अपरिचिता

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मेरी उम्र आज केवल सत्ताईस वर्ष की हैं। यह जीवन न दीर्धता के हिसाब से बड़ा हैं, न गुण के हिसाब से। तो भी इसकी एक विशेष मूल्य हैं। यह जीवन उस फूल के समान हैं, जिसके वक्ष पर भ्रमर आ बैठा हो और उसी पदक्षेप के इतिहास ने उसके जीवन के फल में गुठली का-सी रूप धारण कर लिया हो। वह इतिहास आकर में छोटा हैं, उसे छोटा करके ही लिखूँगा। जो छोटे को साधारण समझने की भूल नहीं करेंगे, वे इसका रस समझेंगे।

कॉलेज में पास करने के लिए जितनी परीक्षाएँ थी, वे सब मैने पास कर ली हैं। बचपन में मेरे सुन्दर चेहरे को लेकर पंडितजी को सेमर के फूल और माकाल फल (बाहर से देखने में सुन्दर तथा भीतर से दुर्गन्धयुक्त और अखाद्य गूदे वाला एक फल) के साथ मेरी तुलना करके मेरी हँसी उड़ाने का अवसर मिला था। तब मुझे इसमें बड़ी लज्जा लगती थी, किन्तु बड़े होने पर सोचता रहा हूँ कि यदि पुनर्जन्म हो तो मेरे मुख पर सुरूप और पंडितजी के मुख पर विद्रुप इसी प्रकार प्रकट हो। एक दिन था जब मेरे पिता गरीब थे। वकालत करके उन्होने बहुत-सा रुपया कमाया, लेकिन भोग करने का उन्हें पल-भर भी समय नहीं मिला। मृत्यु के समय उन्होंने लम्बी साँस ली थी, वहीं उनका पहला अवकाश था।

उस समय मेरी आयु कम थी। माँ के ही हाथों मेरा लालन-पालन हुआ। माँ गरीब घर की बेटी थी, हम धनी थे यह बात न तो वे भूलती और न मुझे भूलने देती। बचपन में मैं सदा गोद में ही रहा, शायद इसलिए मैं अन्त तक पूरे तौर पर वयस्क ही नहीं हुआ। आज भी मुझे देखने पर लगेगा जैसे मैं अन्नपूर्णा की गोद में गजानन का छोटा भाई हूँ।

मेरे असली अभिभावक थे मेरे मामा। वे मुझसे मुश्किल से छः वर्ष बड़े होगे, किन्तु फल्गु की रेती की तरह उन्होंने हमारे सारे परिवार को अपने हृदय में सोख लिया था। उन्हें खोदे बिना इस परिवार का एक भी बूँद रस पाने का कोई उपाय नहीं। इसी कारण मुझे किसी भी वस्तु के लिए कोई चिन्ता नहीं करनी पड़ती।

हर कन्या के पिता स्वीकार करेंगे कि मैं सत्यपात्र हूँ। हुक्का तक नहीं पीता। भला आदमी होने में कोई झंझट नहीं हैं, अतः मैं नितात भला मानस हूँ। माता का आदेश मानकर चलने की क्षमता मुझमें हैं, वस्तुतः न मानने का क्षमता मुझमें नहीं हैं। मैं अपने को अंतःपुर के शासनानुसार चलने के योग्य ही बना सका हूँ, यदि कोई कन्या स्वयंवरा हो तो इन सुलक्षणों का याद रखे।

बहुत ही विकसित घरानों से मेरे विवाह के प्रस्ताव आए थे, किन्तु मेरे मामा का, जो धरती पर मेरे भाग्य देवता के प्रधान एजेंट थे, विवाह के सम्बन्ध में एक विशेष मत था। अमीर घर की कन्या उन्हें पसन्द न थी। हमारे घर जो लड़की आए वह सिर झुकाए हुए आए, वे यही चाहते थे। फिर भी रुपये के प्रति उनकी नस-नस में आसक्ति समाई हुई थी। वे ऐसा समधी चाहते थे, जिसके पास धन तो न हो, पर जो धन देने में त्रुटि न करे। जिसका शोषण तो कर लिया जाए, पर जिसे घर आने पर गुड़गुड़ी के बदले में बंधे हुक्कें में( गुड़गुड़ी हुक्का अधिक सम्मान-सूचक समझा जाता हैं, बंधा हुक्का मामूली हुक्का होता हैं) तम्बाकू देने पर जिसकी शिकायत न सुननी पड़े।

मेरा मित्र हरीश कानपुर में काम करता था। छुट्टियों में उसने कोलकाता आकर मेरा मन चंचल कर दिया। बोला- 'सुनो जी, अगर लड़की की बात हो तो एक अच्छी-खासी लड़की हैं।'

कुछ दिन पहले ही एम. ए. पास किया था। सामने जितनी दूर तक दृष्टि जाती, छुट्टी धू-धू कर रही थी, परीक्षा नहीं हैं, उम्मीदवारी नहीं, नौकरी नहीं, अपनी जायदाद देखने की चिन्ता भी नहीं, शिक्षा भी नहीं, इच्छा भी नहीं। होने में भीतर माँ थी और बाहर मामा।

इस अवकाश की मरुभूमि में मेरा हृदय उस समय विश्वव्यापी नारी-रूप की मरीचिका देख रहा था। आकाश में उसकी दृष्टि थी, वायु में उसका निःश्वास, तरु-मर्मर में उसकी रहस्यमयी बातें।

ऐसे में ही हरीश आकर बोला- 'अगर लड़की की बात हो तो।' मेरा तन-मन वसन्त-वायु से दोलायित बकुल वन की नवपल्लव-राशि की भाँति धूप-छाँह का पट बुनने लगा। हरीश रसिक आदमी था, रस उडेलकर वर्णन करने की उसमें शक्ति थी और मेरा मन था तृर्षार्त्त।

'एक बार मामा से बात चलाकर देखो।' मैने हरीश से कहा।

बैठक जमाने में हरीश अद्वितीय था। इससे सर्वत्र उसकी खातिर होती थी। मामा भी उसे पाकर छोड़ना नहीं चाहते थे। बात उनकी बैठक में चली। लड़की की अपेक्षा लड़की के पिता की जानकारी ही उनके लिए महत्त्वपूर्ण थी। पिता की अवस्था वे जैसी चाहते थे वैसी ही थी। किसी जमाने में उनके वंश में लक्ष्मी का मंगल घट भरा रहता था। इस समय उसे शून्य ही समझो, फिर भी तले में थोड़ा-बहुत बाकी था। अपने प्रांत में वंश-मर्यादा की रक्षा करके चलना सहज न समझ कर वे पश्चिम में जाकर वास कर रहे थे। वहाँ गरीब गृहस्थ की ही भाँति रहते थे। एक लड़की को छोड़कर उनके और कोई नहीं था। अतएव उसी के पीछे लक्ष्मी के घट को एकदम औंधा कर देने में हिचकिचाहट नहीं होगी।

यह सब तो ठीक था, किन्तु लड़की की आयु पन्द्रह वर्ष की हैं यह सुनकर मामा का मन भारी हो गया । वंश में तो कोई दोष नहीं है? नहीं, कोई दोष नहीं, पिता अपनी कन्या के योग्य वर कहीं भी न खोज पाए। एक तो वर की हाट में महंगाई थी, तिस पर धनुष-भंग की शर्त, अतः बाप सब्र किए बैठे हैं, किन्तु कन्या की आयु सब्र नहीं करती।

जो भी हो, हरीश की सरस रसना में गुण था। मामा का मन नरम पड़ गया। विवाह का भूमिका-भाग निर्विध्न पूरा हो गया। कोलकाता के बाहर बाकी जितनी दुनिया है, सबको मामा अंडमान द्वीप के अन्तर्गत ही समझते थे। जीवन में एक बार विशेष काम से वे कोन्नवर तक गए थे। मामा यदि मनु होते तो वे अपनी संहिता में हावड़ा के पुल को पार करने का एकदम निषेध कर देते। मन में इच्छा थी, खुद जाकर लड़की को देख आऊँ, लेकिन प्रस्ताव करने का साहस न कर सका।

कन्या को आशीर्वाद देने (बंगालियों में विवाह पक्का करने के लिए एक रस्म होती हैं। जिसमें वर पक्ष के लोग कन्या को और कन्या पक्ष के लोग वर को आशीर्वाद देकर कोई आभूषण दे जाते हैं) जिनको भेजा गया वे हमारे विनु दादा थे, मेरे फुफेरे भाई। उनके मत, रुचि एव दक्षता पर मैं सोलह आने निर्भर कर सकता था। लौटकर विनु दादा ने कहा- 'बुरी नहीं हैं जी! असली सोना हैं।'

विनु दादा की भाषा अत्यन्त संयत थी। जहाँ हम कहते थे 'अपूर्व', वहाँ वे कहते 'कामचलाऊ'। अतएव मैं समझा, मेरे भाग्य में पंचशर का प्रजापति से कोई विरोध नहीं हैं।

कहना व्यर्थ हैं, विवाह के उपलक्ष्य में कन्यापक्ष को ही कोलकाता आना पड़ा। कन्या के पिता शम्भूनाथ बाबू हरीश पर कितना विश्वास करते थे, इसका प्रमाण यह था कि विवाह के तीन दिन पहले उन्होने मुझे पहली बार देखा और आशीर्वाद की रस्म पूरी कर गए। उनकी अवस्था चालीस वर्ष के ही करीब होगी। बाल काले थे, मूँछों का पकना अभी प्रारम्भ ही हुआ था। रूपवान थे, भीड़ में देखने पर सबसे पहले उन्हीं पर नजर पड़ने लायक उनका चेहरा था।

आशा करता हूँ कि मुझे देखकर वे खुश हुए। समझना कठिन था, क्योंकि वे अल्पभाषी थे। जो एकाध बात कहते भी थे उसे मानो पूरा जोर देकर नहीं कहते थे। इस बीच मामा का मुँह अबाध गति से चल रहा था। धन में, मान में हमारा स्थान शहर में किसी से कम नहीं था, वे नाना प्रकार से इसी का प्रचार कर रहे थे। शम्भूनाथ बाबू ने इस बात में बिल्कुल योग नहीं दिया, किसी भी प्रसंग में कोई 'हाँ' या 'हूँ' तक नहीं सुनाई पड़ी। मैं होता तो निरुत्साहित हो जाता, किन्तु मामा को हतोत्साहित करना कठिन था। उन्होंने शम्भूनाथ बाबू का शान्त स्वभाव देखकर सोचा कि आदमी बिल्कुल निर्जीव हैं, तनिक भी तेज नहीं। समधियों में और चाहे जो हो, तेज भाव होना पाप हैं, अतएव, मन-ही-मन मामा खुश हुए। शम्भूनाथ बाबू जब उठे तो मामा ने संक्षेप में ऊपर से ही उनको विदा कर दिया, गाड़ी में बिठाने नहीं गए।

दहेज के सम्बन्ध में दोनो पक्षों में बात पक्की हो गई थी। मामा अपने को असाधारण व चतुर समझकर गर्व करते थे। बातचीत में वे कहीं भी कोई छिद्र न छोड़ते। रुपए की संख्या तो निश्चित थी ही, ऊपर से गहना कितने भर एवं सोना किस दर का होगा, यह भी एकदम तय हो गया था। मैं स्वयं इन बातों में शामिल नहीं था, न जानता ही था कि क्या लेन-देन निश्चित हुआ। मैं जानता था कि यह स्थूल भाग भी विवाह का एक प्रधान अंग हैं एवं उस अंश का भार जिनके ऊपर हैं वे एक कौड़ी भी नहीं ठगाएंगे। वस्तुतः अत्यन्त चतुर व्यक्ति के रूप में मामा हमारे सारे परिवार में गर्व की प्रधान वस्तु थे। जहाँ कहीं भी हमारा कोई सम्बन्ध हो पर्वत ही बुद्धि की लड़ाई में जीतेंगे, यह बिल्कुल पक्की बात थी। इसलिए हमारे यहाँ कमी न रहने पर भी एवं दूसरे पक्ष में कठिन अभाव होते हुए भी हम जीतेंगे, हमारे परिवार की जिद थी, इसमें चाहे कोई बचे या मरे।

हल्दी चढ़ाने की रस्म बड़ी धूमधाम से हुई। ढोने वाले इतने थे कि उनकी संख्या का हिसाब रखने के लिए क्लर्क रखना पड़ता। उनको विदा करने में अपर पक्ष का जो नाकों-दम होगा उसका स्मरण करके मामा के साथ स्वर मिलाकर माँ खूब हँसी।

बैंड़, शहनाई, फैन्सी कन्सर्ट आदि जहाँ जितने प्रकार की जोरदार आवाजें थी, सबको एक साथ मिलाकर बर्बर कोलाहल रूपी मस्त हाथी द्वारा संगीत-सरस्वती में पद्मवन को दलित-विदलित करता हुआ मैं विवाह के घर में जा पहुँचा। अँगूठी, हार, जरी, जवाहरात से मेरा शरीर ऐसा लग रहा था जैसे गहने की दुकान नीलाम पर चढ़ी हो। उनके भावी जामाता का मूल्य कितना था, यह जैसे कुछ मात्रा में सर्वांग में स्पष्ट रूप से लिखकर भावी ससुर के साथ मुकाबला करने चला था।

मामा कन्या-पक्ष वालों के घर पहुँचकर प्रसन्न नहीं हुए। एक तो आँगन में बारातियों के बैठने लायक जगह नहीं थी, तिस पर सम्पूर्ण आयोजन एकदम साधारण ढंग का था। ऊपर से शम्भूनाथ बाबू का व्यवहार भी निहायत ठंडा था। उनकी विनय अजस्त्र (अनवरत) नहीं थी। मुँह में शब्द ही न थे। बैठे गले, गंजी खोपड़ी, कृष्णवर्ण एवं स्थूल शरीर वाले एक वकील मित्र यदि कमर में चादर बाँधे, बराबर हाथ जोड़े, सिर हिलाते हुए नम्रतापूर्ण स्मितहासय और गदगद वचनों से कन्सर्ट पार्टी के करताल बजाने से लेकर वरकर्ता तक प्रत्येक को बार-बार प्रचुर मात्रा में अभिषिक्त न कर देते तो शुरू में ही मामला इस पार या उस पार हो जाता।

मेरे सभा में बैठने के कुछ देर बाद ही मामा शम्भूनाथ बाबू को बगल के कमरे में बुला ले गए। पता नहीं, क्या बातें हुई। कुछ देर बाद ही शम्भूनाथ बाबू ने आकर मुझसे कहा- 'लालाजी, जरा इधर तो आइए!'

मामला यह था, सभी का न हो, किन्तु किसी-किसी मनुष्य का जीवन में कोई एक लक्ष्य रहता हैं। मामा का एकमात्र लक्ष्य था, वे किसी भी प्रकार किसी से ठगे नहीं जाएँगे। उन्हें डर था कि उनके समधी उन्हें गहनों में धोखा दे सकते हैं। विवाह-कार्य समाप्त हो जाने पर उस धोखे का कोई प्रतिकार न हो सकेगा। घर-किराया, सौगात, लोगों की विदाई आदि के विषय में जिस प्रकार की खींचातानी का परिचय मिला उससे मामा ने निश्चय किया था, लेन-देन के सम्बन्ध में इस आदमी की केवल जबानी बात पर निर्भर रहने से काम न चलेगा। इसीकारण घर के सुनार तक को साथ लाए थे। बगल के कमरे में जाकर देखा, मामा एक कुर्सी पर बैठे थे। एक सुनार अपनी तराजू, बाट और कसौटी आदि लिए जमीन पर बैठा था।


'तुम्हारे मामा कहते हैं कि विवाह-कार्य शुरू होने से पहले ही वे कन्या के सारे गहने जँचवाकर देखेंगे, इसमें तुम्हारी क्या राय हैं?' शम्भूनाथ बाबू ने मुझसे कहा।

मैं सिर नीचा किए चुप रहा।

'वह क्या कहेगा। मैं जो कहूँगा, वही होगा।' मामा बोले।

'तो फिर यही तय रहा? ये जो कहेंगे वही होगा? इस सम्बन्ध में तुम्हें नहीं कहना हैं?' शम्भूनाथ बाबू ने मेरी ओर देखकर कहा।

'इन सब बातों में मेरा बिल्कुल भी अधिकार नहीं हैं।' मैंने जरा गर्दन हिलाकर इशारे से बताया।

'अच्छा तो बैठो, लड़की के शरीर से सारे गहने उतारकर लाता हूँ।' यह कहते हुए वे उठे।

'अनुपम यहाँ क्या करेगा? वह सभा में जाकर बैठे।' मामा बोले।

'नहीं, सभा में नहीं, यहीं बैठना होगा।' शम्भूनाथ बोले।

कुछ देर बाद उन्होंने एक अंगोछे में बँधे गहने लाकर चौकी के ऊपर बिछा दिए। सारे गहने उनकी पितामही के जमाने के थे, नए फैशन का बारीक काम न था, जैसा मोटा था वैसा ही भारी था।

'इन्हें क्या देखूँ। इनमें कोई मिलावट नहीं हैं, ऐसे सोने का आजकल व्यवहार ही नहीं होता।' सुनार ने हाथ में गहने उठाकर कहा।

यह कहते हुए उसने मकर का मुँह वाला मोटा एक बाला कुछ दबाकर दिखाया, वह टेढा हो जाता था।

मामा ने उसी समय नोट-बुक में गहनों की सूची बना ली, कहीं जो दिखाया गया था उसमें से कुछ कम न हो जाए। हिसाब करके देखा, गहनें जिस मात्रा में देने की बात थी इनकी संख्या, दर और तौल उससे अधिक थी।

गहनों में एक जोड़ा इयरिंग था। शम्भूनाथ ने उसको सुनार के हाथ में देकर कहा- 'जरा इसकी परीक्षा करके देखो।'

'यह विलायती माल हैं, इसमें सोने का हिस्सा मामूली ही हैं।' सुनार ने कहा।

'इसे आप ही रखे।' शम्भूनाथ ने इयरिंग जोड़ी मामा के हाथ में देते हुए कहा।

मामा ने उसे हाथ में लेकर देखा, यही इयरिंग कन्या को देकर उन्होंने आशीर्वाद की रस्म पूरी की थी।

मामा का चेहरा लाल हो उठा, दरिद्र उनको ठगना चाहेगा, किन्तु वे ठगे नहीं जाएँगे, इस आनन्द-प्राप्ति से वंचित रह गए एवं इसके अतिरिक्त कुछ ऊपरी भी हुई। मुँह अत्यन्त भारी करके बोले- ' अनुपम, जाओ तुम सभा में जाकर बैठो।'

'नहीं, अब सभा में बैठना नहीं होगा। चलिए, पहले आप लोगों को खाना खिला दूँ।' शम्भूनाथ बाबू बोले।

'यह क्या कह रहे हैं? लग्न...।' मामा बोले।

शम्भूनाथ बाबू ने कहा- ' उसके लिए चिन्ता न करे, अभी उठिए।'

आदमी निहायत भलामानस था, किन्तु अन्दर से कुछ ज्यादा हठी प्रतीत हुआ। मामा को उठना पड़ा। बारातियों का भी भोजन हो गया। आयोजन में आडम्बर नहीं था, किन्तु रसोई अच्छी बनी थी और सब-कुछ साफ-सुथरा। इससे सभी तृप्त हो गए।

बारातियों का भोजन समाप्त होने पर शम्भूनाथ बाबू ने मुझसे खाना खाने को कहा।

'यह क्या कह रहे हैं? विवाह के पहले वर कैसे भोजन करेगा।' मामा ने कहा।

इस सम्बन्ध में वे मामा के व्यक्त किए मत की पूर्ण उपेक्षा करके मेरी ओर देखकर बोले- 'तुम क्या कहते हो? भोजन के लिए बैठने में कोई दोष हैं?'

मूर्तिमती मातृ-आज्ञा-स्वरूप मामा उपस्थित थे, उनके विरुद्ध चलना मेरे लिए असम्भव था। मैं भोजन के लिए न बैठ सका।

'आप लोगों को बहुत कष्ट दिया हैं। हम लोग धनी हैं। आप लोगों के योग्य व्यवस्था नहीं कर सके, क्षमा करेंगे। रात हो गई हैं, आप लोगों का कष्ट और नहीं बढ़ाना चाहता। तो फिर इस समय...।' शम्भूनाथ बाबू ने मामा से कहा।

'तो सभा में चलिए, हम तो तैयार हैं।' मामा बोले।

'तब आपकी गाड़ी बुलवा दूँ?' शम्भूनाथ बोले।

'मजाक कर रहे हैं क्या?' मामा ने आश्चर्य से कहा।

'मजाक तो आप ही कर चुके हैं। मजाक के सम्पर्क को स्थायी करने की मेरी इच्छा नहीं हैं।' शम्भूनाथ ने कहा।

मामा दोनों आँखें विस्फारित किए अवाक् रह गए।

'अपनी कन्या का गहना मैं चुरा लूँगा, जो यह बात सोचता हैं उसके हाथों में मैं अपनी कन्या नहीं दे सकता ।' शम्भूनाथ ने कहा।

मुझसे एक शब्द कहना भी उन्होंने आवश्यक नहीं समझा। कारण, प्रमाणित हो गया था, मैं कुछ भी नहीं था।

उसके बाद जो कुछ हुआ उसे कहने की इच्छा नहीं होती। झाड़-फानूस तोड़-फोड़कर चीज-वस्तु को नष्ट-भ्रष्ट करके बारातियों का दल दक्ष-यज्ञ का नाटक पूरा करके बाहर चला आया।

घर लौटने पर बैंड़, शहनाई और कन्सर्ट सब साथ नहीं बजे एवं अभ्रक के झाड़ों ने आकाश के तारों के ऊपर अपने कर्तव्य का निर्वाह करके कहाँ महानिर्वाण प्राप्त किया पता नहीं चला।

घर के सब लोग क्रोध से आग-बबूला हो गए। कन्या के पिता को इतना घंमड़, कलियुग पूर्ण रूप से आ गया हैं।

सब बोले- 'देखें, लड़की का विवाह कैसे करते हैं।' किन्तु, लड़की का विवाह नहीं होगा, यह भय जिसके मन में न हो उसको दंड़ देने का क्या उपाय हैं?

बंगाल-भर में मैं ही एकमात्र पुरुष था, जिसको स्वयं कन्या के पिता ने जनवासे से लौटा दिया था। इतने बड़े सत्पात्र के माथे पर कलंक का इतना बड़ा दाग किस दुष्ट ग्रह ने इतना प्रचार करके गाजे-बाजे से समारोह करके आँक दिया? बाराती यह कहते हुए माथा पीटने लगे- 'विवाह नहीं हुआ, लेकिन हमको धोखा देकर खिला दिया, सम्पूर्ण अन्न सहित पक्वाशय निकालकर वहाँ फेंक आते तो अफसोस मिटता।'

'विवाह के वचन-भंग और मान-हानि का दावा करूँगा।' कहकर मामा घूम-घूमकर खूब शोर मचाने लगे। हितैषियों ने समझा दिया कि ऐसा करने से जो तमाशा बाकी रह गया हैं वह पूरा हो जाएगा।

कहना व्यर्थ हैं, मैं भी बहुत क्रोधित हुआ था। किसी प्रकार शम्भूनाथ बुरी तरह हारकर मेरे पैरों पर आ गिरे। मूँछो की रेखा पर ताव देते-देते केवल यही कामना करने लगा।

किन्तु, इस आक्रोश की काली धारा के समीप एक और स्रोत बह रहा था, जिसका रंग बिल्कुल काला नहीं था। सम्पूर्ण मन उस अपरिचित की ओर दौड़ गया। अभी तक उसे किसी भी प्रकार वापस नहीं मोड़ सका। दीवार की आड़ में रह गया। उसके माथे पर चंदन चर्चित था, देह पर लाल साड़ी, चेहरे पर लज्जा की ललाई, हृदय में क्या था यह कैसे कह सकता हूँ। मेरे कल्पनालोक की कल्पलता वसन्त के समस्त फूलों का भार मुझे निवेदित कर देने के लिए झुक पड़ी थी। हवा आ रही थी, सुगन्ध मिल रही थी, पत्तों का शब्द सुन रहा था, केवल एक पग बढाने की देर थी, इसी बीच वह पग-भर की दूरी क्षण-भर में असीम हो गई।

इतने दिनों तक रोज शाम को मैने विनु दादा के घर जाकर उनको परेशान कर डाला था। विनु दादा की वर्णन-शैली अत्यन्त सघ्न संक्षिप्तता के कारण उनकी प्रत्येक बात ने स्फुल्लिंग के समान मेरे मन में आग लगा दी थी। मैने समझा था कि लड़की का रूप बड़ा अपूर्व था, किन्तु न तो उसे आँखों से देखा और न उसका चित्र, सब कुछ अस्पष्ट रह गया। बाहर तो उसने पकड़ दी ही नहीं, उसे मन में भी न ला सका, इसी कारण भूत के समान दीर्ध निःश्वास लेकर मन उस दिन की उस विवाह-सभा की दीवार के बाहर चक्कर काटने लगा।

हरीश ने सुना, लड़की को मेरा फोटोग्राफ दिखाया गया था। पसन्द अवश्य किया होगा। न करने का तो कोई कारण ही न था। मेरा मन कहता हैं, वह चित्र उसने किसी बक्से में छिपा रखा हैं। कमरे का दरवाजा बन्द करके अकेली किसी-किसी निर्जन दोपहरी में क्या वह उसे खोलकर न देखती होगी? जब झुककर देखती होगी तब चित्र के ऊपर क्या उसके मुख के दोनो ओर से खुले बाल आकर नहीं पड़ते होगे? अकस्मात् बाहर किसी के पैर की आहट पाते ही क्या वह झटपट अपने सुगंधित अंचल में चित्र को छिपा न लेती होगी?

दिन बीत जाते हैं। एक वर्ष बीत गया। मामा तो लज्जा के मारे विवाह-सम्बन्ध की बात ही न छेड़ पाते। माँ की इच्छा थी, मेरे अपमान की बात जब समाज के लोग भूल जाएँगे तब विवाह का प्रयत्न करेगी।

दूसरी ओर मैंने सुना कि शायद उस लड़की को अच्छा वर मिल गया हैं, किन्तु उसने प्रण किया हैं कि वह विवाह नहीं करेगी। सुनकर मन आनन्द के आवेश से भर गया। मैं कल्पना में देखने लगा, वह अच्छी तरह खाती नहीं, सन्ध्या हो जाती हैं, वह बाल बाँधना भूल जाती हैं। उसके पिता उसके मुँह की ओर देखते हैं और सोचते हैं- 'मेरी लड़की दिनोंदिन ऐसी क्यों होती जा रही हैं?' अकस्मात् किसी दिन उसके कमरे में आकर देखते हैं कि लड़की के नेत्र आँसुओं से भरे हैं। पूछते हैं- 'बेटी, तुझे क्या हो गया हैं, मुझे बता? ' लड़की झटपट आँसु पोंछकर कहती हैं- 'कहाँ, कुछ भी तो नही हुआ, पिताजी।' बाप की इकलौती लड़की हैं न, बड़ी लाड़ली हैं। अनावृष्टि के दिनों में फूल की कली के समान जब लड़की एकदम मुरझा गई तो पिता के प्राण और अधिक सहन न कर सके। मान त्यागकर वे दौड़कर हमारे दरवाजे पर आए। उसके बाद? उसके बाद मन में जो काले रंग की धारा बह रही थी, वह मानो काले साँप के समान रूप धरकर फुफकार उठी। उसने कहा- 'अच्छा हैं, फिर एक बार विवाह का साज सजाया जाए, रोशनी जले, देश-विदेश के लोगों को निमंत्रण दिया जाए, उसके बाद तुम वर के मौन को पैरों से कुचलकर दल-बल लेकर सभा से उठकर चले आओ।' किन्तु जो धारा अश्रुजल के समान शुभ्र थी, वह राजहँस का रूप धारण करके बोली- 'जिस प्रकार मैं एक दिन दमयंती के पुष्पवन में गई थी मुझे उसी प्रकार एक बार फिर उड़ जाने दो, मैं विरहिणी के कानों में एक बार सुख-संदेश दे आऊँ।' उसके बाद? उसके बाद दुख की रात बीत गई, नववर्षा का जल बरसा, म्लान फूल ने मुँह उठाया। इस बार उस दीवार के बाहर सारी दुनिया के और सब लोग रह गए, केवल एक व्यक्ति ने प्रवेश किया, फिर मेरी कहानी खत्म हो गई।

लेकिन कहानी ऐसे खत्म नहीं हुई। जहाँ पहुँचकर वह अनन्त हो गई हैं, वहाँ का थोड़ा सा विवरण बताकर अपना यह लेख समाप्त करूँगा।

माँ को लेकर मैं तीर्थ करने जा रहा था। भार मेरे ही ऊपर था, क्योंकि मामा इस बार भी हावड़ा पुल के पार नहीं हुए। मैं रेलगाड़ी में सो रहा था। झोंके खाते -खाते दिमाग में अनेक प्रकार के बिखरे स्वप्नों का झुनझुना बज रहा था। अकस्मात किसी एक स्टेशन पर जाग पड़ा, वह भी प्रकाश-अन्धकार-मिश्रित एक स्वप्न था। केवल आकाश के तारागण चिरपरिचत थे और सब अपरिचित अस्पष्ट था, स्टेशन की कई सीधी खड़ी बत्तियाँ प्रकाश द्वारा यह धरती कितनी अपरिचित हैं एवं जो चारों ओर हैं वह कितना अधिक दूर हैं, यही दिखा रही थी। गाड़ी में माँ सो रही थी। बत्ती के नीचे हरा पर्दा टँगा था, ट्रंक, बक्स, सामान सब एक-दूसरे के ऊपर तितर-बितर पड़े थे। वह मानो स्वप्न-लोक का उल्टा-पुल्टा सामान हो, जो सामान हो, जो सन्ध्या की हरी बत्ती के टिमटिमाते प्रकाश में होने और न होने के बीच न जाने किस ढंग से पड़ा था।

इस बीच उस विचित्र जगत की अदभूत रात में कोई बोल उठा- 'जल्दी आ जाओ, इस डिब्बे में जगह हैं।'

लगा, जैसे कोई गीत गा सुना हो। बंगाली लड़की के मुख से बंगला बोली कितनी मधुर लगती हैं, इसका पूरा-पूरा अनुमान ऐसे अनुपयुक्त स्थान पर अचानक सुनकर ही किया जा सकता हैं, किन्तु इस स्वर को निरी एक लड़की का स्वर कहकर श्रेणी मुक्त कर देने से काम नहीं चलेगा। यह किसी अन्य व्यक्ति का स्वर था, सुनते ही मन कह उठता हैं - 'ऐसा तो पहले कभी नहीं सुना।'

गले का स्वर मेरे लिए सदा ही बड़ा सत्य रहा हैं। रूप भी कम बड़ी वस्तु नहीं हैं, किन्तु मनुष्य में जो अन्तरतम और अनिर्वचनीय हैं, मुझे लगता हैं, जैसे कंठ-स्वर उसी की आकृति हो। प्लेटफॉर्म पर अन्धेरे में खड़े गार्ड ने अपनी एक आँखवाली लालटेन हिलाई, गाड़ी चल दी, मैं जंगले के पास बैठा रहा। मेरी आँखों के सामने कोई मूर्ति न थी, किन्तु हृदय में मैं एक हृदय का रूप देखने लगा। वह जैसे इस तारामयी रात्रि के समान हो, जो आवृत लेती हैं, किन्तु उसे पकड़ा नही जा सकता। ओ स्वर! क्षण-भर में ही तुम मेरे चिरपरिचित के आसन पर आकर बैठ गए हो। तुम कैसे अदभूत हो, चंचल काल के क्षुब्ध हृदय के ऊपर फूल के समान खिले हो, किन्तु उसकी लहरों के आन्दोलन से कोई पंखुड़ी तक नहीं हिलती, अपरिमेय कोमलता में जरा भी दाग नही पड़ता।

गाड़ी लोहे के मृदंग पर ताल देती हुई चली। मैं मन-ही-मन गाना सुनता जा रहा था। उसकी एक ही टेक थी- 'डिब्बे में जगह हैं।' हैं क्या, जगह हैं क्या जगह मिले कैसे, कोई किसी को नहीं पहचानता। साथ ही यह न पहचानना-मात्र कोहरा हैं, माया हैं, उसके छिन्न होते ही फिर परिचय का अन्त नहीं होता। ओ सुधामाय स्वर! जिस हृदय के तुम अदभूत रूप हो, वह क्या मेरा चिर-परिचित नहीं हैं? जगह हैं? हैं, जल्दी ही आया हूँ, क्षण-भर की भी देर नहीं की हैं।

रात में ठीक से नींद नहीं आई। प्रातः हर स्टेशन पर एक बार मुँह निकालकर देखता, भय होने लगा कि जिसको देख नहीं पाया वह कहीं रात में ही न उतर जाए।

दूसरे दिन सुबह हमें एक बड़े स्टेशन पर गाड़ी बदलनी थी, हमारे टिकट फर्स्ट क्लास के थे, आशा थी, भीड़ नहीं होगी। उतरकर देखा, प्लेटफार्म पर साहबों के अर्दलियो का दल सामान लिए गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहा हैं। फौज के कोई एक बड़े जनरल साहब भ्रमण के लिए निकले थे। दो-तीन मिनट के बाद ही गाडी़ आ गई। समझा, फर्स्ट क्लास की आशा छोड़नी पड़ेगी। माँ को लेकर किस डिब्बे में चढूँ, इस बारे में बड़ी चिन्ता में पड़ गया। पूरी गाड़ी में बहुत भीड़ थी। मैं दरवाजे-दरवाजे झाँकता हुआ घूमने लगा। इसी बीच सेंकड़ क्लास के डिब्बे से एक लड़की ने मेरी माँ को लक्ष्य करके कहा- 'आप हमारे डिब्बे में आइए न, यहाँ जगह हैं।'

मैं तो चौक पड़ा। वही अदभूत मधुर स्वर और वहीं गीत की टेक 'जगह हैं' क्षण-भर की भी देर न करके मैं माँ को लेकर उस डिब्बे में चढ़ गया। सामान चढ़ाने का समय प्रायः नहीं था। मेंरे जैसा असमर्थ दुनिया में कोई न होगा। उस लड़की ने ही कुलियों के हाथ से झटपट चलती गाड़ी में हमारे बिस्तारादि खींच लिए। फोटो खींचने का कैमरा स्टेशन पर ही छूट गया, ध्यान ही न रहा।

उसके बाद क्या लिखूँ, नहीं जानता। मेरे मन में एक अखंड आनन्द की तस्वीर हैं, उसे कहाँ से शुरु करूँ, कहाँ समाप्त करूँ? बैठे-बैठे एक वाक्य के बाद दूसरे वाक्य की योजना करने की इच्छा नहीं होती।

इस बार उसी स्वर को आँखों से देखा। इस समय भी वह स्वर ही जान पड़ा। माँ के मुँह की ओर ताका, देखा कि उनकी आँखों की पलक नहीं गिर रहीं थी। लड़की की उम्र सोलह या सत्रह वर्ष की होगी, किन्तु नवयौवन ने उसके देह, मन पर कहीं भी जैसे जरा भी भार न डाला हो। उसकी गति सहज, दीप्ति निर्मल, सौन्दर्य की शुचिता अपूर्व थी, उसमें कहीं कोई जड़ता न थी।

मैं देख रहा हूँ, विस्तार से कुछ भी कहना मेरे लिए असम्भव हैं। यहीं नहीं, वह किस रंग की साड़ी किस प्रकार पहने हुए थी, यह भी ठीक से नहीं कह सकता। यह बिल्कुल सत्य हैं कि उसकी वेश-भूषा में ऐसा कुछ न था जो उसे छोड़कर विशेष रूप से आँखों को आकर्षित करे। वह अपने चारों ओर की चीजों से बढ़कर थी, रजनीगन्धा की शुभ्र मंजरी के समान सरल वृन्त के ऊपर स्थित, जिस वृक्ष पर खिली थी, उसका एकदम अतिक्रमण कर गई थी। साथ में दो-तीन छोटी-छोटी लड़कियाँ थी, उनके साथ उसकी हँसी और बातचीत का अन्त न था। मैं हाथ में एक पुस्तक लिए उस ओर कान लगाए था। जो कुछ कान में पड़ रहा था कि उसमें अवस्था का अन्तर बिल्कुल भी नहीं था, छोटों के साथ वह अनायास और आनन्दपूर्वक छोटी हो गई थी। साथ में बच्चों की कहानियों की सचित्र पुस्तकें थी। उसी की कोई कहानी सुनाने के लिए लड़कियों ने उसे घेर लिया था, यह कहानी अवश्य ही उन्होंने बीस-पच्चीस बार सुनी होगी। लड़कियों का इतना आग्रह क्यों था, यह मैं समझ गया । उस सुधा-कंठ की सोने की छड़ी से सारी कहानी सोना हो जाती थी। लड़की का सम्पूर्ण तन-मन पूरी तरह प्राणों से भरा था, उसकी सारी चाल-ढाल स्पर्श में प्राण उमड़ रहा था। अतः लड़कियाँ जब उसके मुँह से कहानी सुनती तब कहानी नहीं, उसी को सुनती, उनके हृदय पर प्राणों का झरना झर पड़ता। उसके उस उदभासित प्राण ने मेरी उस दिन की सारी सूर्य-किरणों को सजीव कर दिया, मुझे लगा, मुझे जिस प्रकृति ने अपने आकाश से वेष्टित कर रखा हैं, वह उस तरुणी के ही अक्लांत, अम्लान प्राणों का विश्वव्यापी विस्तार हैं। दूसरे स्टेशन पर पहुँचते ही उसने खोमचे वाले को बुलाकर काफी दाल-मोठ खरीदी और लड़कियों के साथ मिलकर बिल्कुल बच्चों के समान कलहास्य करते हुए निःसंकोच भास से खाने लगी। मेरी प्रकृति तो जाल से घिरी हुई थी, क्यों मैं अत्यन्त सहज भाव से, उस हँसमुख लड़की से एक मुट्ठी दाल-मोठ न माँग सका? हाथ बढ़ाकर अपना लोभ क्यों नहीं स्वीकार किया?

माँ अच्छा और बुरा लगने के बीच दुचित्ती हो रही थी। डिब्बे में मैं मर्द हूँ, तो भी इसे कोई संकोच नहीं, खासकर वह इस लोभ की भाँति खा रही हैं। वह बात उनको पसन्द नहीं आ रही थी और उसे बेहया कहने का भी उन्हें भ्रम न हुआ। उन्हें लगा, इस लड़की की आयु काफी हो गयी हैं, किन्तु शिक्षा नहीं मिली। माँ एकाएक किसी से बातचीत नहीं कर पाती। लोगों से दूर-दूर रहने का ही उनका स्वभाव था। इस लड़की का परिचय प्राप्त करने की उनको बड़ी इच्छा थी, किन्तु स्वाभाविक बाधा नहीं मिटा पर रही थी।

इसी समय गाड़ी एक बड़े स्टेशन पर आकर रुक गई। उन जनरल साहब के साथियों का एक दल इस स्टेशन से चढ़ने का प्रयत्न कर रहा था। गाड़ी में कहीं जगह न थी। कई बार हमारें डिब्बे के सामने से निकले। माँ तो भय के मारे जड़ हो गयी, मैं भी मन में अशान्ति का अनुभव कर रहा था।

गाड़ी छूटने के थोड़ी देर पहले एक देशी रेल-कर्मचारी ने डिब्बों की दो बेंचों के सिरों पर नाम लिखे हुए दो टिकट लटकाकर मुझसे कहा- 'इस डिब्बें की ये दो बेंचे पहले ही दो साहबों ने रिजर्व करा रखी हैं, आप लोगों को दूसरे डिब्बे में जाना होगा।'

मैं तो झटपट घबराकर खड़ा हो गया।

'नहीं, हम डिब्बा नहीं छोड़ेगे।' लड़की हिन्दी में बोली।

'बिना छोड़े कोई चारा नहीं।' उस आदमी ने जिद करते हूए कहा।

किन्तु लड़की के उतरने की इच्छा का कोई लक्षण न देखकर वह उतरकर अंग्रेज स्टेशन मास्टर को बुला लाया।

उसने आकर मुझसे कहा - 'मुझे खेद है, किन्तु...।'

सुनकर मैंने 'कुली-कुली' की पुकार लगाई।

'नहीं, आप नहीं जा सकते, जैसे हैं बैठे रहिए।' लड़की ने उठकर दोनों आँखों से आग बरसाते हुए कहा।

यह कहकर उसने दरवाजे के पास खड़े होकर स्टेशन मास्टर से अंग्रेजी में कहा- 'यह डिब्बा पहले से रिजर्व है, यह बात झूठ हैं।'

यह कहकर उसने नाम लिखे टिकटों को खोलकर प्लेटफार्म पर फेंक दिया।

इस बीच में वर्दी पहने साहब अर्दली के साथ दरवाजे के पास आकर खड़ा हो गया था। डिब्बे में अपना सामान चढ़ाने के लिए पहले उसने अर्दली को इशारा किया था। उसके पश्चात् लड़की के मुँह की ओर देखकर, उसकी बात सुनकर, मुखमुद्रा देखकर स्टेशन-मास्टर को थोड़ा छुपा और उसको ओट में ले जाकर पता नहीं क्या कहा। देखा गया, गाड़ी छूटने का समय बीत चुकने पर भी और एक डिब्बा जोड़ा गया, तब कहीं ट्रेन छूटी। लड़की ने अपना दलबल लेकर फिर दोबारा दाल-मोठ खाना शुरू कर दिया मैं शर्म के मारे खिड़की के बाहर मुँह निकालकर प्रकृति की शोभा देखने लगा।

गाडी़ कानपुर आकर रुकी। लड़की सामान बाँधकर तैयार थी, स्टेशन पर एक बंगाली नौकर दौड़कर उनको उतारने का प्रयत्न करने लगा।

तब फिर माँ से न रहा गया। माँ ने उससे पूछा- 'तुम्हारा नाम क्या है, बेटी?'

'मेरा नाम कल्याणी हैं।' लड़की बोली।

सुनकर माँ और मैं दोनों ही चौंक पड़े।

'तुम्हारे पिता...?'

'वे यहाँ डॉक्टर हैं उनका शम्भूनाथ सेन हैं।'

उसके बाद ही वह उतर गई।


उपसंहार


मामा के निषेध को अमान्य करके माता की आज्ञा ठुकराकर मैं अब कानपुर आ गया हूँ। कल्याणी के पिता और कल्याणी से भेंट हुई। हाथ जोड़े हैं, सिर झुकाया हैं, शम्भूनाथ बाबू का हृदय पिघला हैं। कल्याणी कहती हैं- 'मैं विवाह नहीं करूँगीं।'

'क्यों?' मैंने पूछा।

'मातृ-आज्ञा।' उसने कहा।

गजब हो गया! इस ओर भी मातुल हैं क्या?

बाद में समझा, मातृभूमि हैं। वह सम्बन्ध टूट जाने के बाद से कल्याणी ने लड़कियों को शिक्षा देने का व्रत ग्रहण कर लिया हैं।

किन्तु, मैं आशा ने छोड़ सका। वह स्वर मेरे हृदय में आज भी गूँज रहा हैं, वह मानो कोई उस पार की बंशी हो, मेरी दुनिया के बाहर से आई थी, मुझे सारे जगत के बाहर बुला रही थी और वह जो रात के अन्धकार में मेरे कान में पड़ा था - 'जगह हैं', वह मेरे चिर-जीवन के संगीत की टेक बन गई। उस समय मेरी आयु थी, तेईस वर्ष, अब हो गई सत्ताईस वर्ष। अभी तक मैने आशा नहीं छोड़ी हैं, किन्तु मातुल को छोड़ दिया हैं। इकलौता लड़का होने के कारण माँ मुझे नहीं छोड़ सकी।

तुम सोच रहे होगे, मैं विवाह की आशा करता हूँ। नहीं, कभी नहीं। मुझे याद हैं, बस उस रात के अपरिचित कंठ के मधुर स्वर की आशा - 'जगह हैं।' अवश्य हैं। नहीं तो खड़ा हो कहाँ होऊँगा? इसी से वर्ष के बाद वर्ष बीतते जाते हैं, मैं यहीं हूँ। भेंट होती हैं, वही स्वर सुनता हूँ, जब अवसर मिलता हैं उसका काम कर देता हूँ और मन कहता हैं, यहीं तो जगह मिली हैं, ओ री अपरिचिता! तुम्हारी परिचय पूरा नहीं हुआ, पूरा होगा भी नहीं, किन्तु मेरा भाग्य अच्छा हैं, मुझे जगह मिल चुकी हैं।