारे पूर्वजों ने अपना तन, मन, धन बलिदान किया हो, जहाँ के स्त्री, पुरुषों और बच्चों ने जीवन का एक-एक कण मिटा देने से संकोच न किया हो उनकी रक्षा के लिए ऐसी कौन-सी प्रिय वस्तु है जिसने हमें यह अपमान-जनक कृत्य करने पर विवश कर दिया था । मैं नहीं जानता ऐसा कारण कौन सा है जिसे बताने में प्रधानमंत्री संकोच कर रहे हैं । इसलिए मैं आप सब उपस्थित सरदारों से पूछता हूं कि कल रात कौन सी ऐसी विवशता थी जिसने आपको अपने भाल पर कलंक का टीका लगाने पर विवश किया और सन्धि का प्रस्ताव मानने के लिए आपने अपना मत दे डाला ?"
सारा वातावरण स्तब्ध हो गया । प्रधानमंत्री और सेनापति निश्चय भी न कर पाये थे कि हमें क्या उत्तर देना है कि महाराज बोले, "मेरे प्रिय पदाधिकारियो, यह सभा मेरी आज्ञा से ही बुलाई गई है । प्रधानमंत्री और सेनापति इस के विरुद्ध थे । परन्तु मेरे प्रिय मित्र ने मुझे विश्वास दिलाया कि वह एक ऐसा मार्ग बनायेंगे जिससे हम इस प्रकार की अपमानित करने वाली शर्तों से छुटकारा पा जायें और अपनी स्वतन्त्रता को अक्षुण्ण रख सकें । अतः आज इस सभा में मैं आप सब को आज्ञा देता हूं कि आप में से जो भी चाहे स्वतन्त्रतापूर्वक अपने विचार रख सकता है और उन सब मजबूरियों को व्यक्त कर सकता है जिसके कारण उन को सन्धि के लिए हां करनी पड़ी थी । मैं आपको अभयदान देता हूँ । किसी बड़े से बड़े व्यक्ति ने भी अगर आप पर किसी प्रकार का दबाव डाला है तथा ऐसा करने पर विवश किया है तो उसका नाम बताया जाये ।"
दरबार में होते हुए परिवर्तन को देखकर प्रधानमंत्री ने एक बार फिर प्रयत्न किया कि वह सब पर अपना प्रभावशाली अंकुश रख सके । उसने कहा, "महाबाहु, बातों द्वारा यह सब हल निकालने बहुत सहज हैं, वास्तविक स्थिति आ पड़ने पर उनसे जूझना और बात है । कोषाध्यक्ष कहते हैं कि मेरे पास दो हाथियों के खाने लायक भोजन भी नहीं है । छः मास से वेतन न मिल पाने के कारण सैनिक विद्रोह करने पर उतारू हैं । मैं आपको यह सब कुछ बताने में पहले ही संकोच न करता । राजसिंहासन का अनन्य भक्त होते हुए राज्य की इस कमजोरी को आपके सामने प्रकट करना मैंने उचित नहीं समझा ।"
धीमे से द्वार का परदा हटा और रक्षक सैनिकों का अधिकारी अपना सिर अन्दर कर नम्रता से बोला, "यदि आज्ञा हो तो मैं कुछ निवेदन करूँ ।"
"अवश्य कहो" महाराज ने कहा ।
"मैं प्रधानमंत्री के उन आरोपों का खण्डन करता हूँ जो उन्होंने सैनिकों पर यह कहकर लगाए हैं कि वह वेतन न मिलने के कारण विद्रोह पर उतारू हो गए हैं । यह सच है कि उन्हें कई मास का वेतन नहीं मिला परन्तु एक विदेशी आक्रमणकारी से युद्ध करके अपने देश की रक्षा करने के लिए उन्होंने कभी विरोध नहीं किया । हमारा प्रत्येक सैनिक हूणों का शत्रु है और उनसे टक्कर लेना अपना धर्म समझता है । यही कारण था कि आज प्रातः इस सन्धि की बातें सुनकर वे क्षुब्ध हो उठे और उन्होंने हूण दूत की गाड़ी को रोकने के लिए रास्ते की सड़क तोड़ दी थी और भोजन तक न किया था ।"
प्रधानमंत्री ने थूक निगलने का प्रयत्न किया, फिर अपनी आँखों से अधिकारी को धमकाता हुआ बोला, "मैं नहीं जानता यह अधिकारी कौन है । सेनापति ही इसके चाल-चलन के विषय में कुछ बता सकते हैं । परन्तु इतना मैं अवश्य कहूंगा कि यह व्यक्ति झूठ बोल रहा है । इसके अन्तर में क्या है, मैं नहीं कह सकता ।"
तम्बुओं के दूसरे द्वार से जिधर से रनवास का मार्ग था, एक वृद्धा ने राजदरबार में प्रवेश किया । प्रधानमन्त्री और सेनापति के चेहरों का रंग उड़ने लगा । "क्यों, क्या बात है ?" महाराज ने उसके अनुचित प्रवेश को बुरा मानते हुए पूछा ।
भय से काँपती हुई वह वृद्धा बोली, "महाराज, अपराध क्षमा हो ! कल जब हम कूच करते हुए इस पड़ाव की ओर आ रहे थे तो रनवास के रक्षक सैनिकों की टुकड़ी के साथ एक पदाधिकारी जिसका बाद में पता चला कि वह हमारा सेनापति था, छोटी महारानी की पालकी के साथ इस प्रकार चल रहा था जैसे उसकी नीयत अच्छी न हो । कल रात सन्धि की सभा के कारण आप रनवास में नहीं गए इसलिए महारानी जी आप को बता नहीं सकी । उन्होंने मुझे आपको यह बताने के लिए भेजा था परन्तु मैं आपका स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण आने का साहस न कर सकी । अब पुनः महारानी ने मुझे आप को सूचित करने के लिए भेजा है ।"
महाराज की आंखें क्रोध से जलने लगीं, उन्होंने गर्जती आवाज में कहा, "सेनापति, क्या यह बात सत्य है ?"
सेनापति का चेहरा भय से सफेद हो गया, वह कांपता हुआ बोला, "महाराज, यह आक्षेप बिल्कुल निराधार है । मैं नहीं समझ सका ऐसा जघन्य अपराध मुझ पर क्यों थोंपा जा रहा है । या तो यह बुढ़िया ठीक सन्देश लेकर नहीं आई अथवा इस सैनिक अधिकारी ने मुझे भरी सभा में लज्जित करने के लिए कोई षड्यन्त्र रचा है क्योंकि अभी-अभी वह प्रधानमंत्री पर भी इस प्रकार का दोषारोपण करके हटा है ।"
प्रधानमंत्री अपने आसन से उठ खड़ा हुआ जैसे वह इस स्थान पर देर तक ठहरना उचित नहीं समझता था । वह बोला, "महाराज, मैं और सेनापति आपका कुशलक्षेम पूछने आए थे । हमें आशा न थी कि आपका मित्र और अन्य सभासद हमें अपमानित करने का प्रयत्न करेंगे ।"
दरबारी गुप्तचर अपने स्थान पर खड़ा होकर कुछ बोलना ही चाहता था परन्तु प्रधानमंत्री ने उसे बोलने का अवसर न देकर कहा "तुम श्रीकान्त ! तुम भी षड्यंत्र में शामिल हो, जिसकी मुझे पूर्ण आशा थी क्योंकि तुम्हारे पिता न्यायशास्त्री का मैंने हमेशा विरोध किया है । उनके भ्रष्टाचार के लिए मैं हमेशा उन्हें टोकता रहा हूँ ।"
पदाधिकारियों की पंक्ति में बैठा न्यायशास्त्री खड़ा होकर बोला, "इसके प्रति महाराज स्वयमेव जानते हैं । मुझे प्रतिरोध करने की कोई आवश्यकता नहीं ।"
महाराज ने कहा, "श्रीकान्त, तुम क्या कहना चाहते थे ?"
"महाराज" श्रीकान्त थूक को सिटकता हुआ बोला, "परसों रात मैं घूमता हुआ महामन्त्री के तम्बू के पास से गुजरा तो मुझे सेनापति की आवाज सुनाई दी ।"
"जो कुछ तुमने सुना श्रीकान्त, उसे निर्भय होकर कहो ।"
श्रीकान्त बोला - सेनापति प्रधानमंत्री से कह रहा था, "तुम कहते हो कि तुम महाराज बन गए तो मुझे प्रधानमंत्रित्व का पद दोगे परन्तु मैं वह कुछ नहीं चाहता, मुझे तो महाराज के ...... जिसके विरह में तड़प-तड़प कर मैं प्राण दे रहा हूँ ।" मैं समझ नहीं सका इनका संकेत किधर है । मुझे इतना अवश्य पता चल गया कि दोनों अधिकारी मदिरापान से उन्मत्त हो रहे हैं । इसलिए अपने कर्त्तव्य के नाते मैंने अपने गुप्तचर इनके पीछे लगा दिये । इस के बाद जो सूचना मुझे मिली है उसे सुनकर मैंने दाँतों तले अपनी जीभ दबा ली .....।"
"क्या सूचना थी ?"
"गुप्तचर की सूचना थी कि हूण दूत के यहाँ आने से पूर्व प्रधानमंत्री और वह दूत यहाँ से दो कोस दूर एक वन में मिले थे । उसने प्रधानमन्त्री को एक पत्र दिया था । आज जब प्रधानमंत्री आपको मिलने आये थे उस समय वह पत्र उन्होंने अपने अंगरखे की जेब में रखा था ।"
महाराज प्रधानमंत्री को बीच में ही टोकते हुए बोले, "अच्छा हो कि तुम उस पत्र को मुझे दे दो ।"
"परन्तु महाराज, यदि ऐसा कोई पत्र हो तभी तो वह आपके सामने उपस्थित किया जाए ।"
"तो तुम्हें अपनी सच्चाई और राजभक्ति सिद्ध करने के लिए अपनी तलाशी दे देनी चाहिए । यदि वह पत्र तुम्हारे पास न निकला तो भगवान् की शपथ, मैं श्रीकान्त की गर्दन उड़ा दूंगा जिसने मेरे राज्य के प्रधानमंत्री पर इस प्रकार का झूठा आरोप लगाया है ।"
"तलाशी ! क्या मालवा का दरबार इतना गिर गया है कि उसके प्रधानमंत्री और सेनापति की सबके सामने तलाशी ली जायेगी ? क्या आपके यहाँ आजीवन सेवा करने का यही विधान लिखा है ? मैं एक सम्मानित व्यक्ति हूँ, इससे तो यही अच्छा है कि आप मेरा त्यागपत्र ले लेते ।"
महाबाहु अपने स्थान से उठा और प्रधानमंत्री तथा सेनापति पर लगाये आरोपों की श्रंखला बनाता हुआ बोला, "जो कुछ अब मैं आप लोगों के सन्मुख कहने लगा हूं उस पर आप पूर्ण ध्यान दें । मालवा राज्य और महाराज को जिन लोगों ने हानि पहुँचाने का प्रयत्न किया है, वह यही दोनों व्यक्ति हैं । बदनाम और निकम्मे अधिकारियों की एक टोली इनको पूरी तरह सहयोग दे रही है, जो समय आने पर आप सब के सामने प्रकट हो जाएगी । आपके सेनापति तथा इनके छोटे भाई ने, जो सेनानायक के पद पर काम कर रहे थे, अपना सारा जीवन दुराचार में ही व्यतीत किया है जिसका प्रमाण मैं आपको बताने लगा हूँ । आज से एक सप्ताह पूर्व इनके छोटे भाई एक सम्बंधी के विवाह में सम्मिलित होने के लिए एक गाँव में गए थे । वहीं मगध सम्राट् का एक अधिकारी जिसका नाम शशिविक्रम था, वह भी आया हुआ था । ये दोनों एक अतिथि की कन्या पर आसक्त हो गए, परन्तु उसी रात हूणों ने उस गाँव पर आक्रमण कर दिया और दूसरे लोगों के साथ उस लड़की को भी ले गए । उसकी तलाश में ये दोनों हूणों के जाल में फंस गए । हूणों ने उन दोनों की खालें उतरवाकर उन्हें अपनी टिकटिकियों पर उल्टा लटका दिया । भाग्यवशात् हम लोग वहाँ पहुंच गए और इन दोनों को बचा लाए । इनमें से शशि की तो चिकित्सा हो रही है परन्तु आप लोगों का सेनानायक गाँव की एक धर्मशाला में अधमरे कुत्ते की तरह पड़ा हुआ सिसक रहा है । इधर आपके सेनापति इतने गिरे हुए निकले कि महाराज से विश्वासघात करके देश के साथ ही द्रोह करने में लगे हुए हैं । इन्होंने न केवल राज्य के साथ ही द्रोह किया अपितु आपके कई सेनापतियों की इज्जत पर भी डाका डाला है और अब अपने स्वामी और आप लोगों के महाराज के सम्मान पर भी हाथ डालने का प्रयत्न करने लगे हैं ।"
"प्रधानमंत्री के बारे में तो आप अपने राज्य के गुप्तचर से पूरी तरह सब कुछ जान ही चुके हैं कि किस प्रकार वह महाराज का वध करके स्वयं गद्दी का स्वामी बनना चाहता है । यद्यपि इनके कुचक्रों का सारा ब्यौरा प्रकट नहीं हुआ है परन्तु इनका केवल यही अपराध अक्षम्य है कि यह बिना महाराज को पता दिये हूण दूत से एकान्त वन में मिला है और यहाँ के वातावरण को ऐसा बनाने का प्रयत्न किया है जिससे ऐसी सन्धि की ऐसी घृणित शर्तों पर हस्ताक्षर कराये जायें ।"
"इससे सिद्ध होता है कि दोनों प्रमुख अधिकारियों ने न केवल राज्य के साथ द्रोह किया है अपितु देश की स्वतन्त्रता को भी बेचने का प्रयत्न किया है और वर्षों से चली आ रही मालवा की प्रतिष्ठा को धूल में मिला दिया है ।"
महाराज क्षण भर मौन बैठे रहे । सारी सभा दोनों को घृणाभरी दृष्टि से देख रही थी । इस व्याकुल स्थिति को तोड़ते हुए वह बोले, "प्रधानमंत्री, तुम्हारे लिए उचित है कि तुम अपनी तलाशी देकर अपराध को स्वीकार कर लो ताकि अपने विरुद्ध उठे आरोपों से तुम्हारी रक्षा हो सके अन्यथा .....।"
प्रधानमंत्री गर्दन नीचे किये अपने स्थान पर बैठा रहा । उसने जरा भी हिलने-जुलने का प्रयत्न न किया ।
"तो रक्षकगण !" महाराज बोले, "इन दोनों के शस्त्र ले लो । सिरों पर धारण की हुई पगड़ियां, रत्नजड़ित अंगूठियां तथा गले में लटकती मालायें उतार लो ताकि मैं स्वयमेव इनकी तलाशी लूं । यदि वह पत्र इनके पास से न निकला तो यह आभूषण और शस्त्र इनको वापिस कर दिये जाएंगे अन्यथा इनके हाथों और पांवों में बेड़ियाँ डालकर इन्हें कारागार में डाल दिया जायेगा ।"
तलाशी लेने पर प्रधानमंत्री के पास से दो वस्तुएँ मिलीं - एक पत्र तथा दूसरी एक पुड़िया जिसमें मटियाले रंग का कोई चूर्ण था ।
महाराज ने पुड़िया राजवैद्य को देते हुए कहा, "इस चूर्ण का पता लगाओ कि यह क्या है ?"
महाराज ने पत्र पढ़ना शुरू किया, "तुम्हारे चर ने तुम्हारी मोहर लगी चिट्ठी हमें दी । यदि तुम ऐसा कर सको तो हम तुम्हें मालव का राजा स्वीकार करेंगे । इस समय हम मगध पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहे हैं । हम चाहते हैं कि जब तक तुम अपना काम पूरा न कर लो, महाराज से हमारी सन्धि करवा लो । सुना है कि तुम्हारे महाराज की पुत्री बड़ी सुन्दर है । उसका हमारे अन्तःपुर में पहुंचना अत्यावश्यक है, और भी भेंट में कुछ सुन्दरियाँ आनी अनिवार्य हैं । इसके अतिरिक्त बहुमूल्य हीरे जवाहरातों की भेंट भी आनी चाहिए अन्यथा अपने महाराज को जता देना कि हम शर्त न मानने पर मगध से पहले मालवा को ही नष्ट करने के लिए आक्रमण कर देंगे और इस राज्य की ईंट से ईंट बजा देंगे । यह सब बातें सन्धि-पत्र में भी लिख कर भेज रहे हैं । तुम बड़े समझदार मन्त्री हो । तुम्हारे काम का हम उचित पुरस्कार देंगे और तुम्हें हमारी ठोस सुरक्षा मिलेगी ।"
महाराज की क्रोधित दृष्टि मन्त्री पर पड़ी और प्रधानमंत्री ने झुक कर महाराज के पाँव पकड़ लिये । दया ! दया !! अन्नदाता !!! मुझ से बड़ा भारी अपराध हुआ है, मुझे क्षमा करें महाराज ।"
महाराज ने जोर की लात प्रधानमंत्री की छाती में मारी जिसकी चोट से लुढककर वह राजवैद्य के चरणों में जा गिरा । गिरने से सम्भलता हुआ राजवैद्य बोला, "संखिया है महाराज !"
"लाइये ! इसे मुझे दीजिए", महाबाहु ने हाथ बढ़ाकर वैद्य के हाथ से वह पुड़िया ले ली और उसे देखकर बोला, "इस पुड़िया की सलवटों से पता लगता है जैसे इसमें से कुछ चूर्ण निकाला गया है । इसका अभिप्राय है किसी को मारने के लिए इसका प्रयोग किया जा चुका है । इस प्रकार की हत्या दो कारणों से संभव है - या तो अपने किसी शत्रु को नष्ट करने के लिए अथवा किसी ऐसे व्यक्ति को मारने के लिए जिससे बहुत बड़े लाभ की संभावना हो । प्रधानमंत्री राज्य के सबसे बड़े अधिकारी हैं । इनका शत्रु कौन हो सकता है अथवा किसकी हत्या का इन्हें लाभ हो सकता है ? पत्र से जो संकेत मिलता है उससे हम भली-भांति जान सकते हैं कि मन्त्री का उद्देश्य किसके लिए था ।"
"ओ मेरे राम !" श्रीकान्त घबराकर बोला, "महाराज, क्या आपने भोजन कर लिया है ?"
"नहीं, भोजन तो वैसे ही पड़ा है । मन ठीक न होने से मैंने उसे छुआ तक भी नहीं ।"
"तो दीजिए, मैं उसकी परीक्षा करना चाहता हूँ ।"
श्रीकान्त ने रेशमी कपड़े में ढका भोजन का थाल उठाया, तभी सेनापति भय से चीख कर गिर पड़ा ।
महाराज ने सैनिक अधिकारी को आज्ञा दी, "इन दोनों को बन्दी बनाकर कारागार में डाल दो और विश्वस्त कर्मचारियों को इनकी देख-रेख के लिए नियुक्त कर दो ताकि ये कहीं भाग नहीं सकें ।"
जब दोनों बन्दी सभा-स्थल से चले गए, महाराज ने महाबाहु का धन्यवाद करते हुए कहा, "मेरे प्रिय मित्र, आज तुम्हारे प्रयत्न से मेरे प्राणों की रक्षा हो गई है । अगर तुम एक रात पूर्व आ गए होते, मालवा के सम्मान की रक्षा भी हो जाती ।"
"अब भी कुछ चिन्ता नहीं महाराज ! प्रभु ने चाहा तो वह अब भी बच जायेगी ।" अब महाबाहु सबको सम्बोधित करता हुआ बोला, "प्रभु की कृपा से हम उस बिगड़ी स्थिति को फिर से बना लेंगे जिसे कुछ राज्यद्रोहियों ने उत्पन्न कर दिया था । मेरे पास समय थोड़ा है । अतः संक्षेप में मैं आप को सहर्ष सूचित कर रहा हूँ कि दैवयोग से मैंने और मेरे दो साथी रुद्रदत्त और धूमकेतु ने मगध सम्राट् नरसिंह बालादित्य को हूणों के पंजे से बचाने का सौभाग्य प्राप्त किया है तथा देश की दुर्दशा का वर्णन कर उन्हें इस बात के लिए तैयार कर लिया है कि वे मालव और चालुक्यों के साथ अपने पुराने वैमनस्य को भुलाकर हूणों के विरुद्ध एक झण्डे के नीचे युद्ध करने के लिए तैयार हों । अब तक मगध की सेनायें अपने स्थान से कूच कर चुकी हैं । रास्ते में पड़ी हूणों की चौकियों को नष्ट-भ्रष्ट करती वे इधर आ रही हैं और एक निश्चित स्थान पर वे चालुक्यों और मालवा की सेनाओं की प्रतीक्षा करेंगीं । इसके अतिरिक्त हूणों के अत्याचारों से अपमानित हुए कुछ सन्यासियों और भिक्षुओं की टोली गाँव-गाँव, नगर-नगर घूमती हुई जनता को उत्तेजित करती इधर आ रही हैं । धूमकेतु और अन्य व्यक्ति जनता के नवयुवकों को शस्त्रास्त्र की शिक्षा देते हुए, छापेमार टोलियों के रूप में एक-एक सैनिक गढ़ बनाते चले आ रहे हैं । अब एक क्षण की देर किए बिना आपको अपनी सेनाओं को तैयार होने की आज्ञा देनी चाहिए और युद्ध के लिए जो सामान आवश्यक है, उसको एकत्रित करना चाहिए । आपके कथनानुसार हूण राजदूत दो घड़ी दिन चढ़े यहाँ से चला है । यदि वह पूरी तेजी से नहीं जा रहा है तो उसने अधिक से अधिक बीस कोस का मार्ग तय किया होगा । स्यालकोट को यहाँ से सीधी सड़क जाती है । यदि मुझे अच्छा रथ और घोड़े मिल जायें तो मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैं उसे मार्ग में ही पकड़ लूँगा और स्यालकोट पहुंचने नहीं दूंगा ।"
"महाबाहु !" प्रसन्न्ता के आवेश में महाराज बोले, "भाग्य की रेखाओं की बागडोर थामे तुम आए दिखाई देते हो । मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि तुम जो भी समझो, करो और युद्ध के खर्च के लिए ....।"
महाराज उठे और अपने सन्दूक में से अपना मुकुट और मालायें निकाल लाये और उन्हें सभास्थल के मध्य में रखते हुए बोले, "मेरी यह वस्तुयें युद्ध के खर्च के लिए रख लीजिए । जब देश-रक्षा के लिए अपना शरीर तक बलिदान करने की प्रतिज्ञा कर ली है, तब यह आभूषण किस योग्य हैं ?"
रनिवास का पर्दा हिला और अनेक कोमल हाथों से उतरे आभूषण फर्श पर गिरने लगे । कर्मचारियों ने जब यह दृश्य देखा तो उनकी देशभक्ति की भावना को देखकर उन्होंने भी अपने आभूषणों को उतारकर देशार्पण करना आरम्भ कर दिया ।
"राजाधिराज", महाबाहु बोला, "देश सेवा के लिए किसी ने इन्हें अभी तक प्रेरित ही नहीं किया था । नहीं तो यह कैसे सम्भव हो सकता था कि ये लोग जो वास्तव में सच्चे स्वामिभक्त और राष्ट्रभक्त हैं, मां भारती की पुकार न सुनते ! आपने कहा था किसी भी कर्मचारी ने युद्ध के लिए आपको प्रोत्साहन नहीं दिया । अब भी वही लोग बैठे हुए हैं । इनमें से कौन अपने और देश के सम्मान के लिये मर-मिटने के लिए तैयार दिखाई नहीं देता ?"
पदाधिकारी बारी-बारी से उठकर कहने लगे, "महाराज, हमें प्रधानमंत्री ने भ्रम में रखा था और स्वतन्त्रतापूर्वक अपना मत व्यक्त करने की स्वतन्त्रता नहीं दी थी ।"
महाबाहु ने अपनी प्रसन्नता को रोकते हुए कहा, "ठीक है, परन्तु अब जब कि वह स्थिति नहीं रही, आप लोगों को धोखे में रखने वाले उचित दंड पा चुके हैं । अब आप को अपने कर्त्तव्य को समझकर देश की रक्षा के लिए अपने रक्त की अंतिम बूंद तक दे देनी चाहिये । इसलिए आप सब लोग युद्ध की तैयारी करो । महाराज की आज्ञानुसार मैं उचित समझता हूँ कि जब तक युद्ध चलता है, प्रधान मन्त्रित्व का भार न्यायशास्त्री जी सम्भालेंगे तथा सेनापति का भार यह सैनिक अधिकारी अपने हाथ में ले लेगा जिसने अभी खड़े होकर सन्धि के बारे में सेना के सिपाहियों के रोष की सूचना दी थी ।"
"मगध, चालुक्य और मालवा की सेनाओं की एकत्रित बागडोर को श्री रुद्रदत्त संभालेंगे जो हमारी सेनाओं के निश्चित स्थान पर पहुंचने तक पहुंच जायेंगे । मैं नए सेनापति से प्रार्थना करता हूं कि वे एक सुन्दर रथ में तेज दौड़ने वाले घोड़ों को जुतवा दें और उसे शीघ्रातिशीघ्र बस्ती से बाहर जाने वाले मार्ग पर खड़ा करें ।"
महाबाहु ने आगे पूछा, "क्या अश्वशाला के प्रबंधक यहीं हैं ?"
"हाँ महाराज !" अश्वशाला के अधिपति ने कहा और खड़ा होकर बोला, "मेरे लिए क्या आज्ञा है?"
"कृपया मुझे दो ऐसी घोड़ियों के पास ले चलिए जो मदमत्त हों । और वैद्यजी, आप भी मेरे साथ आइये तथा कुछ औषधियां मुझे अपने औषधालय में से दीजिए ।"
अश्वशाला के अधिकारी और राजवैद्य के साथ तम्बू से बाहर निकलते हुए महाबाहु ने गर्दन पीछे मोड़ते हुए कहा, "मन्त्री जी, आप सभा विसर्जित कीजिए । महाराज को मेरे साथ चलना है । कृपया आप भी शीघ्र तैयार हो जाइये ।"
चार शस्त्रधारी सैनिकों को लेकर महाराज रथ पर बैठ गए । अश्वशाला के अधिकारी महाबाहु का संकेत पाकर राजवैद्य से एक तैल लेकर घोड़े को मालिश करने लगे । महाबाहु ने रथ का अच्छी तरह निरीक्षण किया, तत्पश्चात् अपनी जेब से एक डिबिया निकालकर उसको खोला और एक चूर्ण सा निकाल कर उसने घोड़ों के नथनों पर मला । घोड़े एक बार जोर से हिनहिनाए ।
रथ में बैठे महाराज ने कहा, "महाबाहु, लगता है आज तुम तक्षशिला की विद्या को सार्थक करने का प्रयत्न कर रहे हो ।"
"हाँ महाराज, जो रथ चलाने की विद्या सीखी थी, यदि आज ही वह काम न आई तो उस का लाभ ही क्या ? मेरी यह औषधि इनमें कबूतरियों की तरह उड़ने वाली शक्ति भर देगी । इसमें कोई सन्देह नहीं, यह घोड़े अपनी मंजिल पर पहुँचने के बाद जीवित नहीं बचेंगे । परन्तु इनका मुकाबला करने की शक्ति किसी जीवित प्राणी में नहीं मिल सकती ।"
"वास्तव में तुम महान् हो महाबाहु !"
"ऐसा नहीं महाराज ! मैं तो केवल देश का एक मामूली-सा सैनिक हूँ । परन्तु मुझे दुःख इसी बात का है कि आप इतने नादान किस तरह बने रहे । इतने बड़े राज्य की बागडोर आपके हाथों में थी जिसके लिए आप का सतर्क होना नितान्त आवश्यक था ।"
वह कटाक्ष महाराज के हृदय में तीर के समान चुभ गया । उनकी खोई हुई शक्तियाँ एकदम सजग हो उठीं ।
नए प्रधानमंत्री और सेनापति ने आकर सूचना दी कि कल की तोड़ी सड़क का सैनिकों ने पुनः निर्माण कर दिया है ।
महाबाहु ने अपनी पगड़ी पर गले का कपड़ा जोर से कसा और घोड़ों की रासें थामकर रथ पर जा बैठा ।
महाराज ने अपने कर्मचारियों को आदेश दिया, "पीछे से विद्रोही कर्मचारियों की कड़ी निगरानी रखी जाय ।"
चलने के लिए व्याकुल घोड़ों पर महाबाहु का चाबुक लगते ही वह हवा में बातें करने लगे । उत्तर में दोनों अधिकारियों के शब्द न जाने कहां विलीन हो गये ।
रथ की छत पर लगे ध्वज फहराने लगे और रथ की घंटियां टनाटन कर बजने लगीं । महाराज का कपड़ा इतनी जोर से फड़फड़ाने लगा मानो अभी उड़कर बाहर जा गिरेगा । सैनिकों ने किनारे के पर्दे खोलकर बाँध दिये । डाक की पहली चौकी बारह कोस पर स्थित थी । वहाँ पर घोड़े खड़े रहने के लिए महाबाहु ने घोड़ों की गति धीमी की । दूर से आती रथ की घंटियों की आवाज सुनकर चौकी के सैनिक अधिकारी ने बाहर आकर देखा । राजध्वज वाले रथ को देखकर उसने अपने सैनिकों को दो घोड़े लाने की आज्ञा दी और आप मार्ग में जाकर खड़ा हो गया । रथ के आते ही सब सैनिकों ने महाराज को सैनिक अभिवादन किया ।
महाबाहु बोला, "हमें घोड़ों की आवश्यकता नहीं । तुम हमें बताओ कि हूण राजदूत का रथ किस समय यहाँ से गया है ।"
"श्रीमान्, उन्हें गए तो एक पहर से अधिक समय हो गया है ।"
"वह किस गति से जा रहा था ?"
"वह बहुत तेज जा रहा था । मालूम होता था मानो वह अपने घोड़ों के प्राण ही लेकर छोड़ेगा । यदि राज्य कर्मचारी साथ न होता तो हम कभी भी उसके घोड़ों को न बदलते ।"
महाबाहु ने अपने घोड़ों को झटका दिया और वे फिर हवा से बातें करने लगे । चौकी के अधिकारी और साथियों ने आश्चर्यचकित होकर देखा और आपस में बातें करने लगे ।
"इस प्रकार हूण दूत का पीछा किसी विशेष उद्देश्य से ही किया जा रहा दिखाई देता है ।"
"महाराज आप भी रथ में विराजमान थे ।"
"परन्तु यह रथ चलाने वाला कौन था ?"
महाराज ने और उनके चारों सैनिकों ने अपने जीवन में इतनी तेजी से दौड़ता हुआ रथ नहीं देखा था । पृथ्वी पर चलने वाले घोड़े छः सवारियों वाले रथ को इतनी द्रुत गति से ले उड़ेंगे, ऐसी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी । ऐसा लगता था जैसे घोड़ों पर पागलपन सवार है, जैसे वह अपनी थकावट को भूलकर अपने लक्ष्य स्थान को शीघ्रातिशीघ्र पा लेने को व्याकुल होकर उड़ते चले जाते हैं ।
रथ हवा को चीरता, लम्बे रास्ते को पीछे छोड़ता, भागता जा रहा था । महाबाहु पत्थर के समान दृढ़ अपने स्थान पर स्थिर बैठा था । हूण राजदूत को पकड़ने की व्याकुलता, उसके हाथों में थमी रासों की गति घोड़ों को उत्तेजित कर रही थी और उसके हृदय की धड़कनें घोड़ों की टापों से ताल मिला रहीं थीं ।
महाराज ने अपने स्थान से आवाज दी, "देखना महाबाहु, इतने वेग से कहीं घोड़ों की छाती ही न फट जाय ।"
रथ के चक्रों की ध्वनि और वायुवेग के कारण महाराज का वह स्वर वायुमंडल में विलीन हो गया, जिसे महाबाहु सुन भी न सका । थोड़ी देर में दूसरी चौकी भी पीछे छूट गई । महाबाहु जोर से बोला, "आगे एक तिराहा आयेगा । उनमें से एक छोटा मार्ग है, परन्तु थोड़ा टूटा फूटा है । दूसरी एक ग्रामीण पगडंडी है जिससे हो कर भी रथ को ले जाया जा सकता है । तीसरी यह सड़क है जिस पर हम जा रहे हैं । बताइये, कौन सा मार्ग पकड़ा जाय ?"
महाराज बोले, "इस तिराहे से पूर्व एक डाक की चौकी भी आएगी । क्यों न वहाँ ठहर कर पूछ लिया जाय ?"
नहीं, अब रुका नहीं जा सकता क्योंकि घोड़ों के पट्ठे बड़ी बुरी तरह गर्म हो चुके हैं । यदि इन्हें रोका तो वहीं पर दम तोड़ देंगे ।"
"तो सीधी सड़क से ही चलो ।"
"ठीक है ।"
तीन उजड़ी बस्तियाँ एक के बाद एक करके पीछे रह गईं । एक जलती झोंपड़ी के पास से उनका रथ सपाट से निकल गया । सड़क पर किसी बैल की लाश पर इकट्ठे गिद्धों की टोली रथ की आवाज सुनकर चौंकी और उड़कर थोड़ी दूर जाकर बैठ गई । सूर्य अस्ताचल को प्रयाण कर गया । साए लम्बे होकर बढ़ने लगे । सायं के झुटपुटे में उड़ता हुआ एक मच्छर महाबाहु की आंखों में आ गिरा । "दुष्टो!" महाबाहु बड़बड़ाया, "तुम्हें भी आज ही समय मिला था मुझे अंधा बनाने का" कहते हुए महाबाहु का हाथ आँखों को मलने लगा ताकि वह मच्छर निकल जाय । पूर्णिमा का चाँद वृक्षों के पीछे से निकलता दिखाई दिया । सारा वातावरण मुखरित हो उठा ।
"मेरा विचार है आधी रात तक हम उन्हें पकड़ लेंगे ।" पीछे से महाराज ने पूछा ।
"हां ! शायद !! भगवान् ने चाहा तो हम शीघ्र ही अपने कार्य में सफल होंगे ।"
परन्तु आधी रात्रि से पहले ही उन्हें दूर धूल की रेत का बवंडर उड़ता हुआ दिखाई दिया ।
"महाबाहु, वह सामने देखो, क्या रथ का ध्वज दिखाई देता है ?"
"जी हाँ !" सैनिकों ने भी रथ से सिर बाहर निकाल कर चन्द्रमा के प्रकाश में देखा । परन्तु ऐसा दिखाई देने लगा मानो हूण दूत ने अपने रथ को और भी अधिक तेज कर दिया है । इधर महाबाहु ने अपने घोड़ों की बागें झटकीं, घोड़े और भी तेजी से दौड़ने लगे । हूण दूत ने जब देखा कि पीछे से एक रथ बड़ी तेजी से बढ़ता चला आ रहा है तो उसने भी अपने घोड़ों को ताबड़तोड़ मारना आरम्भ कर दिया ताकि वह और भी जोर से भागने लगें । महाबाहु के घोड़े चालीस कोस की यात्रा के बाद बिल्कुल बेदम हो चुके थे जब कि हूण दूत के घोड़े अभी पिछली चौकी पर ही बदले गए थे । चाबुक की मार पड़ते ही वे हवा में बातें करने लगे और धीरे-धीरे महाबाहु तथा उसके रथ का अन्तर बढ़ने लगा ।
"क्या बात है ?"
"कुछ नहीं !" महाबाहु ने अपने घोड़े की बागें फिर झटकीं और कोड़ हाथ में पकड़ लिया ।
"अब बचकर न जा सके महाबाहु !"
"अब नहीं बचेगा महाराज ।" महाबाहु बोला और उसने तीन चार घोड़ों पर गाड़ी .............................. ................ .................. ......... ............. अन्तर कम होना शुरू हो गया । शीघ्र ही महाबाहु का रथ धूल के बादल को चीरता हुआ हूण दूत के साथ दौड़ने लगा ।
महाबाहु हूण से ऊंचे स्वर में बोला, "घोड़ों को रोको, अन्यथा बाण मारकर दोनों घोड़ों को मार डालूंगा ।"
"रथ नहीं रुकेगा, तुम कौन हो रथ रोकने वाले ?"
अन्दर से मालव कर्मचारी ने सिर बाहर निकाल कर कहा, "हम मालवराज का आवश्यक सन्देश लेकर जा रहे हैं ।"
महाराज ने परदा उठाकर अपने कर्मचारी को आज्ञा दी, "मैं तुमसे कह रहा हूं रथ रुकवा लो । क्या तुम्हें राज्यध्वज लगा हुआ दिखाई नहीं देता ?"
"सन्धि-पत्र तुम्हारे पास है अथवा हूण के पास ?" महाराज ने अपने विस्मित तथा आश्चर्यचकित कर्मचारी से पूछा ।
"मेरे पास है महाराज ।"
"तो हम अपना रथ तुम्हारे पास लाते हैं, तुम इस पर कूद आओ ।"
महाबाहु अपने रथ को हूण दूत के रथ के साथ-साथ दौड़ाने लगा परन्तु मालव कर्मचारी अब भी कूदने से डर रहा था, शायद गिर पड़ने की सम्भावना से कुछ निश्चय न कर पा सकने के कारण ।
"कूद आओ" महाराज क्रोध से गरजे, "नहीं तो याद रखो मेरे सैनिक तुम्हें बाणों से मार देंगे और यहाँ से लौटकर मैं तुम्हारे सारे परिवार को सूली पर चढ़वा दूँगा । सिपाहियों ने अपने बाण धनुषों पर खींच लिए ।
"खबरदार, जो तुम रथ से बाहर कूदे ! लाओ, सन्धि-पत्र मुझे दे दो", हूण दूत ने अपना एक हाथ पीछे बैठे मालव अधिकारी की ओर किया । परन्तु महाराज की धमकी के डर से मालव कर्मचारी ने महाबाहु के रथ पर छलांग लगा दी और पीछे के डण्डे पर बन्दर के समान चिपक गया ।
"पहले इससे यह सन्धि-पत्र ले कर देख लें महाराज ।" हूण दूत के साथ रथ को दौड़ाते हुए महाबाहु ने कहा ।
रथ पर पूरी तरह चढ़कर मालव कर्मचारी ने रेशमी कपड़े में लिपटा सन्धि-पत्र निकालकर महाराज को दे दिया । उन्होंने तेजी से उसे खोल कर पढ़ा और अपने हस्ताक्षर और मोहर को देखा ।
"ठीक है ।"
"धोखेबाज, शैतान हिन्दू के बच्चे", क्रोध और असफलता से उत्तेजित हूण गालियाँ देने लगा । महाबाहु ने घोड़ों को हल्का किया । तभी हूण के हाथ में चमकीला खंजर चमका और महाबाहु की बाईं भुजा में आकर गड़ गया ।
महाराज क्रोध में बुड़बुड़ाये और उन्होंने अपनी कटार निकाली । तभी महाबाहु पीड़ा से कराहता हुआ बोला, "थोड़ा ठहरिये महाराज, पहले मुझे मालवा की ओर रथ मोड़ लेने दीजिए ।"
"क्या हम इसे बाणों से बींध डालें ?" सैनिकों ने महाराज से पूछा ।
महाबाहु बोला, "नहीं" । रथ को मोड़कर उसने बागें अपने दाँतों में पकड़ लीं और खंजर निकालकर घाव को हाथ से दबा दिया ।
हूण राजदूत को संबोधित करते हुए महाराज ने कहा, "मैं मालवा नरेश यशोवर्मन् कह रहा हूँ कि अपने सम्राट् मेहरगुल से कहना कि देशभक्त भारतीय किसी विदेशी आक्रान्ता से सन्धि नहीं किया करते अपितु युद्ध में मिला करते हैं ।"
Text converted into Unicode by Dayanand Deswal दयानन्द देशवाल Dndeswal
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