अमर शहीद राम प्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा
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अमर शहीद रामप्रसाद 'बिस्मिल' ने यह आत्मकथा दिसम्बर १९२७ में गोरखपुर जेल में लिखी थी । उन्हें १९ दिसम्बर १९२७ को फांसी पर लटकाया गया था । गोरखपुर में अपनी जेल की कोठरी में उन्होने अपनी जीवनी लिखनी शुरू की, जो फांसी के केवल तीन दिन पहले समाप्त हुई। १८ दिसम्बर १९२७ को उनकी माँ अपने एक संगी श्री शिव वर्मा के साथ उनसे मिलने आयीं । बिस्मिल ने अपनी जीवनी की हस्तलिखित पांडुलिपि माँ द्वारा लाये गये खाने के बक्से (टिफिन) में छिपाकर रख दी और इसे शिव वर्मा जी को सौंप दिया। शिव वर्मा जी इसे जेल के बाहर लाने में सफल रहे। बाद में श्री भगवतीचरण वर्मा जी ने इन पन्नों को पुस्तक रूप में छपवाया। पता चलते ही ब्रिटिश सरकार ने इस पुस्तक पर प्रतिबन्ध लगा दिया और इसकी प्रतियाँ जब्त कर लीं गयीं। सन १९४७ में स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद कुछ आर्यसमाजी लोगों ने इस जीवनी को पुन: प्रकाशित कराया।
अनुक्रमणिका
- बिस्मिल प्रथम खण्ड
- बिस्मिल प्रथम खण्ड-1
- बिस्मिल द्वितीय खण्ड
- बिस्मिल तृतीय खण्ड
- बिस्मिल चतुर्थ खण्ड
- बिस्मिल चतुर्थ खण्ड-1
- बिस्मिल चतुर्थ खण्ड-2
[edit] संबंधित कड़ियाँ
[edit] बाहरी कडियाँ
- Ram Prasad Bismil (अंग्रेज़ी विकिपीडिया पर)
- रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा - जाटलैण्ड डाट काम से साभार